राष्ट्रपति भवन में अशोक मंडप के पास लगी ‘नई दिल्ली के शिल्पकार’ एडविन लुटियंस की प्रतिमा सोमवार, 23 फरवरी को हटा दी गई. उनकी जगह पर स्वतंत्र भारत के पहले और एकमात्र गवर्नर जनरल रहे सी राजगोपालाचारी की प्रतिमा लगाई गई है.
राष्ट्रपति भवन से इसके डिजाइनर एडविन लुटियंस की प्रतिमा हटाई गई, परपोते ने क्या कहा?
सोमवार को इस प्रतिमा के अनावरण के वक्त राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और उपराष्ट्रपति सीआर राधाकृष्णन भी मौजूद थे. इस दौरान अपने संदेश में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि ये पहल औपनिवेशिक मानसिकता के निशान मिटाने और भारत माता की सेवा में असाधारण योगदान देने वालों को सम्मानित करने की दिशा में उठाए जा रहे सरकारी कदमों के सिलसिले का हिस्सा है.


सोमवार को इस प्रतिमा के अनावरण के वक्त राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और उपराष्ट्रपति सीआर राधाकृष्णन भी मौजूद थे. इस दौरान अपने संदेश में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि ये पहल औपनिवेशिक मानसिकता के निशान मिटाने और भारत माता की सेवा में असाधारण योगदान देने वालों को सम्मानित करने की दिशा में उठाए जा रहे सरकारी कदमों के सिलसिले का हिस्सा है.
एडविन लुटियंस की प्रतिमा हटाए जाने पर उनके परपोते मैट रिडले ने एक्स पर पोस्ट करके दुख जताया है. उन्होंने पिछले साल अपनी दिल्ली यात्रा के दौरान दादा की प्रतिमा के साथ अपनी फोटो भी शेयर की है. अपनी पोस्ट में रिडले ने लिखा,
यह जानकर दुख हुआ कि लुटियंस (मेरे परदादा) की प्रतिमा को दिल्ली में उनके डिजाइन किए गए राष्ट्रपति भवन से हटाया जा रहा है. पिछले साल मैं यहां था. तब मुझे आश्चर्य हुआ था कि उनके नाम को आधारशिला से क्यों हटा दिया गया था.

बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने 'मन की बात' संबोधन में ‘राजाजी उत्सव’ मनाए जाने का ऐलान किया था. इसके तहत सी राजगोपालाचारी के जीवन और कार्यों पर आधारित प्रदर्शनी का आयोजन 24 फरवरी से 1 मार्च 2026 तक अमृत उद्यान में किया जाएगा. इसी क्रम में राष्ट्रपति भवन में महात्मा गांधी की प्रतिमा के सामने अशोक मंडप के पास भव्य सीढ़ी पर स्थापित लुटियंस की प्रतिमा को हटाकर सी राजगोपालाचारी की प्रतिमा लगाई गई है.
राजगोपालाचारी के परपोते सीआर केशवन (C.R. Kesavan) ने इस पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को ‘धन्यवाद’ कहा है. उन्होंने इंडिया टुडे से खास बातचीत में कहा,
आज राजाजी होते तो बहुत खुश होते. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी औपनिवेशिक मानसिकता को खत्म कर रहे हैं जबकि पिछली कांग्रेस सरकारों के दौरान गुलामी के प्रतीकों का स्वागत किया जाता था.

हालांकि, राष्ट्रपति भवन के शिल्पकार एडविन लुटियंस की प्रतिमा हटाए जाने की विपक्षी दलों ने आलोचना की है. शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) की सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखकर सरकार के इस कदम पर निशाना साधा है. उन्होंने लिखा कि भारत की भावी पीढ़ी बिमल हंसमुख पटेल की स्थापत्य कला की विरासत को ही जान पाएगी, क्योंकि मुझे पूरा यकीन है कि लुटियंस के डिजाइन इतिहास का जो भी अंश बचा है, उसे औपनिवेशिक इतिहास से छुटकारा पाने की आड़ में तोड़-फोड़ कर नया रूप देकर या किसी और उद्देश्य के लिए इस्तेमाल कर लिया जाएगा.
उन्होंने आगे कहा,
कई देश अपनी राष्ट्र की जीवंत विरासत को पीढ़ियों के लिए सहेज कर रखते हैं. अच्छा, बुरा और बदसूरत. सब कुछ. सीखने के लिए, लेकिन नए भारत में हम इसे बिना किसी आत्मा या सांस्कृतिक संदर्भ के चमकदार नए सम्मेलन केंद्रों से बदलने पर तुले हुए हैं.
हालांकि, सी राजगोपालाचारी की प्रतिमा लगाए जाने पर कांग्रेस नेता शशि थरूर ने खुशी जाहिर की है. थरूर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संदेश को रीपोस्ट करते हुए लिखा कि राजाजी को राष्ट्रपति भवन में प्रतिमा से सम्मानित होते देखकर मुझे वास्तव में बहुत खुशी हुई है. उन्होंने आगे कहा,
मैं लंबे समय से उनके विचारों का प्रशंसक रहा हूं और छात्र जीवन में उनकी ‘स्वतंत्र पार्टी’ का प्रबल समर्थक था. उनकी धार्मिक आस्था में सांप्रदायिक कट्टरता का कोई अंश नहीं था. संविधान के दिए अधिकारों और स्वतंत्रता में उनकी अटूट आस्था थी. ये सभी मेरे लिए प्रेरणादायक हैं. यह दुखद है कि आज उनका अनुसरण करने वाले बहुत कम लोग बचे हैं.
हालांकि, लुटियंस की प्रतिमा हटाए जाने पर थरूर ने कुछ नहीं कहा.
कौन थे लुटियंस?साल 1869 में लंदन में जन्मे एडविन लुटियंस मशहूर ब्रिटिश वास्तुकार यानी आर्किटेक्ट थे. उन्होंने नई दिल्ली के बड़े हिस्से को डिजाइन किया था. साल 1912 में देश की राजधानी को कोलकाता से नई दिल्ली लाया गया था. इसके बाद लुटियंस को शहर की प्रमुख बिल्डिंग्स को डिजाइन करने के लिए लगाया गया था. इनमें राष्ट्रपति भवन, इंडिया गेट, नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक शामिल थे. उन्होंने हर्बर्ट बेकर की मदद से राष्ट्रपति भवन को डिजाइन किया.
इतिहासकार नारायणी गुप्ता ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि नई दिल्ली की सिटी प्लानिंग क्लासिकल रोमन स्टाइल में की गई थी, लेकिन उसमें भारतीयता भी झलकती थी. मिंटो ब्रिज के पास की दो छोटी सड़कों का नाम लुटियंस और बेकर के नाम पर रखा गया था.
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