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जेल जाकर राजपाल यादव बचा रहे हैं 9 करोड़? समझें पूरा कानूनी दांव-पेच

राजपाल यादव को चेक बाउंस मामले में फिर तीन महीने की जेल की सजा सुनाई गई है. लेकिन क्या जेल जाने से उनका करोड़ों रुपये का कर्ज खत्म हो जाएगा? जानिए चेक बाउंस कानून और कानूनी प्रक्रिया क्या कहती है.

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राजपाल यादव को फिर तीन महीने की सजा सुनाई गई है. (फोटो- India Today)

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  • राजपाल यादव पर दिल्ली की अदालत ने 5 करोड़ रुपये के लोन चुकाने में विफल रहने के कारण 3 महीने की जेल की सजा सुनाई है, जिसे उन्हें अब काटना होगा।
  • राजपाल ने एक फिल्म बनने के लिए 5 करोड़ का लोन लिया था लेकिन फिल्म फ्लॉप हो गई और लौटाए गए पैसे बहुत कम रहे, जिसके कारण उनके ऊपर चेक बाउंस का केस दर्ज हुआ।
  • वकील नवीन दुबे के अनुसार जेल की सजा काटने के बाद भी राजपाल को अपना कर्ज चुकाना होगा और देनदारी चुकाने के लिए संपत्ति जब्त की जा सकती है, सिवाय इसके कि वे समझौता कर लें।

फिल्म है हेराफेरी. राजपाल यादव का किरदार बहन की शादी के लिए पैसे जुटा रहा है. इसी बीच उसके पास अक्षय कुमार यानी राजू एक स्कीम लेकर आता है. 21 दिन में पैसा डबल. राजपाल को स्कीम भा जाती है. अपनी सारी जमापूंजी यानी 30 लाख रुपये वो स्कीम में लगा देता है. उम्मीद रहती है कि 21 दिन में पैसा डबल होकर 60 लाख जाएगा. सारे दुख-दर्द दूर हो जाएंगे. लेकिन 21 दिन बाद मिलता है धोखा. राजपाल को लेने के देने पड़ जाते हैं 30 के 60 तो नहीं हुए. 30 लाख भी चले गए.

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फिल्मी दुनिया की ये कहानी राजपाल के साथ तब दोहराई गई जब वो एक फिल्म बनाने के लिए 5 करोड़ का लोन लेते हैं. सोचा होगा, पहली बार प्रोड्यूसर बनकर फिल्म से पैसे कमाएंगे लेकिन पिक्चर हो गई फ्लॉप. फिल्म को बनाने में लगे थे 20 से 22 करोड़ लेकिन वापस आए सिर्फ 38 लाख. अब तो 5 करोड़ का लोन चुकाने का भी संकट आ गया. राजपाल की कंपनी ने लोन देने वाले को कई चेक दिए लेकिन सब बाउंस हो गए. राजपाल पर क्रिमिनल केस हो गया. कोर्ट ने पैसे लौटाने को कहा. राजपाल ने कहा कि उनके पास पैसे नहीं हैं. लिहाजा, तिहाड़ जेल में सरेंडर कर दिया और जेल की सजा काट ली. 

बाद में जमानत भी मिली लेकिन अब फिर से कोर्ट ने उन्हें तीन महीने की सजा सुनाई है. कोर्ट ने कहा कि उन्हें पर्याप्त समय दिया गया लेकिन वो लोन चुका नहीं पाए. अब उन्हें जेल में सजा काटनी ही होगी. ऐसे में कुछ लोगों के मन में सवाल है कि क्या जेल की सजा काटने से राजपाल यादव 5 करोड़ की देनदारी जो अब पेनाल्टी मिलाकर 9 करोड़ हो गई है, उसे चुकाने से बच जाएंगे? अगर राजपाल कर्ज चुकाने से मना कर देते हैं या तर्क देते हैं कि उनके पास पैसे नहीं हैं, वो दिवालिया हो गए हैं तो आगे की कार्रवाई क्या होगी?

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जेल जाने से लोन नहीं चुकाना होगा?

दिल्ली हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील नवीन दुबे इसका जवाब देते हैं. वह कहते हैं कि पहली बात तो ये कि बार-बार जेल जाने से आपकी सजा (टेन्योर ऑफ इम्प्रिज़नमेंट) पूरी हो सकती है. लेकिन आपको पैसे तो चुकाने ही होंगे. अगर कोर्ट में ये साबित हो गया है कि दूसरे पक्ष को आपकी देनदारी (लायबिलिटी) है और आपने भुगतान नहीं किया है तो आपको पैसे वापस देने ही होंगे. अगर आप ऐसा नहीं करते तो वह रकम आपकी संपत्तियों (एसेट्स) से वसूल की जाएगी.

राजपाल यादव का केस भी ऐसा ही है. वह बार-बार जेल जाकर लोन की देनदारी से बच नहीं सकते. जेल की सजा काटकर भी उन्हें कर्ज चुकाना ही होगा. बशर्ते, लोन देने वाले से उनका कोई समझौता हो जाए. नवीन दुबे कहते हैं कि ऐसा हो सकता है कि शिकायत करने वाला यानी चेक होल्डर राजपाल यादव के साथ समझौता कर ले. दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हो जाएं कि बकाया पैसा किस्तों (इंस्टॉलमेंट) में चुकाया जाएगा. अगर दोनों में यह समझौता लिखित रूप में अदालत के सामने हो जाए तो राजपाल की गिरफ्तारी रुक जाएगी. लेकिन इसके बाद तय शर्तों के अनुसार समय-समय पर किस्तों का भुगतान किया जाता रहेगा. आमतौर पर धारा 138-NI एक्ट के मामलों में ऐसा ही होता है.

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क्या है सेक्शन 138 एनआई एक्ट?

सेक्शन 138, एनआई (The Negotiable Instruments) एक्ट, 1881 के तहत अगर कोई व्यक्ति कर्ज या किसी अन्य देनदारी के भुगतान के लिए चेक जारी करता है और वह खाते में पर्याप्त रकम न होने या तय सीमा से ज्यादा राशि होने के कारण बाउंस हो जाता है तो यह अपराध माना जाएगा. ऐसे मामले में 2 साल तक की जेल, चेक की रकम के दोगुने तक जुर्माना या दोनों की सजा हो सकती है.

इस केस में जेल जाना रेयर घटना

नवीन दुबे कहते हैं कि चेक बाउंस के मामलों में जेल जाना काफी रेयर होता है. कोर्ट भी मानती है कि जेल व्यापारियों के लिए नहीं होती है. चेक से जो ट्रांजेक्शन होते हैं वो दो पक्षों के बीच होने वाले कमर्शियल लेन-देन ही होते हैं. ज्यादातर मामलों में दोनों पक्ष कारोबारी ही होते हैं. इसलिए ऐसे मामलों में जेल अपवाद (एक्सेप्शन) मानी जाती है. हां, जमानत (बेल) को अधिकार के रूप में देखा जाता है. अदालत इन मामलों में यह भी ध्यान रखती है कि यह एक फाइनेंशियल क्राइम है. न कि कोई हिंसक या गंभीर अपराध. 

हालांकि, Negotiable Instruments Act के तहत चेक बाउंस का मामला आपराधिक (क्रिमिनल) प्रक्रिया के तहत चलता है, लेकिन उसका नेचर सिविल केस का माना जाता है.

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