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क्या सच में योगी आदित्यनाथ और मायावती राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले में एकमत हैं?

राम मंदिर के चढ़ावे की चोरी की खबरें जून के पहले हफ्ते में ही आनी शुरू हो गई थीं. तब से ये देश का सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ है. लेकिन मायावती की प्रतिक्रिया आई महीने की आखिरी तारीख 30 जून को.

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राम मंदिर चढ़ावा विवादःराजनीति न करें, मायावती और योगी की राय एक ही है?

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  • उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा प्रमुख मायावती ने 30 जून को राम मंदिर चढ़ावा चोरी विवाद पर एक पोस्ट में कहा कि इस मामले का राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए।
  • राम मंदिर चढ़ावा चोरी का मामला जून के पहले सप्ताह में सामने आया था, जिसमें करोड़ों की रकम गायब होने के आरोप लगे और आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद विवाद उठा।
  • मायावती और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दोनों ने इस मुद्दे पर राजनीति न करने की बात कही है, ताकि आगामी 2027 के चुनाव में बहुपक्षीय मुकाबला प्रभावित न हो।

राम मंदिर चढ़ावा विवाद पर क्या बसपा प्रमुख मायावती और सीएम योगी आदित्यनाथ की राय एकमत है? जब सारा विपक्ष राम मंदिर चढ़ावा चोरी में बीजेपी को घेर रहा है, तब चार बार यूपी की सीएम रहीं मायावती के एक सोशल मीडिया पोस्ट से काफी लोगों को हैरानी हुई.

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मायावती सोशल मीडिया पर हैं लेकिन रेगुलर नहीं हैं. जिस दौर में नेता घंटे भर में दर्जनों पोस्ट, तस्वीरें, वीडियो डाल देते हैं, वहीं बसपा प्रमुख वक्त लेकर कुछ कहती हैं.

मायावती-योगी राम मंदिर चोरी विवाद पर एकमत?

राम मंदिर के चढ़ावे की चोरी की खबरें जून के पहले हफ्ते में ही आनी शुरू हो गई थीं. तब से ये देश का सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ है. लेकिन मायावती की प्रतिक्रिया आई महीने की आखिरी तारीख 30 जून को. वहीं उत्तर प्रदेश की ज्यादातर छोटी-बड़ी खबरों और मुद्दों को प्रमुखता से उठाने वाले अखिलेश यादव यहां भी पीछे नहीं रहे.

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राम मंदिर चंदा चोरी मामले को उन्होंने पहले ही दिन लपक लिया था. 7 जून को एक्स पर एक पोस्ट कर अखिलेश यादव ने दावा किया था कि चढ़ावे से करोड़ों की रकम गायब कर दी गई है. साथ ही अदालत से आग्रह किया कि वो मामले का स्वतः संज्ञान ले, क्योंकि ‘सरकार की चुप्पी संदिग्ध’ है.

यहां भी विवाद को मुद्दा बनाने या उस पर कुछ कहने में अखिलेश, मायावती से आगे रहे. चंदा चोरी का आरोप लगने के बाद से अब तक काफी पानी बह गया. SIT गठित हो गई, कई आरोपी गिरफ्तार हो गए, उनके कच्चे-चिट्ठे खुल गए, चंपत राय-अनिल मिश्रा का इस्तीफा हो गया, राम भक्तों का दर्द भी छलका. इतना सब होने के बाद बसपा प्रमुख एक्टिव हुईं. 

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लेकिन जब मायावती ने अपनी बात रखी तो लगा वो इस विवाद के तूल पकड़ने से बहुत खुश नहीं हैं. एक्स पर अपनी पोस्ट में पूर्व मुख्यमंत्री ने साफ लिखा कि राम मंदिर चंदा चोरी विवाद पर राजनीति नहीं होनी चाहिए.

मायावती के इस रुख ने हर उस शख्स का ध्यान खींचा जो यूपी की सियासत पर नजर रखता है. वजह सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का वो बयान है जिसमें उन्होंने चंदा चोरी को लेकर कहा था कि दूध का दूध, पानी का पानी जरूर होगा. लेकिन इस मामले में राजनीति न करें.

