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जब सोनम वांगचुक के पिता का अनशन खुद पीएम इंदिरा गांधी ने तुड़वाया

अनशनों की इस कहानी में Sonam Wangchuk के पिता Sonam Wangyal का जिक्र भी जरूरी है. भूखा रहने की शक्ति वांगचुक को विरासत में मिली है. सोनम के पिता का नाम सोनम वांग्याल था. लद्दाख के जाने-माने नेता थे. 1975 में जम्मू-कश्मीर सरकार में मंत्री भी रहे.

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सोनम वांगचुक के पिता सोनमा वांग्याल ने भी की थी भूख हड़ताल. (तस्वीरें- सोशल मीडिया और इंडिया टुडे)

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  • दिल्ली में 59 वर्षीय सोनम वांगचुक पिछले 19 दिनों से शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर हैं।
  • मांग के पीछे लद्दाख के लोगों के अधिकारों और सरकारी नीतियों के प्रति असंतोष तथा इतिहासिक भूख हड़तालों की परंपरा है।
  • सोनम वांगचुक का स्वास्थ्य खराब हो रहा है और सरकार या विपक्ष की ओर से फिलहाल कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है, जिससे आगे की कार्रवाई अनिश्चित है।

ग्लोबल हंगर इंडेक्स की 123 देशों की सूची में 102वें नंबर वाले मुल्क में इन दिनों ‘भूख’ ही खबर है. दिल्ली की तमतमाती गर्मी में 59 साल का एक आदमी पिछले 19 दिनों से भूखा है. ये ‘हठयोग’ छात्रों के लिए किया जा रहा है. कॉकरोच जनता पार्टी पिछले 19 दिनों से जंतर-मंतर पर प्रोटेस्ट कर रही है, लेकिन अनशन पर सिर्फ सोनम वांगचुक हैं. मांग- शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हो.

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सरकार ने इस अनशन पर अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है. विपक्ष भी पूरी तरह खुलकर समर्थन नहीं कर रहा है. उधर भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक का स्वास्थ्य लगातार गिरता जा रहा है. डॉक्टर बता रहे हैं कि उनका 9 किलो वज़न कम हो चुका है, शरीद ख़ुद को गला रहा है.

हालांकि इससे पहले भी वो लंबी-लंबी भूख हड़तालों पर बैठ चुके हैं. मार्च 2024 में उन्होंने 21 दिनों का अनशन किया था. सोनम ने इसे 'क्लाइमेट फास्ट' नाम दिया. वो लद्दाख के लिए पूर्ण राज्य का दर्जा मांग रहे थे. सोनम 21 दिनों तक भूखे रहे और लेह की खतरनाक ठंड में खुले आसमान के नीचे सोए. सरकार ने तब भी कोई सुध नहीं ली थी.

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अनशनों की इस कहानी में सोनम के पिता का जिक्र भी जरूरी है. भूखा रहने की शक्ति वांगचुक को विरासत में मिली है. उनके पिता सोनम वांग्याल लद्दाख के जाने-माने नेता थे. 1975 में जम्मू-कश्मीर सरकार में मंत्री भी रहे. उन्होंने लद्दाख के लोगों के अधिकारों, खासकर अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा और स्थानीय लोगों के संवैधानिक अधिकारों के लिए लंबे समय तक संघर्ष किया.

इंदिरा गांधी पहुंचीं लेह

International Association for Ladakh Studies (IALS) द्वारा प्रकाशित एक शोध-संकलन है Recent Research on Ladakh 7. इसमें वांग्याल का एक लेख Political Evolution in Post-Independence Ladakh भी शामिल है. लेख में वांग्याल 1984 की एक घटना का जिक्र करते हैं.

दरअसल, 1982 में लद्दाख को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा दिलाने का आंदोलन शुरू हुआ. सोनम वांग्याल इसमें सक्रिय रहे. उन्होंने 15 जनवरी से 30 जनवरी तक लगातार 16 दिन का अनशन किया. इसके बाद 1984 में उन्होंने फिर पांच दिन का अनशन किया. इस बार सरकार ने सुध ली. तब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी दिल्ली से लेह पहुंचीं, उन्होंने लद्दाख को ST दर्जा देने का आश्वासन दिया और अपने हाथों से सोनम वांग्याल को सॉफ्ट ड्रिंक देकर अनशन तुड़वाया. हालांकि यह दर्जा वास्तव में 1989 में जाकर मिला.

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सोनम वांग्याल लिखते हैं कि बचपन में उन्होंने डोगरा शासन का अत्याचार अपनी आंखों से देखा था. एक बार एक पुलिस कांस्टेबल ने बिना किसी अपराध के एक गांववाले को ज़मीन पर लिटाया और उसकी पीठ पर एक बड़ा पत्थर रख दिया गया. वो दर्द से कराहता रहा. रोता रहा और पूरा गांव बेबस होकर यह सब देखता रहा. किसी की हिम्मत नहीं थी कि पुलिस के सामने कुछ बोल सके. वांग्याल लिखते हैं कि लद्दाख के कुछ इलाकों में लोग भूख से मर जाते थे. इगू गांव का उदाहरण देते हुए वे बताते हैं कि कई परिवारों के पास खाने को कुछ नहीं होता था. लोग सब्जियों के पत्ते पानी में उबालकर और आग में सेंककर पेट भरते थे.

स्कॉलरशिप से की पढ़ाई

सोनम वांग्याल पढ़ाई जारी रखना चाहते थे, लेकिन घर की आर्थिक हालत बेहद खराब थी. उन्होंने प्रधानमंत्री को स्कॉलरशिप के लिए आवेदन भेजा. उनकी सिफारिश हुई और उन्हें स्कॉलरशिप मिली. इसी सहारे वो श्रीनगर के एस.पी. हाई स्कूल में पढ़ सके. हालांकि सिर्फ स्कॉलरशिप से गुज़ारा नहीं होता था और उन्हें बहुत कठिन परिस्थितियों में पढ़ाई करनी पड़ी.

श्रीनगर में कुशोक बकुला को एक पढ़े-लिखे लद्दाखी सहायक की ज़रूरत थी. तीन छात्रों ने आपस में बैठकर तय किया कि उनमें से एक अपनी पढ़ाई छोड़कर समाज की सेवा करेगा. आखिरकार यह जिम्मेदारी सोनम वांग्याल ने अपने ऊपर ली. मैट्रिक की परीक्षा के बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और बकुला के निजी सहायक बन गए.

लेह लौटने पर उन्होंने देखा कि देश तो आज़ाद हो चुका था, लेकिन लद्दाख के किसानों की हालत लगभग वैसी ही थी. भारी बर्फबारी से फसलें बर्बाद थीं, ऊपर से लगान और महाजनों का कर्ज़. उन्हें लगा कि राजनीतिक आज़ादी का लाभ अभी लद्दाख तक नहीं पहुंचा है. इसके बाद का जीवन सोनम वांग्याल ने लद्दाख को समर्पित कर दिया. वो लोगों के अधिकारों की लड़ाई लड़ते रहे. ये लड़ाई अभी भी जारी है. लेकिन अब मंच पर उनका बेटा है जो 19 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठा हुआ है.

वीडियो: कॉकरोच जनता पार्टी के प्रोटेस्ट में कुणाल कामरा का विवादित बयान

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