पटना हाई कोर्ट में एक मुस्लिम महिला ने पेंशन से जुड़ी याचिका दायर की थी. महिला के पति की 2020 में मौत हो गई थी. वह उनकी दूसरी पत्नी थी. लेकिन राज्य के फाइनेंस डिपार्टमेंट ने उसे पेंशन नहीं दी. महिला का आरोप है कि दूसरी पत्नी होने के कारण उसे पेंशन नहीं दी गई. अब कोर्ट ने कहा है कि मुस्लिम समाज में एक से ज्यादा शादी करने (बहुविवाह) पर रोक लगाने वाला कोई कानून नहीं है. ऐसे में अगर किसी महिला की शादी सरकारी कर्मचारी से मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत वैध थी, तो वह फैमिली पेंशन पाने की हकदार है.
मृत मुस्लिम सरकारी कर्मचारी की बाकी पत्नियां भी पेंशन की हकदार, पटना HC का अहम फैसला
Muslim widow pension: 14 अक्टूबर 2020 को याचिकाकर्ता के पति की मौत हो गई. वह मृतक कर्मचारी की एकमात्र जीवित पत्नी है. उसका कहना है कि यह पेंशन इसलिए भी जरूरी है ताकि वह अपने बेरोजगार बालिग बच्चों का भरण-पोषण कर सके.

Live Law की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस पूर्णेंदु सिंह की सिंगल बेंच नजमा खातून की एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी. नजमा खातून ने याचिका में कहा था कि उनके पति सरकारी कर्मचारी थे. पहली पत्नी की मौत के बाद, उनके पति ने पेंशन पेमेंट ऑर्डर में उनका (नजमा) नाम शामिल करने का अनुरोध किया था. इसमें छोटी बेटी को योग्य परिवार के सदस्य के तौर पर जोड़ने के लिए कहा था. मगर उन्हें फैमिली पेंशन की मंजूरी नहीं मिली.
याचिका में महिला ने बताया कि फाइनेंस डिपार्टमेंट के 27 जून 2011 के रिजॉल्यूशन (मेमो नंबर 1549) के मुताबिक, किसी मृत मुस्लिम सरकारी कर्मचारी ने पर्सनल लॉ के तहत शादी की है तो उसकी शादी वैध मानी जाएगी और उसकी सभी जीवित विधवाएं फैमिली पेंशन की बराबर हिस्सेदार होंगी.
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14 अक्टूबर 2020 को नजमा के पति की मौत हो गई. वह मृतक कर्मचारी की एकमात्र जीवित पत्नी हैं. उनका कहना है कि यह पेंशन इसलिए भी जरूरी है ताकि वह अपने बेरोजगार बालिग बच्चों का भरण-पोषण कर सकें. याचिकाकर्ता ने बताया कि मुस्लिम लॉ में एक पुरुष चार शादियां कर सकता है.
मामले में राज्य की तरफ से तर्क दिया गया कि ‘बिहार सरकारी कर्मचारी आचरण नियम, 1976’ के नियम 23 के तहत सरकारी कर्मचारी के लिए दूसरी शादी करने से पहले पूर्व अनुमति जरूरी है. भले ही पर्सनल लॉ के तहत ऐसी शादी की इजाजत हो.
जस्टिस पूर्णेंदु सिंह ने कहा,
“जब तक राष्ट्रीय स्तर पर या राज्य सरकार द्वारा 'यूनिफॉर्म सिविल कोड' लागू करने या मुसलमानों में बहुविवाह पर रोक लगाने वाला कोई कानून नहीं बनता, तब तक मुसलमानों के वैवाहिक अधिकारों और दायित्वों पर मुस्लिम पर्सनल लॉ ही लागू रहेगा.”
कोर्ट ने यह भी पाया कि राज्य ने अपने काउंटर एफिडेविट में याचिकाकर्ता के दावे का खंडन नहीं किया था. कोर्ट ने कहा कि 27 जून 2011 का रिजॉल्यूशन अब भी प्रभावी है. इसे ना तो रद्द किया गया है और ना ही उसके बदले कोई नया प्रस्ताव लाया गया है. ऐसे में कोर्ट ने लखीसराय के सिविल सर्जन को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ता के पक्ष में फैमिली पेंशन मंजूर करने के लिए कदम उठाएं.
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