एक केमिकल, जिसकी महज कुछ बूंदें इंसान की इहलीला समाप्त कर सकती हैं. जिसका दुनिया में कोई एंटीडोट (काट) तक नहीं मिलता, वह भारत के खेतों में खुलेआम छिड़का जा रहा है. खेतों में खरपतवारनाशक के तौर पर इस्तेमाल होने वाला ये केमिकल है पैराक्वाट डाइक्लोराइड.
इस केमिकल को 74 देशों ने बैन किया, लेकिन भारत के खेतों में धड़ल्ले से छिड़का जा रहा
पैराक्वाट डाइक्लोराइड को दुनिया भर के करीब 74 देशों ने पूरी तरह से बैन कर दिया है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इतने बड़े विरोध के बावजूद भारत की मिट्टी में हर साल सैंकड़ों मीट्रिक टन की मात्रा में यह केमिकल उड़ेला जा रहा है.


यह केमिकल फसलों की आड़ में हमारी मिट्टी, पर्यावरण और किसानों की जिंदगी में धीमा जहर घोलने का काम कर रहा है. लोगों की जान के लिए खतरा बन चुके इस केमिकल को कई विकसित और विकासशील देश पूरी तरह से बैन कर चुके हैं. लेकिन हमारे देश में कमजोर रेगुलेशन सिस्टम के चलते इस घातक जहर का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है.
इंडिया टुडे से जुड़े ओम प्रकाश की रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर के करीब 74 देशों ने इस केमिकल को पूरी तरह से बैन कर दिया है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इतने बड़े विरोध के बावजूद भारत की मिट्टी में हर साल सैंकड़ों मीट्रिक टन की मात्रा में यह केमिकल उड़ेला जा रहा है.
पैराक्वाट डाइक्लोराइड का इतिहास जान लीजिए
पैराक्वाट को साल 1882 में दो ऑस्ट्रियाई वैज्ञानिकों ने लैब में तैयार किया था. शुरुआती दौर में इस केमिकल को ‘मिथाइल वायलोन’ के नाम से जाना जाता था. तब इसके घातक असर के बारे में लोगों को अंदाजा नहीं था. उस समय इसका उपयोग केवल कपड़ों और दूसरी चीजों को रंगने के लिए एक केमिकल डाई के तौर पर किया जाता था.
साल 1955 में पहली बार इस केमिकल की खरपतवारनाशनक क्वालिटी का पता चला. ब्रिटेन के बर्कशायर स्थित इम्पीरियल केमिकल इंडस्ट्रीज (ICI) की 'जिलॉट्स हिल' लैब में काम कर रहे वैज्ञानिकों ने पता लगाया कि यह केमिकल पौधों को बहुत तेजी से सुखाकर नष्ट कर सकता है. इस खोज के बाद ब्रिटिश कंपनी ICI ने साल 1961 से यूके में इसका उत्पादन शुरू किया. फिर साल 1962 में इसे दुनिया भर के बाजार में ‘ग्रामोक्सोन’ ब्रांड के तौर पर उतारा गया.
लेकिन जिन देशों में यह केमिकल खोजा गया और खरपतवारनाशक के तौर पर इसकी पहचान हुई, वहां के किसान चाह कर भी इसका इस्तेमाल नहीं कर सकते. ऑस्ट्रिया की सरकार ने साल 1993 में और ब्रिटेन की सरकार ने साल 2007 में पैराक्वाट की बिक्री और इसके छिड़काव पर कानूनी तौर पर बैन लगा दिया.
एक और परेशान करने वाला तथ्य ये है कि इंग्लैंड ने अपने नागरिकों की सुरक्षा को देखते हुए इस केमिकल को बैन कर दिया. लेकिन वहां की सरकार ने इसे बनाने वाली कंपनियों को विदेशों में मुनाफा कमाने की खुली छूट दे रखी थी.
इससे भी हैरान करने वाली बात ये है कि पैराक्वाट बनाने वाली सबसे बड़ी कंपनियों में से एक मल्टी नेशनल कंपनी सिंजेटा का हेडक्वार्टर जिस स्विटजरलैंड में है, उसने भी साल 1989 में इस केमिकल के इस्तेमाल पर पूरी तरह से बैन लगा दिया था.
