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'भारत की शिक्षा रट्टा फोकस, 12वीं पढ़े लोग ग्रेजुएट से ज्यादा कमा रहे', इस बिजनेसमैन ने बहस छेड़ दी

Saurabh Mukherjea skip college: मार्सेलस इन्वेस्टमेंट मैनेजर्स के फाउंडर और चीफ इंफॉर्मेशन ऑफिसर (CIO) सौरभ मुखर्जी ने एक पॉडकास्ट में भारत के एजुकेशन सिस्टम और बेरोजगारी पर बात की. उन्होंने दावा किया कि स्कूल में सिर्फ रट्टा मारना और उसे लिखना बताते हैं. क्रिटिकल थिंकिंग के बारे में कोई विचार नहीं. टिप्पणी की.मुखर्जी का कहना है कि भारत में पढ़ाई-लिखाई अब भी क्रिटिकल थिंकिंग (गहराई से सोचने-समझने की क्षमता) के बजाय रटने पर ही फोकस रहता है.

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सौरभ मुखर्जी मार्सेलस इन्वेस्टमेंट मैनेजर्स के फाउंडर और CIO हैं. (फोटो-इंडिया टुडे)

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  • मार्सेलस इन्वेस्टमेंट मैनेजर्स के फाउंडर सौरभ मुखर्जी ने कहा कि भारत में सबसे ज्यादा कमाने वाले लोग ग्रेजुएट नहीं, बल्कि वे हैं जिन्होंने 12वीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी।
  • सौरभ मुखर्जी के अनुसार, भारतीय शिक्षा व्यवस्था रटने पर ज़ोर देती है और यह क्रिटिकल थिंकिंग की कमी का कारण बनी है, जिससे छात्रों को आधुनिक कौशल नहीं मिल पाता।
  • इस टिप्पणी का प्रभाव यह है कि हायरिंग ट्रेंड्स में यूनिवर्सिटी डिग्री के फायदे पर सवाल उठाए जा रहे हैं और कुछ कर्मचारी बिना डिग्री के भी अधिक कमा रहे हैं।

स्कूल पास करो, कॉलेज में एडमिशन लो और फिर अपनी फील्ड में नौकरी करो. ये तौर-तरीका लगभग हर कोई अपनाता है. कुछ ही लोग हैं, जो 12वीं के बाद जानबूझकर एजुकेशन नहीं लेते, या फिर सीधा काम शुरू कर देते हैं. अब एक कंपनी के फाउंडर ने दावा किया है कि भारत में सबसे ज्यादा कमाने वाले लोग शायद ग्रेजुएट नहीं, बल्कि वे लोग हैं जिन्होंने 12वीं क्लास के बाद पढ़ाई छोड़ दी.

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मार्सेलस इन्वेस्टमेंट मैनेजर्स के फाउंडर और चीफ इंफॉर्मेशन ऑफिसर (CIO) सौरभ मुखर्जी ने एक पॉडकास्ट में ये टिप्पणी की. उनका कहना है कि भारत में पढ़ाई-लिखाई अब भी क्रिटिकल थिंकिंग (गहराई से सोचने-समझने की क्षमता) के बजाय रटने पर ही फोकस करती है. भारत में नौकरी नहीं है, डेटा में सब दिखता है. 

‘रटकर सीखने पर फोकस’

भारतीय एजुकेशन सिस्टम के मौजूदा तौर-तरीकों का जिक्र करते हुए सौरभ मुखर्जी ने कहा कि यहां का यूनिवर्सिटी सिस्टम ‘रटकर सीखने’ पर आधारित है. या जैसा कि उन्होंने कहा, "रट्टा मारो और परीक्षा में रिगर्जिटेट कर दो." यानी उगल दो.

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सौरभ का मानना है कि समस्या कॉलेज से पहले ही शुरू हो जाती है. स्कूल के साल भी सोचने-समझने में नहीं बीतते. स्कूल का सिस्टम भी रटने और उसे दोहराने पर ही जोर देता है. मुखर्जी के अनुसार, इसका नतीजा यह है कि भारत को नए और अहम सेक्टर में क्षमता बनाने के लिए मेहनत करनी पड़ रही है. उन्होंने कहा,

“हम न तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में हैं, न इलेक्ट्रिक गाड़ियों में, न बायोटेक में और न ही क्लीन टेक में.”

CIO का कहना है कि भारत छात्रों को वह स्किल्स नहीं दे पा रहा है, जो आज की बदलती अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी है. मुखर्जी के अनुसार, हायरिंग के ट्रेंड्स बताते हैं कि एम्प्लॉयर अब यूनिवर्सिटी डिग्री से मिलने वाले फायदे पर सवाल उठाने लगे हैं.

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कंस्ट्रक्शन वर्कर ज्यादा कमा सकता है?

बेरोजगारी पर बात करते हुए सौरभ मुखर्जी ने पॉडकास्ट में दावा किया कि ग्रेजुएट होने वालों को नौकरी मिलने की स्थिति कमजोर बनी हुई है. बेरोजगारी दर बिना पढ़े-लिखे लोगों के मुकाबले ग्रेजुएट्स में ज्यादा है. उन्होंने कॉलेज के बाद नौकरी मिलने वाले छात्रों की संख्या पर बात करते हुए कहा,

“कॉलेज से निकलने वाले हर 100 ग्रेजुएट में से सिर्फ तीन को ही ग्रेजुएशन वाले साल में नौकरी मिल पाती है.”

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सौरभ मुखर्जी ने साफ कह दिया कि “भारत में यूनिवर्सिटी न जाना ही बेहतर है.” उनके मुताबिक, भारत में नौकरी देने वाले असल में यह संकेत दे रहे हैं कि कॉलेज की डिग्री से कोई खास फायदा नहीं हो रहा है. उन्होंने अपनी किताब ‘ब्रेकपॉइंट’ का जिक्र करते हुए कहा,

“भारत में सबसे ज्यादा कमाने वाले कुछ लोग वे हैं, जिन्होंने 12वीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ दी. ”

उन्होंने मुंबई का उदाहरण देते हुए कहा कि एक कंस्ट्रक्शन वर्कर या JCB ऑपरेटर, एयर-कंडीशन्ड ऑफिस की नौकरी की तलाश कर रहे ग्रेजुएट से ज्यादा कमा सकता है.

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