छत्तीसगढ़ की कोयला खदानों को लेकर एक योजना शुरू हुई थी. प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना (PMKKKY). मकसद था खनन से प्रभावित इलाकों का विकास. लेकिन, भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी CAG ने इस योजना की आड़ में चल रहे एक खेल का खुलासा किया है. CAG की ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में PMKKKY के फंड का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है. और ये खेल एकाध साल से नहीं, 2015 से चल रहा है.
सरकार ने खनन क्षेत्र के विकास के लिए अरबों रुपये दिए, पता चला उससे बगीचा बनवाया गया, गाड़ी खरीदी गई
CAG की ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में PMKKKY के फंड का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है. और ये खेल एकाध साल से नहीं. 2015 से चल रहा है.


CAG की रिपोर्ट के मुताबिक 2015-16 से 2023-24 के बीच जिला खनिज प्रतिष्ठान (District Mineral Foundation Trust-DMFT) में 13 हजार 101 करोड़ रुपये के फंड के इस्तेमाल में नियमों का उल्लंघन, फंड का गलत इस्तेमाल, टेंडर प्रक्रिया में गड़बड़ियां, बेवजह के खर्च और पारदर्शिता की कमी पाई गई हैं.
खनिज क्षेत्र से जुड़ी ये योजना 2015 से ही शुरू हुई थी. मकसद खनन से प्रभावित इलाकों और वहां रहने वाले लोगों के विकास के लिए काम करना है. इसके लिए DMFT बनाए गए. इनमें खनन कंपनियां और खदान पट्टाधारक पैसा जमा करते हैं. छत्तीसगढ़ में 2023-24 तक DMFT को 13 हजार 101 करोड़ रुपये मिले, जिनमें से 10,253 करोड़ रुपये (करीब 78%) खर्च किए गए.
CAG की रिपोर्ट कहती है कि 4,536.58 करोड़ रुपये खर्च करने के बावजूद, 11 जिलों के 1734 सीधे प्रभावित गांवों में से 754 गांवों तक योजना का लाभ नहीं पहुंचा. यानी करीब 44% गांव योजना के लाभ से अछूते रहे. कैग ऑडिट में ये भी पाया गया कि छत्तीसगढ़ DMFT नियम, 2015 में ऐसे बदलाव किए गए, जिससे योजना का दायरा जरूरत से ज्यादा बढ़ गया. इसके लिए "खनन से प्रभावित लोगों" की परिभाषा को ही बदल दिया गया. और उन सभी लोगों को शामिल कर लिया गया, जो प्रभावित क्षेत्रों में रहते या काम करते हैं.
इसके चलते ट्रस्ट ने 709.47 करोड़ रुपये मुफ्त सामान बांटने पर खर्च किए. CAG ने 30 मामलों की जांच में पाया कि 28.11 करोड़ रुपये का सामान बिना किसी तय मानदंड या लाभार्थियों की पहचान के, मनमाने तरीके से बांटा गया. DMFT ट्रस्ट बनने के बाद भी खनन से प्रभावित क्षेत्रों की पहचान करने में 5 महीने से लेकर 5 साल तक की देरी हुई.
हैरानी की बात ये है कि इन क्षेत्रों की पहचान होने से पहले ही 1,060.70 करोड़ रुपये खर्च के लिए मंजूर कर दिए गए. इसके अलावा, सीधे प्रभावित गांवों की सूची कलेक्टर कार्यालय के आदेश से जारी की गई, लेकिन DMFT नियमों के मुताबिक उसे आधिकारिक रूप से अधिसूचित (नोटिफाई) नहीं किया गया.
पर खबर सिर्फ इतनी नहीं है. जो पैसा खनन प्रभावित लोगों के विकास में खर्च किया जाना था. उसका इस्तेमाल और कहां-कहां हुआ ये और भी चौंकाने वाला है. योजना के पैसे खर्च हुए- कलेक्टरेट में बगीचे बनाने में, वेलकम गेट बनाने में, सरकारी दफ्तरों की मरम्मत करने में, ऑफिस का सामान खरीदने में, सरकारी गाड़ी खरीदने में और प्राइवेट एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन को ग्रांट्स देने में. मतलब खनन वाले इलाकों में लोगों को लंबे समय तक रोज़गार और बेहतर जीवन मिल सके, इसके लिए कोई ठोस योजना बनाए बिना ही फंड खर्च कर दिया गया.
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