The Lallantop

सुप्रीम कोर्ट ने 3 तरह के सेक्स वर्कर बताए, कहा- 'तीसरे को परेशान न किया जाए'

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जो महिलाएं अपनी मर्जी से सेक्स वर्कर बने रहना चाहती हैं, उन पर कोई आपराधिक कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए. इसके अलावा कोर्ट ने ये भी कहा कि मानव तस्करी कर सेक्स वर्क में धकेली गई महिलाओं को रेस्क्यू करके समाज की मुख्यधारा में वापसी से पहले उनकी मर्जी जानना जरूरी है कि वो ऐसा करने के लिए तैयार हैं या नहीं.

Advertisement
post-main-image
सुप्रीम कोर्ट ने सेक्स वर्कर्स के रेस्क्यू पर अहम टिप्पणी की है. (फोटो- India Today)

सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा है कि अपनी मर्जी से सेक्स वर्कर बनी महिलाओं को प्रताड़ित नहीं किया जाना चाहिए और सेक्स वर्कर्स के रेस्क्यू के दौरान ऐसी महिलाओं की मर्जी जानना जरूरी है कि वो इसके लिए तैयार हैं या नहीं. 

Add Lallantop as a Trusted Sourcegoogle-icon
Advertisement

शीर्ष अदालत ने कहा है कि अगर कमर्शियल सेक्स के लिए मानव तस्करी की जाती है या फिर किसी को धोखे या जबरदस्ती से देह व्यापार के लिए मजबूर किया जाता है तब ‘अनैतिक व्यापार रोकथाम एक्ट’ (ITPA) के तहत कार्रवाई की जानी चाहिए. 

'मर्जी से सेक्स वर्कर बनी महिलाओं को परेशान न किया जाए'

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सेक्स वर्कर्स के पुनर्वास यानी उन्हें रेस्क्यू कर समाज की मुख्यधारा में वापसी की प्रक्रिया में भी जबरदस्ती नहीं की जानी चाहिए. यानी ऐसा करने से पहले सेक्स वर्कर्स की सहमति ली जानी जरूरी है. 

Advertisement

मौजूदा कानून में सेक्स वर्कर्स के रेस्क्यू और पुनर्वास में एक ही तरह का नियम लागू किया जाता है, लेकिन कोर्ट का कहना है कि सबके लिए एक जैसी व्यवस्था नाइंसाफी होगी. कोर्ट ने कहा कि भले ही सेक्स वर्क को कानूनी अधिकार न माना जाए, लेकिन सेक्स वर्कर्स के नागरिक अधिकार हो सकते हैं. 

देह व्यापार को रोकने के लिए बने कानून ITPA की समीक्षा करते हुए कोर्ट ने कहा कि इस कानून का मकसद न तो वेश्यावृत्ति को खत्म करना है और न ही इसे अपराध बनाना है बल्कि इसके कमर्शियलाइजेशन को रोकना है. यानी वेश्यावृत्ति को संगठित रोजगार का साधन बनने से रोकना है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस कानून के तहत सेक्स वर्कर्स के रेस्क्यू में एक ही तरह का नजरिया अपनाना गलत है. क्योंकि सबको एक ही लाठी से नहीं हांका जा सकता. 

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, अपने 297 पन्नों के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने तस्करी करके लाई गई महिलाओं और अपनी मर्जी से देह व्यापार में शामिल होने वाली महिलाओं में फर्क करने की कोशिश की. कोर्ट ने कहा कि अभी जो कानून है वो वेश्यावृत्ति और तस्करी को एक जैसा मानकर चलता है. 

Advertisement

अदालत ने सेक्स वर्कर्स के तीन अलग-अलग ग्रुपों की पहचान की है. उनके मुताबिक, 

- एक वह ग्रुप है, जिसमें लड़कियों या महिलाओं को तस्करी करके लाया जाता है. उनकी मर्जी के खिलाफ उन्हें सेक्स व्यापार में धकेला जाता है. 

- वहीं कुछ ऐसी महिलाएं भी हैं जो तस्करी करके लाई गईं, लेकिन अपनी मर्जी से देह व्यापार में बनी रहीं. 

- कोर्ट ने एक तीसरी कैटेगरी की भी पहचान की जिसमें वो महिलाएं शामिल थीं जिन्होंने अपनी मर्जी से सेक्स वर्क को चुना और वो इसमें बने रहना चाहती हैं.

