सारे मुल्क का ध्यान इस वक्त एक शख्स की तरफ लगा हुआ है. वो शख्सियत हैं- सोनम वांगचुक… जो पिछले कई दिनों से दिल्ली में आमरण अनशन कर रहे हैं. पहले जंतर मंतर पर थे. सेहत बिगड़ी और दिल्ली पुलिस ने उन्हें सफदरजंग अस्पताल में भर्ती करा दिया. अब पत्नी गीतांजलि उन्हें किसी निजी अस्पताल ले जाना चाहती हैं, मगर प्रशासन इसकी इजाजत नहीं दे रहा.
सोनम वांगचुक को क्यों नहीं मिल रही अपने पसंद के अस्पताल में इलाज कराने की इजाजत?
Sonam Wangchuk Case: दिल्ली के जंतर मंतर पर भूख हड़ताल कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरणविद सोनम वांगचुक को दिल्ली पुलिस ने सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया है. मगर सोनम की पत्नी गीतांजलि उन्हें इलाज के लिए निजी अस्पताल ले जाना चाहती हैं, जिसकी इजाजत ना तो सरकार दे रही है और ना ही दिल्ली हाईकोर्ट...


बस यही से शुरुआत होती है, हमारी इस कहानी की. क्योंकि ये मामला किसी एक शख्स के अस्पताल बदलने भर से कहीं ज्यादा अहम है. ये मामला है उस अहम कानूनी लड़ाई की जो देश के हर नागरिक और उसके मौलिक अधिकारों से जुड़ा है. कॉकरोज जनता पार्टी का कहना है कि सोनम वांगचुक पर किसी तरह का आरोप नहीं है. ना ही उन्हें हिरासत में लिया गया है. लिहाजा जेल के कैदियों की खातिर बनाये गए नियम कायदे उन पर लागू नहीं होते.
बावजूद इसके दिल्ली पुलिस और प्रशासन के इस रवैये के खिलाफ सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि, दिल्ली हाईकोर्ट पहुंची तो वहां भी उनके हाथ सिर्फ निराश ही लगी. दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोनम को उनके मनपसंद अस्पताल में इलाज की इजाजत नहीं दी. जिसके बाद उनकी पत्नी गीतांजलि ने दो जजों की बेंच में अपील दायर करने की बात कही है.
अब सवाल ये उठता है कि क्या किसी भी इंसान को अपनी मर्जी से इलाज करवाने का हक नहीं है. क्या सोनम वांगचुक के साथ किया जाने वाला व्यवहार संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है या फिर सब कुछ कानून के मुताबिक हो रहा है.
जेल या हिरासत में इलाज के नियम
भारत के संविधान का आर्टिकल 21 हमें जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है. दिल्ली हाईकोर्ट के अधिवक्ता नवीन दुबे, बेहतर इलाज के अधिकार को भी इसी से जोड़कर देखते हैं. ‘लल्लनटॉप’ से बात करते हुए नवीन दुबे कहते हैं,
सोनम वांगचुक पर जब तक कोई आपराधिक मामला या आरोप दर्ज नहीं होता है, तब तक पुलिस का उन्हें अस्पताल ले जाना एक 'चिकित्सीय हस्तक्षेप' (Medical Intervention) ही माना जाता है, न कि कोई कानूनी गिरफ्तारी. ऐसे में उन पर जेल मैन्युअल लागू नहीं होता.
इस नियम का हवाला देते हुए नवीन दुबे कहते हैं कि प्रथम दृष्टया सोनम वांगचुक को मनमर्जी इलाज ना देने का कोई आधार नहीं बनता. मगर इसके साथ ही वो जोड़ते हैं,
अगर अदालत को ये लगे कि निजी अस्पताल में इलाज के नाम पर सोनम वांगचुक दोबारा खाना-पीना छोड़ देंगे या इलाज को इग्नोर कर आंदोलन में पहुंच जाएंगे, तो कोर्ट अपने विवेक पर फैसला कर सकती है.
यही वजह है कि दिल्ली हाई कोर्ट ने सोनम वांगचुक की अर्जी पर सुनवाई करते हुए कहा कि जेल के नियमों और सुरक्षा कारणों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
दिल्ली पुलिस का पक्ष
सोनम वांगचुक को उनकी पसंद के अस्पताल में इलाज क्यों नहीं करने दिया जा रहा, उस पर दिल्ली पुलिस ने सीधे-सीधे तो कुछ नहीं कहा, मगर इस पूरी प्रक्रिया को वो दिल्ली हाईकोर्ट के निर्देशों का पालन करार दे रहे हैं. नई दिल्ली के डीसीपी सचिन शर्मा का कहना है,
डॉक्टरों की टीम ने वांगचुक की जांच की थी और उनके शरीर में गंभीर डिहाइड्रेशन (पानी की कमी) और पोटैशियम की कमी पाई थी. ऐसे में उनकी जान बचाने के लिए उन्हें "अनिवार्य चिकित्सा देखभाल" (Essential Medical Care) के तहत नजदीकी सरकारी अस्पताल (सफदरजंग) में शिफ्ट करना जरूरी था.