इस मामले में दोहरेपन की मिसाल तो चीन ने भी पेश की है. साल 2017 में उसने अपने यहां इस केमिकल के इस्तेमाल पर बैन लगा दिया, लेकिन इसे बनाने वाली मूल कंपनी का मालिकाना हक अब चीन के पास ही है. हालांकि सिजेंटा ने फैसला किया है कि जून 2026 तक वह ग्लोबल लेवल पर पैराक्वाट का उत्पादन बंद कर देगी. लेकिन इसे बनाने वाली कंपनियों का कारोबार चलता रहेगा.
इनके अलावा यूरोपीय संघ के ताकतवर देशों- फ्रांस, जर्मनी, इटली और स्पेन ने साल 2007 में इस केमिकल को बैन किया था. ब्राजील, थाईलैंड, मलेशिया, कनाडा, वियतनाम, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे बड़े कृषि प्रधान देशों ने भी पैराक्वाट पर रोक लगा दी है. लेकिन भारत में अब तक ऐसा कोई फैसला नहीं लिया गया है.
भारत में पैराक्वाट की एंट्री की कहानी
भारत में ग्रीन रिवॉल्यूशन के दौर में इस केमिकल को बाजार में एंट्री मिली. अपने देश में किसी भी कीटनाशक को सेंट्रल इंसेक्टिसाइड बोर्ड एंड रजिस्ट्रेशन कमेटी (CIBRC) की अनुमति लेनी होती है. CIBRC ने ‘पैराक्वाट डाइक्लोराइड 24% SL’ को भारत में केवल 9 फसलों में इस्तेमाल के लिए रजिस्टर्ड किया. इसमें चाय, आलू, कपास, रबर, कॉफी, धान, गेहूं, मक्का और अंगूर शामिल हैं.
लेकिन सवाल है कि जिस केमिकल को 74 देशों ने अपने नागरिकों के लिए खतरा मानकर बैन कर दिया है उसका इस्तेमाल भारत में क्यों हो रहा है? कौन से वैज्ञानिक, ब्यूरोक्रेट या फिर मंत्री थे और हैं, जिनकी वजह से इस जहर का इस्तेमाल अब तक जारी है? आलम ये है कि कोई भी कृषि वैज्ञानिक इसके खिलाफ मुंह खोलने को तैयार नहीं होता. आखिर इस केमिकल रूपी जहर को बनाने वाली कंपनियों के साथ उनके क्या हित जुड़े हुए हैं?
कमेटी की कानूनी ढाल बचा रही
केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने उन 66 कीटनाशकों का टेक्निकल रिव्यू करने के लिए 8 जुलाई 2013 को एक कमेटी बनाई, जो दुनिया के दूसरे देशों में बैन थे. लेकिन भारत में उनका इस्तेमाल हो रहा था. भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के पूर्व प्रोफेसर डॉ. अनुपम वर्मा इसके अध्यक्ष बनाए गए. इस कमेटी ने साल 2015 में पैराक्वाट डाइक्लोराइड को एक कानूनी ढाल दे दी.
कमेटी ने जिन सुरक्षा मानकों, सुरक्षित पैकेजिंग और डॉक्टरों की ट्रेनिंग जैसी शर्तों के भरोसे इस केमिकल को भारत में हरी झंडी दी थी, वे आज पूरी तरह से कागजी साबित हो रहे हैं. हर साल करीब 100 मीट्रिक टन से ज्यादा पैराक्वाट डाइक्लोराइड हमारे खेतों में छिड़का जा रहा है. खेतों के जरिए ये हमारी थाली तक पहुंच रहा है. बिना किसी सिक्योरिटी गियर के इसका छिड़काव कर रहे किसानों में भी लगातार मौत और गंभीर बीमारियों के मामले सामने आ रहे हैं.
व्यवस्था की खुली लापरवाही का सबसे भयावह रूप राजस्थान और मध्य प्रदेश के खेतों में दिख रहा है. लेबर खर्च बचाने के चक्कर में किसान खड़ी मूंग को सुखाने के लिए पैराक्वाट का इस्तेमाल कर रहे हैं. महज दो दिनों में सुखाकर काटी गई यह मूंग सीधे तौर पर हमारी फूड चेन का हिस्सा बन रही है. यानी ये जहर हमारी थाली और पेट तक पहुंच रहा है.
नोट: यह आर्टिकल पैराक्वाट और भारत के रेगुलेटरी फ्रेमवर्क की कड़ी आलोचना करता है. इसके दावे और निष्कर्ष मूल लेखक के दृष्टिकोण को दिखाते हैं. वैज्ञानिक आकलन, रेगुलेटरी रिव्यू और आधिकारिक प्रतिक्रियाओं के साथ-साथ इनकी स्टडी की जानी चाहिए.
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