एक जैसा तरीका ठीक नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन तीनों कैटेगरी की सेक्स वर्कर्स पर रेस्क्यू और रिहैबिलिटेशन का एक जैसा तरीका लागू नहीं किया जा सकता. इससे अन्यायपूर्ण नतीजे आ सकते हैं. कोर्ट ने कहा कि मौजूदा कानूनी ढांचे के तहत इन सभी लोगों के मामले बिना किसी भेदभाव के धारा 17 के तहत एक ही प्रक्रिया से गुजारे जाते हैं. लेकिन कमर्शियल यौन शोषण (CSE) से निपटने के लिए ‘अनैतिक तस्करी रोकथाम अधिनियम’ (ITPA) के इस्तेमाल में एक ही तरह का नजरिया अपनाना गलत है. 

पुलिस से भी रक्षा

इसकी काट के तौर पर सुप्रीम कोर्ट ने ‘पीड़िता संरक्षण योजना’ तैयार की है, जिसमें अपनी मर्जी से देह व्यापार में रहने वाली महिलाओं के अधिकारों के संरक्षण की बात कही गई है. कोर्ट ने सरकार से आग्रह किया कि तस्करी के जरिए सेक्स व्यापार में लाई गई महिलाओं को वेश्यावृत्ति के आरोपों से छूट देने को लेकर कानून में संशोधन पर विचार करे. कोर्ट ने यह मांग भी की है कि जो नया कानून बने, वह हिरासत में पुलिस से यौन शोषण से सेक्स वर्कर्स की रक्षा करे. 

कोर्ट ने मानव तस्करों से पुलिस की मिलीभगत की रिपोर्ट्स का जिक्र करते हुए कहा कि नए कानून में उन पुलिस वालों पर कार्रवाई की व्यवस्था हो, जो हिरासत में किसी पीड़िता को यौन संबंधों के लिए मजबूर करते हैं. ऐसे पुलिसकर्मी भी इस कार्रवाई के दायरे में आएं जो पीड़िता को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने में देरी करते हैं. इसे गलत तरीके से हिरासत में रखने का केस माना जाए.

हिरासत से छूट 

कोर्ट ने अपनी बात दोहराई कि जो महिलाएं अपनी मर्जी से सेक्स वर्क करना चाहती हैं और वयस्क हैं, उन्हें रेस्क्यू और हिरासत की प्रक्रियाओं से छूट देनी चाहिए. ये प्रक्रियाएं मानव तस्करी की पीड़िताओं के लिए बनाई गई हैं. कोर्ट के कहने का मतलब था कि जो अपनी मर्जी से सेक्स वर्क करना चाहती हैं, उनके रेस्क्यू का सवाल ही नहीं है. ऐसे में पुलिस को ITPA के तहत ऐसी महिलाओं को हिरासत में लेने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए. 

कोर्ट ने इसके लिए बुद्धदेव कर्मस्कर केस का जिक्र किया, जिसमें साफतौर पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अपनी मर्जी से यौन कर्म करना गैर कानूनी नहीं है, लेकिन वेश्यालय चलाना कानून के खिलाफ है.

ऐसे में कोठे पर छापेमारी के दौरान उन लोगों को हिरासत में नहीं लेना चाहिए जो अपनी मर्जी से देह व्यापार में शामिल हैं. कोर्ट ने कहा कि सेक्स वर्कर्स का पुनर्वास जबरदस्ती वाला नहीं होना चाहिए.

छापेमारी की शर्तें

कोठे पर छापेमारी को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट ने कुछ प्रोसेस तय किए हैं. इसमें कहा गया कि छापेमारी के दौरान किसी के साथ मौखिक या शारीरिक रूप से बदसलूकी नहीं की जाएगी. किसी के साथ बेमतलब शारीरिक बल प्रयोग यानी मारपीट नहीं की जाएगी. छापेमारी करने गए लोगों को पहले ये पता लगाना होगा कि जिन सेक्स वर्कर्स का रेस्क्यू करने वो गए हैं, वो अपनी मर्जी से इस काम में शामिल हैं या नहीं.

कोर्ट ने ऑपरेशन के दौरान किसी भी तरह की फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी पर भी रोक लगाई और कहा कि अगर वीडियो बनाया भी जा रहा हो तो ये तय किया जाना चाहिए कि पीड़िता उस वीडियो में न आने पाएं.

वीडियो: अभिषेक बनर्जी पर हमला, बीजेपी और टीएमसी ने एक-दूसरे पर की आरोपों की बौछार

Advertisement