"देश के वकीलों का चुनाव कौन करता है?" सवाल थोड़ा अजीब लग सकता है. क्योंकि आम तौर पर चुनाव की बात आते ही संसद, विधानसभा या नगर निकाय याद आते हैं. लेकिन वकीलों की अपनी वैधानिक (statutory) व्यवस्था है, जिसमें स्टेट बार काउंसिल (State Bar Councils) से लेकर बार काउंसिल ऑफ इंडिया (Bar Council of India) यानी BCI तक पूरा ढांचा बनाया गया है. अब इसी व्यवस्था के शीर्ष पर मौजूद बीसीआई चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा (Manan Kumar Mishra) की कुर्सी को लेकर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने गंभीर सवाल उठाए हैं.
BCI चेयरमैन की कुर्सी पर सुप्रीम कोर्ट ने क्यों उठाए सवाल? आखिर बार काउंसिल चलता कैसे है?
BCI चेयरमैन Manan Kumar Mishra को Supreme Court ने permanent chairman नहीं, pro tem chairman बताया. मामला सिर्फ एक व्यक्ति की कुर्सी का नहीं, Bar Council of India की चुनावी व्यवस्था और उसके कामकाज से जुड़ा है

2 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मनन मिश्रा की मौजूदा स्थिति को नए इलेक्टेड बार काउंसिल ऑफ इंडिया के गठन तक चलने वाली प्रो टर्म यानी अस्थायी व्यवस्था के तौर पर देखा जाना चाहिए. कोर्ट ने ये भी साफ किया कि इस स्थिति को 2030 तक चेयरमैन बने रहने के लोकतांत्रिक जनादेश (mandate) के तौर पर नहीं देखा जा सकता.
पहले समझिए BCI आखिर है क्या
बार काउंसिल ऑफ इंडिया कोई प्राइवेट लॉयर्स एसोसिएशन (private lawyers' association) नहीं है. इसे Advocates Act, 1961 के तहत संवैधानिक संस्था (statutory body) बनाया गया है. कानून के मुताबिक BCI में अटार्नी जनरल ऑफ इंडिया (Attorney General of India) और भारत के सॉलिसिटर जनरल पदेन सदस्य (Solicitor General of India ex-officio member) होते हैं. इसके अलावा हर स्टेट बार काउंसिल अपने सदस्यों में से एक प्रतिनिधि BCI के लिए चुनता है. इसी काउंसिल के सदस्य अपने बीच चेयरमैन और वाइस चेयरमैन का चुनाव करते हैं.
यानी आसान भाषा में समझिए तो BCI का चेयरमैन सीधे देशभर के वकीलों से वोट लेकर नहीं चुना जाता. पहले स्टेट बार काउंसिल के चुनाव होते हैं. फिर स्टेट बार काउंसिल से BCI के सदस्य आते हैं. और BCI के सदस्य अपने चेयरमैन और वाइस चेयरमैन का चुनाव करते हैं.
राज्य बार काउंसिल का काम क्या है
वकील बनने की शुरुआती संवैधानिक प्रक्रिया स्टेट बार काउंसिल से जुड़ी होती है. एडवोकेट एक्ट के तहत स्टेट बार काउंसिल वकीलों के पंजीकरण (enrolment) से जुड़े काम करती हैं और अपने क्षेत्र के वकीलों के रिकॉर्ड मेनटेन करती हैं. किसी लॉ ग्रेजुएट को वकील के रूप में स्टेट रोल पर शामिल करने की व्यवस्था भी इसी ढांचे का हिस्सा है.
स्टेट बार काउंसिल, प्रोफेशनल मिस्कंडक्ट (professional misconduct) से जुड़े मामलों में अनुशासनात्मक कार्यवाही (disciplinary proceedings) भी चला सकती हैं. अगर किसी अधिवक्ता के खिलाफ प्रोफेशनल मिस्कंडक्ट की शिकायत आती है तो संबंधित बार काउंसिल का अनुशासनात्मक तंत्र (disciplinary machinery) उसके खिलाफ कार्रवाई कर सकता है. इसके फैसलों के खिलाफ एडवोकेट्स एक्ट में आगे अपील की व्यवस्था भी है.
