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22 के बाद 23वीं मौत की सजा सुनाकर जज बोले- ‘कायर कहलाने से अच्छा मर जाऊं’

Muzaffarnagar Judge Ravi Kumar Diwakar: मुजफ्फरनगर फास्ट ट्रैक कोर्ट के एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज दिवाकर चार महीनों के अंदर 22 लोगों को मौत की सजा सुनाने के कारण चर्चा में आए थे. यूपी के जज ने 7 सितंबर को एक अन्य शख्स को अपनी पत्नी को जलाकर मारने के आरोप में दोषी मानते हुए मौत की सजा सुनाई गई है.

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जज रवि कुमार दिवाकर 22 लोगों को मौत की सजा सुनाने के कारण चर्चा में आए थे. (फोटो-इंडिया टुडे)

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  • मुजफ्फरनगर के एडिशनल डिस्ट्रिक्ट और सेशंस जज रवि कुमार दिवाकर ने हत्या के दोषी को 23वीं बार मौत की सजा सुनाते हुए कहा कि वे दूसरी ताकतों से डरेंगे तो इस्तीफा देंगे।
  • जज रवि कुमार दिवाकर के खिलाफ धमकियों और बाहरी दबाव के बीच 97 लंबित हत्या मामलों को अन्य कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया गया था, जिससे उनके फैसलों पर विवाद हुआ।
  • जज दिवाकर ने स्पष्ट किया कि वे दूसरों के दबाव में नहीं आएंगे और उनकी सुनाई मौत की सजा की मंजूरी और अपील इलाहाबाद हाई कोर्ट में होगी।

उत्तर प्रदेश के वो जज याद हैं, जो चार महीनों के अंदर 22 लोगों को मौत की सजा सुनाकर चर्चा में आए थे? उन्हीं जज ने अब 23वीं बार हत्या के एक दोषी को मौत की सजा सुनाई है. इसके साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि अगर वो दूसरी ताकतों से डरने लगे तो इससे अच्छा है कि इस्तीफा ही दे दें. उन्होंने कहा कि वो मरना पंसद करेंगे लेकिन कायर जज नहीं कहलाना चाहेंगे. ये जिस जज की बात हम कर रहे हैं, वो मुजफ्फरनगर फास्ट ट्रैक कोर्ट के एडिशनल डिस्ट्रिक्ट और सेशंस जज रवि कुमार दिवाकर हैं. 

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जज ने सुनाई 23वीं सजा-ए-मौत

जज रवि कुमार दिवाकर 5 महीनों के अंदर 22 लोगों को डेथ सेंटेंस सुनाने के कारण विवादित हो गए थे. इसके बाद उनके पास लंबित हत्या के लगभग 97 मामलों को अन्य कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया गया था. इस दौरान उन्हें धमकी भी मिली थी लेकिन इन सब पर ध्यान न देते हुए जज ने 7 सितंबर को एक अन्य शख्स को मौत की सजा सुनाई. इस केस में आरोपी ने अपनी 23 साल की पत्नी को जिंदा जलाकर मार दिया था. 

जज ने आरोपी को दोषी करार देकर मौत की सजा सुनाई. अपने आदेश में जज दिवाकर ने कहा कि वो आपराधिक नेटवर्क या अंतरराष्ट्रीय आतंकी धमकियों के डर से काम करने के बजाय 'मरना पसंद' करेंगे. जज दिवाकर ने कहा,

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अगर मैं दूसरी ताकतों से डरने लगूं तो मेरे लिए इस पवित्र न्यायिक संस्थान से इस्तीफा देना ही सही होगा. मैं मरना पसंद करूंगा, लेकिन कायर जज नहीं कहलाना चाहूंगा. जब तक मैं अपने सिद्धांतों का पालन कर सकता हूं. मैं सर्विस में बना रहूंगा. जब तक मैं जज की कुर्सी पर हूं, फैसले लेने का अधिकार सिर्फ मेरा होगा.

जज ने आगे कहा कि उनके माता-पिता ने उन्हें शुरू से ही सिखाया था कि हमेशा ईश्वर से डरो. किसी और इंसान से नहीं. अगर वो ईश्वर के अलावा किसी अपराधी से डरते हैं तो ये उन आम लोगों की उम्मीदों के बिल्कुल उलट होगा, जो अदालतों में यह सोचकर आते हैं कि जज निष्पक्ष, निडर और साहसी होंगे और बिना किसी डर के अपने न्यायिक कर्तव्यों का पालन करेंगे.

अगस्त (2026) में ही जज रवि दिवाकर के पास लंबित हत्या के 97 मामले दूसरे जज को सौंप दिए गए थे. अपने आदेश में उन्होंने इसका भी जिक्र किया और कहा कि ऐसा करने के पीछे माफिया, गैंगस्टर और अपराधियों को बचाने का मकसद था. 

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उन्होंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक माफिया या गैंगस्टर की तरफ से मिले मैसेज का जिक्र करते हुए कहा कि उन्हें धमकी दी गई थी कि अगर संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई की गई या कोई टिप्पणी की गई तो उनके रसूख का इस्तेमाल करके उनकी कोर्ट बदलवा दी जाएगी. या उनका जिले से बाहर तबादला करवा दिया जाएगा.

ये भी पढ़ें: 100 दिनों में 17 मौत की सजा देने वाले जज रवि कुमार दिवाकर कौन हैं?

ट्रायल कोर्ट की सजा

बता दें कि ट्रायल कोर्ट किसी दोषी को मौत की सजा सुना तो सकता है लेकिन फैसले को लागू करने से पहले हाईकोर्ट की मंजूरी जरूरी है. मुजफ्फरनगर ट्रायल कोर्ट ने दोषियों को मौत की सजा सुनाई है. उनकी सजाओं को मंजूरी के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट भेजा जाएगा. कोई दोषी खुद भी सेंटेंस के खिलाफ अपील दायर कर सकता है.

वीडियो: ‘कायर जज कहलाने के बजाय…’ 5 महीनों में 23 लोगों को मौत की सजा सुनाने वाले जज क्या बोले?

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