किसी ने प्रधानमंत्री को या किसी को भी गाली दी तो उस पर किस तरह का केस बनता है? क्या उस पर क्रिमिनल केस वाली धाराएं लगनी चाहिए या मानहानि का मुकदमा होना चाहिए? नोएडा की रहने वाली रुचिका सिंह पर जीरो एफआईआर दर्ज हुई तो ये बहस छिड़ गई. कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रवक्ता सौरव दास ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई. उनका कहना है कि अगर किसी को किसी की भाषा विवादित लगती है, अपमान करने वाली लगती है तो इसके खिलाफ मानहानि का केस करना चाहिए. आपराधिक मुकदमा दर्ज नहीं किया जाना चाहिए. इससे अभिव्यक्ति की आजादी पर असर पड़ता है.
'PM को गाली देने पर क्रिमिनल केस क्यों?', रुचिका सिंह मामले पर CJP ने सवाल उठाए
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कथित अपशब्द कहने के मामले में रुचिका सिंह पर दर्ज जीरो एफआईआर को लेकर सीजेपी ने आपत्ति जताई है. पार्टी प्रवक्ता सौरव दास ने कहा कि ऐसे मामलों में मानहानि का रास्ता अपनाया जा सकता है, लेकिन आपराधिक कानून का इस्तेमाल अभिव्यक्ति की आजादी पर असर डालता है.

पीएम मोदी को गाली देने वाली रुचिका पर बोली CJP
ये पूरा मामला सीजेपी के प्रोटेस्ट से जुड़ा है. जंतर-मंतर पर धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन चल रहा था. 23 जुलाई की बात है. एक लड़की का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसमें वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लगातार अपशब्द कह रही थी. पता चला लड़की का नाम रुचिका सिंह है. नोएडा के सेक्टर 168 की रहने वाली हैं. खुद का घर है और एक सैलून में काम करती हैं.
प्रधानमंत्री को गाली देने का उनका वीडियो वायरल हुआ तो गाजियाबाद की रहने वाली स्मृति सिंह नाम की महिला ने थाने में उनकी शिकायत कर दी. 29 जुलाई को गौतमबुद्ध नगर के एक्सप्रेसवे थाने में रुचिका सिंह के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो गई.
इन धाराओं में केस दर्जइंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस ने रुचिका के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 352 (शांति भंग करने के लिए जानबूझकर अपमान करना), 353(1) (सार्वजनिक उपद्रव को बढ़ावा देने वाले बयान) और 356(1) (मानहानि) के तहत मामला दर्ज किया है.
सौरव दास ने क्या कहा?अब सीजेपी के सौरव दास का कहना है कि यह आपराधिक न्याय व्यवस्था का दुरुपयोग है. किसी के कुछ बोलने पर अगर उसके खिलाफ क्रिमिनल का केस बनेगा तो लोग बोलने से डरेंगे. यह अभिव्यक्ति की आजादी को भी प्रभावित करेगा. सौरव दास ने कहा,
अगर भाषा अपमानजनक थी तो संबंधित व्यक्ति आरोपी के खिलाफ दीवानी (सिविल) या आपराधिक मानहानि का मुकदमा दर्ज कराने के लिए आजाद है. प्रदर्शनकारियों के खिलाफ आपराधिक कानून व्यवस्था का इस्तेमाल बेहद निंदनीय है. केवल आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करने के लिए किसी को सजा नहीं दी जानी चाहिए.
उन्होंने आगे कहा कि भाषा गलत हो सकती है और यह किसी के लिए आपत्तिजनक भी हो सकती है. लेकिन ये किसी पर क्रिमिनल केस लगाने की वजह नहीं हो सकता. इससे लोगों में डर पैदा होता है. ये युवा पीढ़ी को मंजूर नहीं है.
सौरव दास ने युवा प्रदर्शनकारियों से भी अपील की कि असहमति जताने के दौरान वो अपने बयानों को लेकर सतर्क रहें.
शुक्रवार, 31 जुलाई को सौरव दास ने एक्स पर पोस्ट लिखते आरोप लगाया कि यह मामला पुलिस की शक्तियों का दुरुपयोग है. उन्होंने लिखा,
रुचिका सिंह के खिलाफ क्रिमिनल मशीनरी का दुरुपयोग मंजूर नहीं है. गाली-गलौज या अभद्र भाषा पर आपराधिक केस नहीं बनता. लोकसभा के 50 फीसदी सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं. अकेले बीजेपी के करीब 100 सांसदों पर केस हैं. पुलिस अपनी एनर्जी उन पर लगाए. किसी 25 साल की लड़की पर नहीं! युवाओं का उत्पीड़न तुरंत बंद होना चाहिए!
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जीरो एफआईआर क्या है?बता दें कि रुचिका सिंह पर जीरो एफआईआर दर्ज हुई है. इस एफआईआर की खास बात ये है कि इसे किसी भी पुलिस स्टेशन में दर्ज कराया जा सकता है. चाहे अपराध कहीं भी हुआ हो. इसका मकसद होता है क्षेत्राधिकार संबंधी (पुलिस थाना सीमा) विवाद से जांच में देरी न हो.
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