फिर BCI के पास क्या अधिकार हैं
BCI का काम सिर्फ दिल्ली में बैठकर वकीलों की मीटिंग करना नहीं है. एडवोकेट एक्ट की धारा-7 में इसकी कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां तय हैं. BCI वकीलों के प्रोफेशनल आचरण (professional conduct) और शिष्टाचार (etiquette) के मानक (standards) तय करता है. स्टेट बार काउंसिल पर जनरल सुपरविजन और कंट्रोल रखता है. लीगल एजुकेशन के मानक तय करता है और उन विश्वविद्यालयों की पहचान करता है, जिनकी लॉ डिग्री, वकीलों के इनरोलमेंट के लिए क्वालिफिकेशन बन सकती है.
इसके अलावा BCI लॉ रिफॉर्म को प्रमोट कर सकता है, कानूनी सहायता (legal aid) से जुड़े काम कर सकता है, वकीलों के वेलफेयर के लिए फंड बना सकता है और स्टेट बार काउंसिल से आने वाले कुछ मामलों पर कार्रवाई कर सकता है. यानी इसका असर सिर्फ वकीलों की अंदरूनी राजनीति (internal politics) तक सीमित नहीं है.
चेयरमैन कैसे चुना जाता है
कानून BCI में चेयरमैन और वाइस चेयरमैन के चुनाव का प्रावधान करता है. एडवोकेट एक्ट के सेक्शन-4 के अनुसार ये चुनाव, काउंसिल के भीतर प्रोसिडिंग की तरह से होता है. BCI के नियमों में चेयरमैन और वाइस चेयरमैन के चुनाव की प्रक्रिया दी गई है. नियम-12 के तहत चुनाव काउंसिल की मीटिंग में होता है.
यहीं से मौजूदा विवाद की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी निकलती है. सवाल ये है कि चुने हुए चेयरमैन का सामान्य कार्यकाल (normal tenure) कितना होना चाहिए. और चुनाव नहीं होने की स्थिति में पुराने पदाधिकारी कितने समय तक पद पर रह सकते हैं.
दो साल बनाम 2030, विवाद की असली जड़
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में कहा गया कि BCI नियमों के नियम-12(2) के तहत चेयरमैन और वाइस चेयरमैन का कार्यकाल दो साल है. याचिकाकर्ताओं ने अप्रैल 2025 की उस नोटिफिकेशन को चुनौती दी जिसमें मनन कुमार मिश्रा के चेयरमैन पद का कार्यकाल अप्रैल 2030 तक दिखाया गया था. सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इसी सवाल पर गंभीरता से गौर किया.
कोर्ट के सामने ये तर्क रखा गया कि अगर नियम दो साल का कार्यकाल तय करते हैं तो सिर्फ एक एडमिस्ट्रेटिव नोटिफिकेशन के जरिए इसे पांच साल तक नहीं बढ़ाया जा सकता. दूसरी तरफ BCI की ओर से चुनावों में हुई देरी और वैधानिक ट्रांजिशनल (statutory transitional) व्यवस्था का संदर्भ सामने आया.
प्रो टर्म चेयरमैन का मतलब क्या है
यही इस पूरी कहानी का सबसे अहम शब्द है. प्रो टर्म (Pro tem) का सामान्य अर्थ होता है फिलहाल या अस्थायी तौर पर किसी पद की जिम्मेदारी संभालना.
सुप्रीम कोर्ट ने 2 सितंबर की सुनवाई में कहा कि नई इलेक्टेड BCI के गठन तक मनन मिश्रा की स्थिति को प्रो टर्म चैयरमैन (pro tem Chairman) के तौर पर देखा जाना चाहिए. इसका मतलब ये नहीं है कि BCI बिना चेयरमैन के रह जाएगा. रोजमर्रा के काम (day-to-day functioning) चलती रहेगी, लेकिन इसे नए निर्वाचित चेयरमैन के बराबर स्थायी लोकतांत्रिक अधिकार नहीं माना जा सकता.
कोर्ट ने ये भी कहा कि बड़े नीतिगत फैसले (policy decisions) में अटार्नी जनरल (Attorney General) और सॉलिसिटर जनरल (Solicitor General) को शामिल किया जाना चाहिए. दोनों एडवोकेट्स एक्ट के तहत BCI के पदेन सदस्य (ex-officio members) हैं. BCI की ओर से इस व्यवस्था पर सहमति भी दर्ज की गई.
फिर Section 4(3) का पेच क्या है
मामला सिर्फ नियम का नहीं है. एडवोकेट एक्ट की सेक्शन-4(3) में ऐसी ट्रांजिशनल व्यवस्था है जिसके तहत BCI का सदस्य, उत्तराधिकारी चुने जाने तक पद पर बना रह सकता है. इस व्यवस्था का मकसद मूल रूप से संस्थागत खालीपन (institutional vacuum) रोकना है.
