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यूपी पुलिस ने बेगुनाह को सालों जेल में सड़ाया, सुप्रीम कोर्ट की बात एक-एक अफसर को बहुत चुभेगी

हत्या के मामले में करीब 6 साल जेल में बिताने के बाद बरी हुए व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट ने मुआवजा देने का आदेश दिया है. कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से कहा है कि वो जेल में बिताए वक्त के मुआवजे के तौर पर शख्स को 6 लाख रुपये दे. तय समय पर अगर ये रकम नहीं दी जाती है तो इस पर 18 फीसदी सालाना ब्याज लगाया जाएगा.

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सुप्रीम कोर्ट ने यूपी पुलिस को फटकार लगाई है. (फोटो- India Today)

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  • सुप्रीम कोर्ट ने यूपी पुलिस को निर्देश दिया कि वे अफसरों को सही जांच करने की विधि सिखाएं और जांच में हुई लापरवाही पर कठोर कार्रवाई करें।
  • आगरा में 14 नवंबर 2019 से जेल में बंद व्यक्ति की गलत जांच और आरोपों के बाद छह साल की कैद हुई, जिस कारण सुप्रीम कोर्ट ने मामले में सुधार के निर्देश दिए।
  • सुप्रीम कोर्ट ने अपराधी न पाए जाने पर व्यक्ति को छह लाख रुपये मुआवजा देने और चूंकि भुगतान में देरी हुई तो 18 फीसदी ब्याज लगाने का आदेश दिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने यूपी पुलिस को फटकार लगाते हुए कहा है कि वो अपने अफसरों को ठीक से सिखाए कि जांच कैसे की जाती है. मामला अपहरण और हत्या के आरोप में 6 साल जेल में बिताने के बाद रिहा हुए व्यक्ति की याचिका से जुड़ा है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ट्रायल कोर्ट में तीन महीने तक चले मुकदमे में उसे बरी कर दिया गया. 

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इसी बात पर सुप्रीम कोर्ट भड़क गया. कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से कहा है कि वो जेल में बिताए वक्त के मुआवजे के तौर पर शख्स को 6 लाख रुपये दे. तय समय पर अगर ये रकम नहीं दी जाती है तो इस पर 18 फीसदी सालाना ब्याज लगाया जाएगा.

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

TOI की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने लापरवाही से की गई जांच और अभियोजन पक्ष की बेतरतीब कार्रवाई की कड़ी आलोचना की. कोर्ट ने कहा कि सिर्फ अंदाजों और अटकलों के आधार पर कहानी गढ़कर उस व्यक्ति को जेल में रखा गया. गलत जांच की वजह से उसके जीवन के 6 साल बर्बाद हुए. मामले में बुनियादी स्तर पर जांच तक नहीं की गई. ये सब ‘न्याय का मजाक’ है. 

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सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि अभियोजन पक्ष की ओर से ट्रायल कोर्ट में जो सबूत पेश किए गए थे, वो साबित ही नहीं हुए. इसमें इलेक्ट्रॉनिक सबूत भी शामिल हैं. ये केस इस बात का उदाहरण है कि जांच किस तरह नहीं की जानी चाहिए. ऐसी जांच के कारण किसी भी व्यक्ति की जिंदगी और उसकी आजादी खतरे में डाल दी जाती है. बेंच ने कहा, 

हम राज्य सरकार को निर्देश देते हैं कि वह याचिकाकर्ता को एक महीने के भीतर 6 लाख रुपये का भुगतान करे. हालांकि, जेल में बिताए गए सालों के मुकाबले यह रकम बहुत मामूली है.

कोर्ट ने ये भी कहा कि अगर तय समय पर ये रकम व्यक्ति को नहीं दी जाती है तो इस पर 18 फीसदी सालाना ब्याज लगेगा.  

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‘नागरिकों की सुरक्षा राज्य की जिम्मेदारी’

कोर्ट ने कहा कि जब तक अपराध साबित न हो जाए तब तक किसी भी आरोपी को निर्दोष माना जाता है. राज्य अपने नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता. अभियोजन पक्ष या जांच एजेंसियों का काम सिर्फ किसी तरह दोषी को सजा दिलाना नहीं है. उनका काम ये भी है कि सभी पक्षों को इंसाफ मिले. इसमें आरोपी के साथ भी न्याय होना शामिल है. 

कोर्ट ने कहा कि उसके सामने न्याय व्यवस्था के फेल होने के कई मामले आते हैं, लेकिन ये एकदम अलग है और काफी गंभीर है. ऐसे मामलों में आरोपी को हुए नुकसान की भरपाई की जानी चाहिए, क्योंकि इस मामले में वह खुद ‘न्याय व्यवस्था की नाकामी का शिकार’ बना है.  

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अफसरों को फैसले की कॉपी भेजने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने निर्देश दिया कि उसके फैसले की एक कॉपी यूपी पुलिस के महानिदेशक और यूपी के गृह सचिव को भी भेजी जाए. यूपी पुलिस को फटकारते हुए कोर्ट ने कहा कि वह अपने अधिकारियों को सिखाए कि सही जांच कैसे की जाती है. 

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट में याचिका डालने वाला व्यक्ति आगरा में दर्ज हत्या के एक मामले में 14 नवंबर 2019 से जेल में बंद था. इसी साल मार्च (2026) में सुप्रीम कोर्ट में उसकी बेल के लिए दाखिल याचिका पर सुनवाई हुई. तब कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को तीन महीने के भीतर मुकदमे की सुनवाई पूरी करने का निर्देश दिया. ट्रायल कोर्ट में सुनवाई पूरी हुई और याचिकाकर्ता को बरी कर दिया गया. 

सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को अपने पास मंगाया ताकि वो जान पाए कि अभियोजन पक्ष (बचाव पक्ष) ने इस मामले को किस तरह से आगे बढ़ाया था. शीर्ष अदालत ने कहा कि गलत जांच से उस व्यक्ति की जिंदगी और आजादी पर जो असर पड़ा, उसे देखते हुए उसका बरी होना राहत की बात है.

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