सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा पाए दोषियों को फांसी देने के मौजूदा तरीके को बदलने की मांग वाली याचिका मंगलवार को खारिज कर दी. यानी फिलहाल भारत में मौत की सजा पाए कैदियों को फांसी देकर मौत देने की व्यवस्था जारी रहेगी. हालांकि कोर्ट ने केंद्र सरकार के लिए इस पूरे मुद्दे की वैज्ञानिक, चिकित्सकीय और कानूनी समीक्षा का रास्ता बंद नहीं किया है.
फांसी ही रहेगी या बदलेगा मौत की सजा देने का तरीका? सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की याचिका, लेकिन सरकार के लिए खुला रास्ता
सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा को फांसी के बजाय lethal injection, shooting या electrocution से लागू करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है. फिलहाल भारत में फांसी से मौत की सजा देने की व्यवस्था जारी रहेगी. हालांकि कोर्ट ने केंद्र सरकार को वैज्ञानिक, चिकित्सकीय और कानूनी आधार पर वैकल्पिक तरीकों की समीक्षा करने की गुंजाइश दी है.

समाचार एजेंसी ANI के मुताबिक, जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने उन याचिकाओं पर सुनवाई की, जिनमें दलील दी गई थी कि फांसी की प्रक्रिया में पीड़ा और तकलीफ की संभावना रहती है. याचिकाकर्ताओं ने मांग की थी कि मौत की सजा को लागू करने के लिए कोई ज्यादा मानवीय और गरिमापूर्ण तरीका तलाशा जाए. इनमें जहरीले इंजेक्शन, गोली मारने और बिजली के झटके जैसे विकल्पों पर विचार करने की मांग भी शामिल थी.
सुप्रीम कोर्ट ने असल में क्या कहा?
इस मामले को समझने के लिए एक बात सबसे पहले साफ करना जरूरी है. सुप्रीम कोर्ट के सामने सवाल ये नहीं था कि भारत में मौत की सजा होनी चाहिए या नहीं. सवाल था कि अगर किसी व्यक्ति को कानून के मुताबिक मौत की सजा दी जाती है, तो उसे लागू करने का तरीका क्या होना चाहिए.
कोर्ट ने मौजूदा व्यवस्था में बदलाव का आदेश नहीं दिया. इसका सीधा मतलब है कि अभी फांसी की व्यवस्था कायम रहेगी. मौजूदा कानून में भी मौत की सजा सुनाए जाने पर व्यक्ति को गर्दन से तब तक फांसी देने का प्रावधान है, जब तक उसकी मौत न हो जाए. ये प्रावधान ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता’ (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita), 2023 की धारा 393(5) में है.
लेकिन फैसले का दूसरा हिस्सा भी उतना ही अहम है. कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार चाहे तो मौजूदा व्यवस्था की व्यापक समीक्षा कर सकती है. अगर भविष्य में कोई नया वैज्ञानिक या चिकित्सकीय सबूत सामने आता है, जिससे ये साबित हो कि किसी दूसरे तरीके से कम पीड़ा के साथ मौत की सजा लागू की जा सकती है, तो इस मुद्दे पर दोबारा विचार की संभावना बनी रह सकती है.
फांसी को चुनौती क्यों दी गई थी?
‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के मुताबिक याचिकाकर्ताओं की दलील का केंद्र 'गरिमा' और 'पीड़ा' था. उनका कहना था कि मौत की सजा मिलने के बाद भी किसी व्यक्ति के साथ ऐसा तरीका नहीं अपनाया जाना चाहिए, जिसमें अनावश्यक शारीरिक कष्ट या अमानवीय स्थिति पैदा हो.
इसी वजह से जहरीले इंजेक्शन (lethal injection), गोली मारने (shooting) और बिजली के झटके (electrocution) जैसे विकल्पों का सवाल उठा. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इनमें से किसी एक तरीके को बेहतर या ज्यादा मानवीय घोषित नहीं किया. कोर्ट ने ये भी नहीं कहा कि सरकार को तुरंत फांसी हटाकर किसी दूसरे तरीके को लागू करना चाहिए.
दरअसल, भारत में इस मुद्दे पर बहस नई नहीं है. 1983 में सुप्रीम कोर्ट ने दीना उर्फ दीनदयाल (Deena alias Deen Dayal) मामले में फांसी और दूसरे तरीकों पर विस्तार से चर्चा की थी. उस फैसले में अदालत के सामने जहरीले इंजेक्शन, गोली मारने और बिजली के झटके जैसे तरीकों की तुलना से जुड़े तर्क भी आए थे.
क्या जहरीला इंजेक्शन ज्यादा मानवीय है?
