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तिरुवल्लुवर कौन थे, जिनकी किताब पीएम मोदी ने पुतिन को भेंट की?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को संत तिरुवल्लुवर की कालजयी कृति ‘तिरुक्कुरल’ भेंट की, जिसके 1330 दोहों में नैतिकता, सदाचार और जीवन-दर्शन की सीख मिलती है.

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पीएम मोदी ने पुतिन को संत तिरुवल्लुवर की किताब भेंट की है. (फोटो- India Today)

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  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को तमिल संत तिरुवल्लुवर की 1330 दोहों वाली किताब 'तिरुक्कुरल' उपहार में दी।
  • तिरुवल्लुवर की जीवनशैली, धर्म और जन्मकाल के बारे में अस्पष्टता है, जिसमें उनकी जाति और धार्मिक पहचान को लेकर विभिन्न मत विद्यमान हैं।
  • तिरुवल्लुवर की कविताएं तमिल संस्कृति और नैतिक मूल्यों का प्रतीक हैं, और उनकी शिक्षाओं का उपयोग राजनीतिक और सामाजिक संदर्भों में किया जाता है।

बात 1000-1200 साल पहले की है. जो मद्रास अब चेन्नई हो गया है, उसके पास एक मायलापुर नाम की जगह थी. यहां एक बगीचे में भगवान शंकर का ‘शांत-एकांत’ मंदिर था. इस मंदिर के पास तमिलनाडु में जमींदार तबका कहे जाने वाले ‘वेल्लालन जाति’ की एक महिला ने एक नवजात बच्चे को देखा. बच्चा अकेला था. न आस-पास उसके मां-बाप थे. न कोई और गार्जियन. किसका बच्चा है. किस गांव का है. इसकी जाति-धर्म क्या है, इसके बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं थी. महिला ने इस अनाथ बच्चे को अपनी गोद में उठा लिया और अपने साथ घर ले गई. कहते हैं बाद में उन्होंने इस बच्चे को एक ‘पारिया परिवार’ को देखभाल के लिए दे दिया.

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आगे चलकर यही ‘अनाथ’ बच्चा अपने दर्शन और ज्ञान से इतना बड़ा संत कवि बना कि उसके जाने के सैकड़ों साल बाद तक उसकी कविताएं समाज और देश को राह दिखा रही हैं. हम बात कर रहे हैं प्रसिद्ध तमिल संत तिरुवल्लुवर की. 

तिरुवल्लुवर के दुनिया में आने के बारे में लोककथाएं यही कहानी बताती हैं. वह तमिलनाडु के सूर, तुलसी और कबीर की श्रेणी के कवि और संत माने जाते हैं. तमिल लोग प्यार से उन्हें ‘वल्लुवर’ कहते हैं. कहते हैं वल्लुवर की 1330 दोहों वाली किताब ‘तिरुक्कुरल’ हर तमिल घर का अभिन्न हिस्सा है. ठीक वैसे ही, जैसे उत्तर भारत के हिंदू घरों में भगवद्गीता और रामचरितमानस पाई जाती है.

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मोदी ने पुतिन को भेंट की तिरुक्कुरल

आज तिरुवल्लुवर की चर्चा इसलिए क्योंकि उनकी यही कालजयी किताब ‘तिरुक्कुरल’ दिल्ली आए रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गिफ्ट किया है. इसके बाद से सैकड़ों साल पहले हुआ वह कवि फिर से चर्चा में है. 

ये पहली बार नहीं है जब दक्षिण के महान संत तिरुवल्लुवर और उनकी कविता की किताब की चर्चा दिल्ली में हुई हो. इससे पहले भी प्रधानमंत्री मोदी को सीमा पर झड़प में उलझी सेना को संबोधित करना हो या वित्त मंत्री को बजट का भाषण समझाना हो, भाषा की तलाश में हर कोई ‘तिरुक्कुरल’ लिखने वाले तिरुवल्लुवर के पास जाता रहा है. 

ऐसे में उत्तर भारत के हिंदीभाषी लोगों के लिए यह जिज्ञासा का विषय हो सकता है कि आखिर संत तिरुवल्लुवर थे कौन? और सदियों बाद भी भारत की राजनीति में इतने प्रासंगिक क्यों हैं कि किसी विदेशी मेहमान राष्ट्राध्यक्ष को गिफ्ट देने के लिए प्रधानमंत्री को उनकी किताब देने का विचार सबसे पहले आया?

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कौन हैं तिरुवल्लुवर?

तिरुवल्लुवर संत की परिभाषा में ऐसे फिट हैं कि हिंदू उन्हें अपना मानते हैं. जैनों का कहना है कि वो उनके संत हैं. फिर जब द्रविड़ आंदोलन हुआ तो आंदोलन करने वालों को तिरुवल्लुवर ही अपनी आत्मा की आवाज लगे. हालांकि, इतने सालों बाद भी ये साफ-साफ कहा नहीं जा सकता कि तिरुवल्लुवर की धार्मिक पहचान असल में थी क्या? आपको कबीरदास याद आ रहे होंगे. उनके जन्म, जाति और धर्म के बारे में ऐसी ही अस्पष्टता है. लेकिन उनकी कविताई और दार्शनिक दोहे जाति-धर्म-भाषा के हर दायरे को तोड़ते नजर आते हैं.  

