सुप्रीम कोर्ट में प्रेस की आजादी को बचाने की मांग उठी. 'डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन' (DNPA) ने सर्वोच्च अदालत में डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट के खिलाफ याचिका दायर की है. DNPA ने दावा किया कि केंद्र सरकार के इस कानून के कुछ प्रावधान और इससे जुड़े नियम पत्रकारिता के लिए खतरा हैं. खासकर, इन्वेस्टिगेशन रिपोर्टिंग और लाइव रिपोर्टिंग के लिहाज से ज्यादा दिक्कत हो सकती है. DNPA ने इस कानून के कुछ प्रावधानों और उनसे जुड़े नियमों को रद्द करने की मांग की है. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है.
'इस कानून से न्यूजरूम बंद हो जाएंगे', मीडिया ग्रुप्स डेटा एक्ट के खिलाफ पहुंचे सुप्रीम कोर्ट
डिजिटल मीडिया ऑर्गेनाइजेशन (DNPA) ने सुप्रीम कोर्ट में डेटा प्रोटेक्शन कानून के खिलाफ याचिका दाखिल की है. डीएनपीए ने तर्क दिया है कि मीडिया की स्वतंत्रता और पत्रकारों के काम करने की आजादी लोकतंत्र के लिए जरूरी है.

मंगलवार, 27 अक्टूबर को भारत के चीफ जस्टिस (CJI) जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और वी मोहना की बेंच ने DNPA की याचिका पर सुनवाई की. DNPA की तरफ से सीनियर एडवोकेट माधवी दीवान ने पक्ष रखा.
केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट का नोटिसDNPA ने पिटिशन में कहा कि डेटा प्रोटेक्शन कानून भारत के संविधान के तहत मिले सूचना के अधिकार पर हमला है. यह बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकारों पर पाबंदी लगाता है. बेंच ने पिटिशन पर केंद्र सरकार का रुख जानने के लिए नोटिस जारी किया है.
लीगल वेबसाइट लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, संविधान के आर्टिकल 32 के तहत फाइल की गई इस पिटिशन में DPDP एक्ट के सेक्शन 7, 17(2), 18, 19, 27, 29, 36, 37 और 44(3) को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई है. इसमें DPDP रूल्स, 2025 के रूल्स 16, 17 और 23 को भी चुनौती दी गई है.
डिजिटल मीडिया ऑर्गेनाइजेशंस के एसोसिएशन ने तर्क दिया कि ये प्रावधान और नियम इन्वेस्टिगेशन रिपोर्टिंग के काम में रुकावट डाल सकते हैं. याचिका में इस कानून की धारा 37(1) पर भी सवाल खड़े किए. ये धारा केंद्र सरकार को खास हालात में पब्लिक को जानकारी देने से मना करने का अधिकार देती है.
DNPA ने सुप्रीम कोर्ट में एक और समस्या का हवाला दिया. उसने कहा कि डेटा प्रोटेक्शन कानून और उसके नियम पत्रकारों के सोर्स के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं. इस कानून की आड़ लेकर सरकार पत्रकारों के गोपनीय सूत्रों को टारगेट कर सकती है. उन सूत्रों की पहचान उजागर कर सकती है.
DNPA की तरफ से पेश सीनियर एडवोकेट माधवी दीवान ने चैलेंज किए गए प्रावधानों पर स्टे लगाने की मांग की. माधवी दीवान ने दलील दी,
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने क्या कहा?"ये 'लेगेसी मीडिया' की पहली पूरी पिटिशन है. हम पारंपरिक, कन्वेंशनल लेगेसी मीडिया हैं. इससे न्यूज का पूरा कॉन्सेप्ट बदल जाएगा. अगर मुझे डेटा प्रिंसिपल (जिसका डेटा है) की मर्जी पर छोड़ दिया गया कि वो मंजूरी देगा या नहीं, तो न्यूज का कॉन्सेप्ट ही खत्म हो जाएगा... न्यूज नई होनी चाहिए. इससे न्यूजरूम बंद हो जाएंगे. अगर मुझे परमिशन और मंजूरी मांगनी पड़े तो इसका क्या मतलब है?"
CJI सूर्यकांत ने कहा कि याचिकाकर्ता केंद्र सरकार को उन तरीकों के बारे में सुझाव दे सकता है, जिनसे उनकी पत्रकारिता की सुरक्षा हो सकती है. CJI ने कहा,
"आप अपने क्षेत्र के एक्सपर्ट्स हैं. आप ही सबसे बेहतर बता सकते हैं कि केंद्र सरकार और हमें ये कैसे पक्का किया जाए कि इसका (डेटा प्रोटेक्शन कानून) कोई गलत इस्तेमाल नहीं होगा."
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने जोर दिया कि लोगों और मीडिया के अधिकारों के बीच बैलेंस बनाना होगा.
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RTI एक्ट को भी चुनौती दीDNPA ने राइट टू इन्फॉर्मेशन (RTI) एक्ट की धारा 8(1)(j) में किए गए संशोधन को भी चुनौती दी. DNPA का आरोप है कि इस बदलाव से सरकारी अधिकारियों से जुड़ी जानकारी हासिल करने में दिक्कत होती है. इसके तहत, मामला पब्लिक इंटरेस्ट का ना होने का हवाला देकर जानकारी देने से मना किया जा सकता है. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई 17 नवंबर को होगी.
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