US-ईरान डील हो गई, क्या अब भारत चाबहार पोर्ट पर लौट सकता है?
अमेरिका और ईरान के बीच पीस डील साइन होने के चलते भारत की कई मुश्किलें आसान होने वाली हैं. भारत फिर से ईरान से कच्चा तेल खरीदना शुरू कर सकता है. वहीं हॉर्मुज से भारतीय जहाजों की आवाजाही भी शुरू होगी और भारत फिर से चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट पर आगे बढ़ सकता है.

अमेरिका और ईरान ने पीस डील साइन की है. इस डील के तहत अमेरिका ने ईरान के क्रूड ऑयल, पेट्रोलियम प्रोडक्ट, बैंकिंग ट्रांजैक्शन और ट्रांसपोर्टेशन सर्विसेज से बैन हटा लिया है. ईरान से बैन हटने के बाद अब भारत फिर से ईरान से कच्चा तेल खरीदना शुरू कर सकता है. होर्मुज से भारतीय जहाजों की आवाजाही भी बेरोकटोक होगी. वहीं भारत फिर से चाबहार पोर्ट को डेवलप करने का प्रोजेक्ट आगे बढ़ा सकता है.
ईरान से तेल खरीद सकता है भारतबिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, इंडियन क्रेडिट रेटिंग एजेंसी में कॉर्पोरेट रेटिंग्स के सीनियर वाइस-प्रेसिडेंट और को ग्रुप हेड प्रशांत वशिष्ठ का मानना है,
ईरान के कच्चे तेल से बैन हटना भारत के लिए अच्छा होगा, क्योंकि ईरान की दूरी भारत से बेहद कम है. साथ ही तेहरान भारत को सबसे ज्यादा क्रेडिट पीरियड भी देता रहा है. ईरान भारत को 60 से 90 दिन का क्रेडिट पीरियड देता है, जबकि दूसरे सप्लायर 30 दिन का पीरियड देते हैं. क्रेडिट पीरियड का मतलब तेल खरीदने के बाद पैसा चुकाने के लिए दिया गया समय होता है.
अमेरिका और ईरान ने 14 पॉइंट पर समझौता किया है. इसको मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MOU) कहा गया है. इस समझौते में ईरान के पेट्रोलियम प्रोडक्टस से बैन हटाना शामिल है. अमेरिका और ईरान अधिकतम 60 दिनों के भीतर समझौते की अंतिम शर्तों पर सहमति बनाने की पूरी कोशिश करेंगे. भारतीय पेट्रोलियम मंत्रालय के एक सीनियर अधिकारी ने बताया,
भारतीय रिफाइनरियों का ईरान या किसी और देश से कच्चा तेल खरीदने का फैसला टेक्निकल और कर्मिशियल फैक्टर्स के आधार पर होता है.
भारत ने आखिरी बार साल 2019 में ईरान से कच्चा तेल खरीदा था. मैरीटाइम इंटेलिजेंस फर्म केप्लर के आंकड़ों के मुताबिक, भारत जब ईरान से सबसे ज्यादा तेल खरीदता था, तब भारत के कुल तेल आयात में ईरान की हिस्सेदारी 11.5 फीसदी थी.
होर्मुज खुलने से राहत
अमेरिका और ईरान के समझौते के बाद अब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज फिर से खुल गया है. इससे भारत की एनर्जी सप्लाई फिर से बहाल हो सकेगी. हालांकि इंडस्ट्री के जानकारों ने चेताया है कि डील होने के बाद भी होर्मुज से शिपिंग ट्रैफिंग सामान्य होने में महीनों लग सकते हैं.
चाबहार प्रोजेक्ट को लेकर बढ़ी उम्मीदें
इस डील से चाबहार पोर्ट को लेकर भारत की दुविधा भी कम होने वाली है. अमेरिका ने चाबहार को लेकर भारत को 26 अप्रैल तक बैन से छूट दी थी. बैन का टाइम खत्म होने के बाद भारत ने अस्थायी तौर पर पोर्ट के संचालन की जिम्मेदारी एक ईरानी संस्था को देने की तैयारी कर ली थी. लेकिन डील की सातवीं शर्त के तहत अमेरिका ने ईरान से सभी तरह का बैन हटाने का वादा किया है.
इसका मतलब है कि भारत फिर से चाबहार पोर्ट पर अपना काम शुरू कर सकता है. भारत ने पहले से ही टर्मिनल इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने और इक्विपमेंट की खरीद में काफी निवेश किया है.
थिंक टैंक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के वाइस प्रेसिडेंट हर्ष पंत बताते हैं,
आमतौर पर ये कहना सही होगा कि भारत के चाबहार ऑपरेशन्स पर अब बैन नहीं रहेगा. लेकिन एक बार डील लागू हो जाएगी और ट्रंप के वोटर्स को लगेगा कि यह डील ईरान के फायदे का है तो राजनीतिक माहौल खराब हो सकता है. फिर इस डील पर खतरा हो सकता है.
हर्ष पंत मानते हैं कि अभी तस्वीर पूरी तरह से साफ नहीं है कि यह डील लंबे समय तक टिक पाएगी या नहीं. चाबहार पोर्ट भारत के लिए बेहद अहम है. चाबहार के पास ही पाकिस्तान का ग्वादर पोर्ट है. इसमें चीन का निवेश है. चाबहार पोर्ट भारत को रणनीतिक मजबूती देगा और चीन-पाकिस्तान गठजोड़ को काउंटर करने में मदद करेगा. ऐसे में चाबहार भारत के लिए रणनीतिक और कारोबारी दोनों लिहाज से अहम है.
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