तमिल समाज में तिरुवल्लुवर भी ठीक कबीर की ही तरह के संत हैं. ‘जाति न पूछो साधु की पूछ लीजिए ज्ञान’ वाले. संत तिरुवल्लुवर का भी ऐसा ही है. न उनके माता-पिता के बारे में पता है. न जन्म की तारीख. कहां पैदा हुए ये भी ठीक-ठीक जानकारी किसी को नहीं है. कुछ लोगों ने खोज-पड़ताल की कोशिश की और ‘हो सकता है’ के आधार पर कई तरह की संभावनाएं जताईं. जैसे, 1873 में एक किताब छपी. Tamil Wisdom: Traditions Concerning Hindu Sages and Selections from their Writings. 

प्रोटेस्टेंट मिशनरी एडवर्ड ज्यूइट रॉबिन्सन ने ये किताब लिखी थी. रॉबिन्सन ‘तिरुक्कुरल’ के शुरुआती अनुवादकों में से एक हैं. उनका कहना है कि तिरुवल्लुवर ‘पारिया’ जाति के थे. इस जाति को तब के समाज में काफी निचला दर्जा प्राप्त था. रॉबिन्सन ने ये भी लिखा कि वल्लुवर की मां कथित ‘निचले वर्ग’ से आती थीं, जबकि उनके पिता शायद ब्राह्मण थे.

तिरुवल्लुवर के ऐतिहासिक रूप से अस्तित्व को लेकर भी पूरी तरह निश्चित जानकारी नहीं है. वो किस समय में रहे, इसे लेकर इतिहासकारों में मतभेद है. कुछ लोग उन्हें तीसरी या चौथी सदी का मानते हैं. जबकि कुछ इतिहासकारों के मुताबिक, वो इसके करीब 500 साल बाद यानी 8वीं या 9वीं सदी में पैदा हुए थे. उनकी धार्मिक पहचान को लेकर भी अलग-अलग दावे हैं. कुछ लोग उन्हें हिंदू मानते हैं तो कुछ जैन संत. द्रविड़ विचारधारा से जुड़े लोग उन्हें ऐसे संत के रूप में देखते हैं, जिनकी पहचान किसी धर्म से नहीं बल्कि उनकी द्रविड़ जड़ों से होती है.

नैतिक मूल्यों के प्रतीक

तिरुवल्लुवर को तमिल संस्कृति और नैतिक मूल्यों का प्रतीक माना जाता है. उन्हें तमिल लोग अपनी सांस्कृतिक जड़ों को समझने का आधार मानते हैं. तमिल परिवारों में बच्चों से कहा जाता है कि वो तिरुवल्लुवर की कविताओं को रट डालें और उसके हर एक शब्द को सीखने की कोशिश करें. उनके बताए सिद्धांतों को रोजमर्रा की जिंदगी में भी अपनाने की सीख दी जाती है. 

हालांकि, वह सिर्फ तमिल समाज तक ही सीमित नहीं हैं. तमिलनाडु के बाहर भी जब भारत की प्राचीन दार्शनिक या संत परंपरा की बात की जाती है तो तिरुवल्लुवर का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है. नैतिकता और सदाचार के संदर्भ में उनकी कविताएं बार-बार दोहराई जाती हैं. कांग्रेस के पी चिदंबरम हों या बीजेपी की निर्मला सीतारमण. बतौरा वित्त मंत्री कई बार अपने बजट भाषण के दौरान तिरुवल्लुवर की कविताओं का पाठ कर चुके हैं. पूर्व वित्त मंत्री चिदंबरम तो 1996 से पेश किए गए अपने सभी बजटों में तिरुवल्लुवर का हवाला देते रहे हैं.

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मोदी ने पढ़ी कविता

और सिर्फ चिदंबरम या सीतारमण ही क्यों? जुलाई 2020 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लद्दाख में सेना को संबोधित करते हुए तिरुवल्लुवर की एक कविता पढ़ चुके हैं, जिसका मतलब होता है - वीरता, सम्मान, गरिमापूर्ण व्यवहार और विश्वसनीयता सेना के ये चार गुण होते हैं. 2019 के 15 अगस्त को अपने भाषण में वह पानी की महिमा बताते हुए कहते हैं कि ‘नीरिन्री अमैयादु उलगु एनिन यार्यार्क्कुम, वानिन्ऱि अमैयादु ओळुक्कु.' यानी पानी के बिना दुनिया नहीं चल सकती. इसके अलावा संसद में भी उन्होंने कई बार तिरुवल्लुवर की कविताओं का जिक्र किया है.

ये सब कविताएं वल्लुवर की किताब ‘तिरुक्कुरल’ में हैं, जो प्रधानमंत्री मोदी ने पुतिन को भेंट की है.

1330 दोहों वाली किताब ‘तिरुक्कुरल’ को ‘पवित्र दोहे’ भी कहा जाता है. इसमें कविता की भाषा में नैतिकता और जीवन से जुड़ी सीख दी गई है. हालांकि, इस रचना में खुद तिरुवल्लुवर को लेखक के तौर पर नहीं बताया गया है. उनका नाम बाद में लिखी गई ‘तिरुवल्लुव माला’ नाम की कविताओं के एक संग्रह में पहली बार मिलता है. 

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