सीनियर एडवोकेट नवीन दुबे यहीं पर एक बात जोड़ते हुए कहते हैं,
संविधान और मानवाधिकार हमें पसंद के अस्पताल में इलाज की इजाजत देता है, मगर दिल्ली हाई कोर्ट का आदेश स्पष्ट ना होने की वजह से दिल्ली पुलिस उसकी व्याख्या अपने हिसाब से कर रही है.
क्या कहते हैं सियासी नेता
भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और पूर्व केंद्रीय मंत्री शाहनवाज हुसैन भी इस पूरी प्रक्रिया को हाईकोर्ट के आदेश से जोड़ रहे हैं. मीडिया से बात के दौरान उन्होंने कहा कि,
सोनम वांगचुक को अस्पताल भेजना दिल्ली पुलिस का कोई मनमाना कदम नहीं था, बल्कि ये दिल्ली हाई कोर्ट के निर्देशों के तहत उनके गिरते स्वास्थ्य की निगरानी के लिए किया गया था. वांगचुक को केवल मेडिकल जांच के लिए भर्ती किया गया है ताकि वे पूरी तरह स्वस्थ रहें.
उधर विपक्षी दल समाजवादी पार्टी दिल्ली पुलिस के कदम को मनमर्जी चलाने की कोशिश करार दे रही है. लल्लनटॉप से बात करते हुए सपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता विवेक सायलस ने कहा,
समाजवादी पार्टी सोनम वांगचुक के साथ पूरी मजबूती से खड़ी है. उन्हें संविधान द्वारा दिए गए सारे अधिकार मिलने चाहिए. युवा हमारे देश के भविष्य हैं, जिनके अधिकारों को ये दमनकारी सरकार कुचल रही है.
विवेक सायलस ने सोनम वांगचुक के उस मांग का भी समर्थन किया, जिसके तहत पेपर लीक के लिए जिम्मेदार मंत्रियों के इस्तीफे की मांग की जा रही है.
सरकारी बनाम निजी अस्पताल
घूम फिर कर बात वहीं पहुंचती है कि आखिर सोनम वांगचुक को उनके पसंद के अस्पताल जाने की इजाजत क्यों नहीं मिल रही है? उत्तर प्रदेश पुलिस के एक रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी नाम ना छापने की शर्त पर लल्लनटॉप से कहते हैं.
सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की टीम और मेडिकल बोर्ड होता है जो मरीज की हालत देखकर फैसला लेता है. अगर हर कैदी अपनी पसंद के प्राइवेट अस्पताल में जाने की जिद करने लगे, तो फिर जेल प्रशासन और सुरक्षा व्यवस्था चलाना नामुमकिन हो जाएगा.
उनका कहना है कि कोर्ट के लिए भी ये देखना जरूरी होता है कि क्या सरकारी अस्पताल में इलाज संभव है या नहीं. अगर सरकारी अस्पताल में डॉक्टर सही इलाज कर रहे हैं, तो कोर्ट आमतौर पर दखल देने से बचता है.
इलाज की गुणवत्ता पर सवाल
इस पूरे मामले पर जब हमने स्वास्थ्य और कानूनी मामलों के जानकारों से बातचीत की, तो उन्होंने बताया कि जेलों में स्वास्थ्य सेवाओं के मानक कागजों पर भले ही पूरे दिखते हों, पर ज़मीनी हक़ीक़त थोड़ी अलग होती है. देश की ज्यादातर जेलों में मेडिकल स्टाफ और आधुनिक उपकरणों की भारी कमी रहती है. ऐसे में जब कोई बड़ा या चर्चित चेहरा जेल जाता है और उसकी तबीयत बिगड़ती है, तो मामला सीधे चर्चा में आ जाता है.
जानकारों का कहना है कि 'राइट टू हेल्थ' यानी स्वास्थ्य का अधिकार एक बुनियादी मानवीय अधिकार है, लेकिन जब ये जेल की चारदीवारी के अंदर आता है, तो सुरक्षा और प्रोटोकॉल इसके आड़े आ जाते हैं. यही वजह है कि सोनम वांगचुक और उनकी पत्नी की कोशिशों के बावजूद कानून की सख्त दीवारें फिलहाल उनके रास्ते में रुकावट बनी हुई हैं.
वीडियो: सोनम वांगचुक के साथ अस्पताल में क्या-क्या हुआ?








