भौतिक विज्ञान में अद्भुत काम करने वाले लोगों के लिए एक इंटरनेशनल पुरस्कार है- Wolf Prize. ये पुरस्कार जीतने वाले को 89 लाख रुपये के आसपास मिलते हैं. लेकिन पैसे बड़ी बात नहीं हैं. माना जाता है कि ये पुरस्कार मिलने के बाद नोबल प्राइज पाना बस एक कदम की दूरी पर होता है. अब तक 27 ऐसे वैज्ञानिकों को नोबल मिल चुका है जो पहले वुल्फ प्राइज पा चुके हैं. यानी एक तरह से यह नोबल पुरस्कार के लिए ‘सेमीफाइनल’ की तरह है.
प्रोफेसर जैनेंद्र जैन ने 1989 में क्या खोज की थी जिसके लिए अब मिला फिजिक्स का Wolf Prize?
भारतीय मूल के वैज्ञानिक प्रोफेसर जैनेंद्र के. जैन को वुल्फ प्राइज इन फिजिक्स से सम्मानित किया गया है. इस प्राइज को अक्सर नोबेल पुरस्कार की राह का महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है.


लेकिन ये सब हम आपको क्यों बता रहे हैं? इसलिए बता रहे हैं क्योंकि राजस्थान के सांभर जिले के रहने वाले एक भारतीय वैज्ञानिक जैनेंद्र के जैन को इसी वुल्फ प्राइज से सम्मानित किया गया है. बीती 18 जून को जेरूसलम में एक सरकारी कार्यक्रम में इसाक हेर्जोग के हाथ से उन्होंने ये पुरस्कार ग्रहण किया.
खास बात ये है कि जैनेंद्र फिजिक्स में ये पुरस्कार जीतने वाले भारतीय मूल के पहले व्यक्ति हैं. साल 1978 से वुल्फ प्राइज दिया जा रहा है. तब से लेकर आज तक किसी भारतीय या भारतीय मूल के व्यक्ति को भौतिकी में वुल्फ प्राइज नहीं मिला है. हां, इनसे पहले वेंकटेसन सुंदरेशन को 2024 में और गुरदेव सिंह खुश को साल 2000 में ‘वुल्फ प्राइज इन एग्रीकल्चर’ यानी कृषि विज्ञान के क्षेत्र में ये पुरस्कार दिया गया था.
फिजिसिस्ट तो हैं ही, लेकिन विज्ञान में अच्छा काम करने की मंशा रखने वाले बच्चों के लिए वो एक जबर्दस्त इंस्पिरेशन भी हैं. उनका संघर्ष बताता है कि अगर प्रतिभा है तो रास्ते भी हैं. राजस्थान के एक छोटे से कस्बे सांभर से जेरूसलम में प्राइज पाने तक का प्रोफेसर जैनेंद्र का सफर आसान नहीं था. थार रेगिस्तान के किनारे बसे सांभर नाम के कस्बे में जैनेंद्र के भीतर भौतिक विज्ञान को लेकर जिज्ञासा बढ़ी. उनकी स्कूली पढ़ाई यहीं हुई थी. बचपन में उन्होंने भारतीय वैज्ञानिक सत्येंद्र नाथ बोस और अल्बर्ट आइंस्टाइन की साझेदारी के बारे में पढ़ा था. इसने विज्ञान के प्रति उनके लगाव को और भड़काया.
जैनेंद्र जब 12 साल के थे, तब उनके जीवन में एक बहुत बड़े हादसे ने दस्तक दी. कोलकाता में एक ट्रॉम का एक्सीडेंट हुआ. इस हादसे ने उनकी जिंदगी बदल दी. प्रोफेसर जैनेंद्र की मां की इस हादसे में जान चली गई. खुद वो भी गंभीर रूप से घायल हो गए. इस दुर्घटना ने उन्हें विकलांग बना दिया. बाद में एक आर्टिफिशियल पैर की मदद से वो फिर से चलने लगे.
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जैनेंद्र ने जयपुर के महाराजा कॉलेज से पढ़ाई की है. इसके बाद वो IIT कानपुर में भी पढ़े. न्यूयॉर्क की Stony Brook University से भी शिक्षा हासिल की. सारी पढ़ाई पूरी होने के बाद उन्होंने अमेरिका में एक शानदार वैज्ञानिक करियर बनाया. फिलहाल, जैनेंद्र अमेरिका के पेन्सिलवेनिया स्टेट यूनिवर्सिटी (Pennsylvania State University) में प्रोफेसर हैं. वह मुंबई के लोढा थिअरेटिकल फिजिक्स इंस्टिट्यूट (Lodha Theoretical Physics Institute) के फाउंडर डायरेक्टर भी हैं. अब तक वह 250 से ज्यादा साइंटिफिक रिसर्च पेपर लिख चुके हैं.
किस बात पर मिला प्राइज?ये साल 1989 की बात है. प्रोफेसर साहब येल यूनिवर्सिटी में पोस्टडॉक्टोरल रिसर्चर के तौर पर काम कर रहे थे. उस समय साइंटिस्ट फ्रैक्शनल क्वांटम हॉल इफेक्ट (FQHE) नाम की एक जटिल क्वांटम घटना को समझने की कोशिश कर रहे थे. इसे 1982 में खोजा गया था. इसमें होता ये था कि एक पावरफुल मैग्नेटिक फील्ड में इलेक्ट्रॉन्स काफी विचित्र व्यवहार करने लगते थे. वैज्ञानिकों के पास इसका कोई एक्सप्लेनेशन नहीं था कि ये सब क्यों होता है.
एक दिन की बात है. प्रोफेसर जैन टीवी देख रहे थे. टीवी पर ऐड आ रहा था. उन्होंने पास पड़े एक कागज पर पेन से कुछ भी आकृति बनाना शुरू कर दिया. ये करते हुए अचानक उनके मन में एक विचार कौंधा. उन्हें अचानक समझ आया कि इलेक्ट्रॉन छोटे-छोटे क्वांटम भंवरों (Quantum Vortices) से जुड़कर बिल्कुल नए तरह के पार्टिकल्स बना लेते हैं. इनको ‘कंपोजिट फर्मियॉन’ कहा गया. ये खोज बाद में क्वांटम फिजिक्स की दुनिया की सबसे अहम खोजों में से एक साबित हुई. अब इसी खोज के लिए उन्हें भौतिकी का वुल्फ प्राइज दिया गया है.
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