लेकिन पीटिशनर का आरोप है कि इलेक्शन में लंबे समय तक हुई देरी के कारण इसी व्यवस्था का इस्तेमाल मौजूदा पदाधिकारी (incumbent office-bearers) को लंबे समय तक पद पर बनाए रखने के लिए किया गया. सुप्रीम कोर्ट के सामने इसी व्याख्या (interpretation) को लेकर सवाल उठा.
अब चूंकि स्टेट बार काउंसिल के चुनाव हो चुके हैं और नए स्टेट बार काउंसिल के गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है. सुप्रीम कोर्ट ने नए BCI के गठन की प्रक्रिया को तेजी से पूरा करने की दिशा में टाइमलाइन दी हैं.
अब आगे क्या होगा
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट्स के मुख्य न्यायधीशों (Chief Justices) से राज्यों के बार काउंसिल में दो महिला सदस्यों की को-ऑप्शन की प्रक्रिया दो सप्ताह में पूरी करने को कहा. इसके बाद स्टेट बार काउंसिल को अपनी नई कॉम्पोजिशन एक सप्ताह में नोटिफाई करनी है. नई कॉम्पोजिशन नोटिफाई होने के बाद स्टेट बार काउंसिल को अपने चेयरपर्सन, वाइस चेयरपर्सन, अन्य पदाधिकारियों (office-bearers) और BCI प्रतिनिधियों का चुनाव तीन सप्ताह के भीतर करना है. मामले की अगली सुनवाई 17 सितंबर को होनी है.
इसका सीधा मतलब ये है कि कोर्ट फिलहाल किसी व्यक्ति को हटाकर खाली कुर्सी बनाने के बजाय उस पूरी इलेक्टोरल चेन को जल्दी पूरा करवाना चाहता है, जिससे नया BCI बन सके और फिर उसके भीतर चेयरमैन का चुनाव हो.
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आम आदमी के केस से इसका क्या लेना-देना
पहली नजर में BCI चेयरमैन का कार्यकाल आम आदमी का मुद्दा नहीं लगता. लेकिन बार काउंसिल की व्यवस्था सीधे लीगल प्रोफेशन से जुड़ी है. कौन वकील के रूप में इनरोल हो सकता है, कानूनी शिक्षा के मानक (standards) क्या होंगे, व्यावसायिक आचरण के मानक क्या होंगे और दुराचरण की स्थिति में अनुशासनात्मक मिशनरी कैसे चलेगी, इन सबका असर आखिरकार न्याय व्यवस्था तक पहुंचता है. एडवोकेट्स एक्ट BCI को लीगल एजुकेशन, प्रोफेशनल कंडक्ट और स्टेट बार काउंसिल की सुपरविजन से जुड़े महत्वपूर्ण अधिकार देता है.
इसलिए सुप्रीम कोर्ट का सवाल सिर्फ मनन कुमार मिश्रा की कुर्सी पर सवाल नहीं है. असली सवाल ये है कि संवैधानिक इकाई में चुना हुआ प्रतिनिधित्व (elected representation) कितनी जल्दी और कितनी साफ प्रक्रिया से आगे बढ़ती है. अगर चुनाव में देरी हो जाए तो temporary व्यवस्था कितनी लंबी चल सकती है. और ट्रांजिशनल प्रोविजन को संस्थागत निरंतरता (institutional continuity) के लिए इस्तेमाल किया जाए या लंबे समय तक पुराने पदाधिकारियों को बनाए रखने के लिए, इसकी सीमा कहां तय होगी.
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने 2030 तक चेयरमैन बने रहने के दावे को लोकतांत्रिक जनादेश (final democratic mandate) के रूप में स्वीकार नहीं किया है. कोर्ट ने नई चुनी हुई BCI के गठन तक प्रो टर्म व्यवस्था को रोजमर्रा के कामकाज के लिए स्वीकार करने की दिशा दिखाई है और बड़े नीतिगत फैसलों में अटार्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल की भागीदारी पर जोर दिया है. अब नजर 17 सितंबर की अगली सुनवाई और उससे पहले राज्य बार काउंसिल की चुनावी प्रक्रिया पर रहेगी.
वीडियो: NLSIU स्टूडेंट्स CJI सूर्यकांत और मनन मिश्रा पर क्या कह रहे?










