जंतर-मंतर. नीट पेपर लीक को लेकर प्रदर्शन हुआ. इस दौरान दिल्ली पुलिस पर फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी और बायोमेट्रिक सर्विलांस के इस्तेमाल के आरोप लगे. इसके खिलाफ लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई. शीर्ष कोर्ट अब इस याचिका पर सुनवाई के लिए सहमत हो गया है. कोर्ट ने कहा कि इस मामले में पेंडिंग दूसरी याचिकाओं के साथ इस पर भी सुनवाई की जाएगी.
जंतर-मंतर पर पुलिस ने AI चश्मों से नागरिकों का डेटा जुटाया? सुप्रीम कोर्ट पहुंचा केस
पेपर लीक के खिलाफ जंतर मंतर पर हुए छात्रों के प्रोटेस्ट के दौरान दिल्ली पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों की पहचान के लिए फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. शीर्ष अदालत ने इस मामले में दाखिल की गई याचिका पर सुनवाई की सहमति दे दी है.

CPI(M) के राज्यसभा सांसद ने दायर की याचिका
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने इस याचिका को जंतर-मंतर से जुड़ी दूसरी याचिकाओं के साथ जोड़ने का आदेश दिया है. कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया मार्क्सिस्ट CPI(M) के राज्यसभा सांसद एए रहीम ने यह याचिका दायर की है. याचिका में कहा गया है कि पुलिस ने गैरकानूनी तरीके से इस तकनीक का इस्तेमाल किया है. कोर्ट इसे असंवैधानिक घोषित करके इस तकनीक के इस्तेमाल पर रोक लगाए और इकट्ठा किए गए बायोमेट्रिक डेटा को डिलीट करने का आदेश दे.
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच के सामने याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर वकील मेनका गुरुस्वामी पेश हुईं. उन्होंने कहा कि जंतर-मंतर पर AI बेस्ड स्मार्ट चश्मे और 'स्पेशल मॉनिटरिंग व्हिकल्स' का इस्तेमाल करके बिना किसी सहमति के नागरिकों का डेटा इकट्ठा किया गया.
याचिकाकर्ता की ओर से दावा किया गया कि दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शनकारियों की मॉनिटरिंग के लिए दो प्राइवेट संस्थाओं, 'आदित्य इन्फोटेक लिमिटेड' और 'डायमेंशन NXG प्राइवेट लिमिटेड' की सर्विसेज लीं. उनकी ओर से तर्क दिया गया कि पुलिस के पास मॉनिटरिंग प्रोसेस अपनाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है. पुलिस कार्रवाई से जुड़ी नियमावली या क्रिमिनल प्रोसीजर (आइडेंटिफिकेशन) एक्ट, 2022 किसी पब्लिक मीटिंग में शामिल लोगों की इस तरह बायोमेट्रिक पहचान की अनुमति नहीं देते हैं.
ये भी पढ़ें - क्या आपको 'भूल जाने का अधिकार' है? सुप्रीम कोर्ट सुनवाई के लिए तैयार हो गया है
बायोमेट्रिक डेटा को बताया सेंसिटिव
याचिकाकर्ता ने कहा कि इस तरह से जुटाया गया सेंसेटिव बायोमेट्रिक डेटा प्राइवेट संस्थाओं के पास रखा जाना डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट, 2023 के नियमों का उल्लंघन है. मेनका गुरुस्वामी ने बताया,
साल 2017 में निजता के अधिकार को लेकर के. एस. पुट्टास्वामी मामले में आया फैसला साफ कहता है कि निजता (प्राइवेसी) का उल्लंघन करने वाली सरकारी कार्रवाई की वैधता की जांच होनी चाहिए.
राज्यसभा सांसद की याचिका में ये मांग भी की गई है कि पुलिस और प्राइवेट वेंडर की तरफ से इस्तेमाल की जा रही तकनीकों, डेटाबेस और कमर्शियल एग्रीमेंट्स की क्लियर कट जानकारी दी जानी चाहिए. उन्होंने प्रभावित नागरिकों को उनका डेटा देखने और एक शिकायत निवारण तंत्र की फैसिलिटी देने की मांग की है, ताकि वह अपने डेटा को स्थायी तौर पर नष्ट करवा सकें.
वीडियो: जंतर मंतर पर प्रोटेस्ट वाली जगह क्या शुरू हुआ?