यही बात मायावती ने अपने 30 जून के एक्स पोस्ट में कही. उन्होंने लिखा, ''गड़बड़ी करने वाले कतई बख्शे नहीं जाने चाहिए....पर इस मामले का राजनीतिकरण ठीक नहीं है.'' 

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केवल शब्दों और उनके अर्थ पर जाएं तो कह सकते हैं मायावती और योगी आदित्यनाथ ने एक जैसी ही बात कही है. लेकिन क्या ये वैचारिक और राजनीतिक रूप से एकमत होना भी है? 

ये सवाल कांग्रेस नेताओं से भी किया गया. पार्टी की प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत चढ़ावा चोरी विवाद पर एक प्रेस कांफ्रेंस कर रही थीं. उनसे पूछा गया कि बसपा सुप्रीमो मायावती के इस रुख पर उनकी क्या राय है. इस पर सुप्रिया पहले तो मुस्कुराईं. फिर बोलीं, ''बहन मायावती जी को देखकर मुझे दुख होता है. क्या कद्दावर नेता थीं, पर क्या हालत बना ली है उन्होंने. हर बार बीजेपी को कवर फायर देती हैं और विपक्ष होने का ढोंग भी करती हैं.''

यूपी के सीएम और मायावती की शाब्दिक समरूपता पर हमने लेखक, रिसर्चर और राजनीतिक विश्लेषक सज्जन कुमार से बात की. उन्होंने कहा,

"मायावती जो कह रही हैं कि इस मुद्दे पर राजनीति नहीं होनी चाहिए, ये तो एक आदर्शवादी बात हो जाती है. जहां आप ये उम्मीद करते हैं कि चूंकि ये एक गंभीर मुद्दा है, करोड़ों श्रद्धालुओं की भावना से जुड़ी बात है तो राजनीति नहीं होनी चाहिए. जरूर, ये बातें अपेक्षित हैं. पर व्यावहारिकता में ये संभव ही नहीं है. उसका कारण ये है कि राम मंदिर को लेकर धार्मिक, आध्यात्मिक दृष्टि होने के साथ-साथ उससे जुड़ी हुई एक राजनीतिक लामबंदी भी जबरदस्त है. ऐसे में, मुमकिन ही नहीं कि राम मंदिर से जुड़ी हुई कोई बात आए और उसमें राजनीतिक एंगल न आए. क्योंकि इस मंदिर के निर्माण में ही एक सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन का इतिहास रहा है."

आगे मायावती की अपनी राजनीति पर बात हुई. सज्जन कुमार कहते हैं,

"मायावती एक परिपक्व राजनेता हैं. इस बयान के पीछे भी एक राजनीतिक गुणा-गणित है. मायवाती देख रही हैं कि राम मंदिर में जो गबन हुआ है, वो अगर बीजेपी बनाम विपक्ष होगा, तो आने वाले चुनाव में ये चुनाव को बाईपोलर बना देगा. पहले भी राज्य के चुनाव बाईपोलर हो गए हैं. और यूपी जैसे राज्य में बहुजन समाज पार्टी अब भी 9 से 10 फीसदी वोट ले आती है. 80 लाख के करीब वोट ले आना बड़ी चीज है. तो अगर राम मंदिर के आसपास विमर्श, आरोप-प्रत्यारोप, बयानबाजी आने वाले दिनों में होती है तो फिर 2027 का चुनाव बीजेपी बनाम समाजवादी पार्टी और कांग्रेस हो जाएगा. मायावती इस स्थिति को टालना चाहती हैं."

सज्जन कुमार के मुताबिक बसपा सुप्रीमो नहीं चाहेंगी की राम मंदिर का मुद्दा बीजेपी और समाजवादी पार्टी-कांग्रेस के बीच का राजनीतिक मुकाबला बन जाए. जिसमें उनकी पार्टी बीएसपी को लोग एकदम से ही नजरंदाज कर दें.

वीडियो: राम मंदिर चंदा चोरी केस में आरोपियों ने खोला राज, पुलिस पूछताछ में क्या बताया?

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