सिर्फ नाम सुनकर ऐसा मान लेना आसान है कि जहरीला इंजेक्शन अपने आप फांसी से ज्यादा मानवीय होगी. लेकिन कानूनी और चिकित्सकीय स्तर पर मामला इतना सीधा नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले में भी इस बात पर चर्चा हुई थी कि अलग-अलग तरीकों की अपनी व्यावहारिक और चिकित्सकीय समस्याएं हैं. अदालत ने उस समय ये निष्कर्ष दर्ज किया था कि बिजली के झटके, जहरीली गैस, गोली मारने या जहरीले इंजेक्शन में से किसी के पास फांसी की तुलना में ऐसा स्पष्ट और निर्णायक लाभ साबित नहीं हुआ था, जिसके आधार पर फांसी को अनिवार्य रूप से बदला जाए.
यही वजह है कि मौजूदा मामले में भी वैज्ञानिक और मेडिकल प्रमाण को महत्वपूर्ण माना गया है. अगर भविष्य में मजबूत सबूत सामने आता है कि कोई वैकल्पिक तरीका कम दर्दनाक, ज्यादा निश्चित और गरिमापूर्ण है, तो सरकार उस पर विचार कर सकती है.
कानून में अभी क्या व्यवस्था है?
भारत में मौत की सजा का मामला केवल अंतिम सजा सुनाए जाने तक सीमित नहीं रहता. मौत की सजा को लागू करने से पहले कई न्यायिक चरण होते हैं. BNSS में सजा-ए-मौत (death sentence) को हाई कोर्ट से कंफर्म कराने की प्रक्रिया से लेकर उसके एक्जीक्यूशन, सुप्रीम कोर्ट में अपील और दया याचिका (mercy petition) तक अलग-अलग प्रावधान मौजूद हैं.
मौजूदा कानूनी व्यवस्था में एक्जीक्यूशन का तरीका भी स्पष्ट है. BNSS की धारा 393(5) कहती है कि जब किसी व्यक्ति को मौत की सजा दी जाती है तो जज में उसे गर्दन से तब तक फांसी देने का निर्देश होगा, जब तक उसकी मौत न हो जाए.
इसलिए सुप्रीम कोर्ट के मंगलवार के फैसले का तत्काल असर यही है कि इस कानूनी व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं हुआ है.
जनवरी में सुरक्षित रखा था फैसला
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने 22 जनवरी 2026 को अपना फैसला सुरक्षित रखा था. सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड में उस तारीख के आदेश और जस्टिस विक्रम नाथ तथा जस्टिस संदीप मेहता के नाम दर्ज हैं.
अब 18 अगस्त को फैसला सामने आने के बाद स्थिति कुछ इस तरह है-
फांसी फिलहाल जारी रहेगी, कोर्ट ने वैकल्पिक तरीका खुद तय नहीं किया है, लेकिन केंद्र चाहे तो पूरे मुद्दे की विशेषज्ञों के जरिए समीक्षा कर सकता है.
आगे क्या हो सकता है?
इस फैसले को 'फांसी हमेशा के लिए बरकरार' कह देना भी पूरी तस्वीर नहीं होगी. ज्यादा सही बात ये है कि सुप्रीम कोर्ट ने मौजूदा व्यवस्था को हटाने का आदेश नहीं दिया, लेकिन भविष्य की नीति समीक्षा की संभावना खुली रखी है.
ये भी पढ़ें: भारत में एक पोस्ट, इजरायल में हंगामा, फिर नेतन्याहू के भाषण में कैसे पहुंचा ईरान का 'फर्जी बयान'?
अगर केंद्र सरकार इस विषय पर आगे बढ़ती है तो वैज्ञानिकों, चिकित्सकों, कानूनी विशेषज्ञों और जेल प्रशासन से जुड़े विशेषज्ञों की राय ली जा सकती है. इसके बाद ये देखा जा सकता है कि कोई वैकल्पिक तरीका वास्तव में कम पीड़ा वाला और ज्यादा गरिमापूर्ण है या नहीं.
यानी 18 अगस्त 2026 का फैसला फांसी की रस्सी को बदलने का फैसला नहीं है. लेकिन इस बहस पर आखिरी दरवाजा भी बंद नहीं हुआ है. फिलहाल भारत में मौत की सजा लागू करने का तरीका फांसी ही रहेगा. भविष्य में अगर ठोस वैज्ञानिक और चिकित्सकीय सबूत किसी दूसरे तरीके के पक्ष में आता है, तो केंद्र सरकार इस व्यवस्था की समीक्षा कर सकती है.
वीडियो: गेस्ट इन द न्यूजरूम: कसाब को फांसी से सलमान केस तक, उज्ज्वल निकम ने क्या-क्या बता दिया?









