मद्रास हाईकोर्ट ने एक ‘ऑल-वीमन पुलिस स्टेशन’ को फटकार लगाई. कोर्ट ने कहा कि यह ‘विरोधाभासी’ है कि महिलाओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाले संस्थान ही अपनी जिम्मेदारियों को कानूनी तरीके से निभाने में नाकाम हो रहे हैं. मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस एल. विक्टोरिया गौरी ने कहा कि पुलिस अनौपचारिक समझौतों के जरिए आपराधिक आरोपों को कमजोर नहीं कर सकती. उन्होंने 9 जुलाई को आदेश में आगे कहा,
'मध्यस्थ मत बनो, कानून लागू कराओ', महिला थाने को हाईकोर्ट ने क्यों फटकार दिया?
Madras High Court slams All-Women Police Stations: मद्रास हाई कोर्ट ने एक 'ऑल-वीमन पुलिस स्टेशन' को फटकार लगाई. कहा कि यह "विरोधाभासी" है कि महिलाओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाले संस्थान ही अपनी कानूनी जिम्मेदारियों को जरूरी संवेदनशीलता और कानूनी तरीके से निभाने में नाकाम हो रहे हैं.


यह बहुत चिंताजनक है कि महिलाओं में भरोसा जगाने के बजाय कुछ 'ऑल-वुमन पुलिस स्टेशन' को आपसी समझौते कराने वाली अनौपचारिक जगहों के तौर पर देखा जाने लगा है. जहां अक्सर आपराधिक कानून की जरूरी शर्तों को नजरअंदाज कर दिया जाता है.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, आदेश में आगे कहा गया,
महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाए गए किसी संस्थान को कानूनी ढांचे से बाहर काम करने वाले अनौपचारिक विवाद-निपटान तंत्र में बदलने की इजाजत नहीं दी जा सकती. जब आरोपों से संज्ञेय अपराध होने का पता चलता है तो पुलिस अधिकारी मध्यस्थ नहीं हो सकते. उनकी सबसे पहली जिम्मेदारी आपराधिक कानून के नियमों का ईमानदारी से पालन करना है.
कोर्ट ने कहा कि महिला पुलिस थानों के इस तरह के रवैये कानून के अनुरूप नहीं हैं. साथ ही यह दहेज उत्पीड़न के आरोपों की गंभीरता को भी कम करके दिखाता है.
दहेज की मांग पूरी नहीं की, तो शादी रद्दइस मामले में एक शख्स ने पुलिस थाने की कार्रवाई के खिलाफ कोर्ट का रुख किया था. उसकी बेटी की शादी 8 जून 2026 को होनी थी लेकिन तारीख से पहले ही दूल्हे के परिवार ने कथित तौर पर दहेज की मांग रख दी. जब पिता ने मांग पर आपत्ति जताई तो आरोपी पक्ष ने एकतरफा तरीके से शादी रद्द कर दी. याचिकाकर्ता के वकील वानिश और एस किशोर कुमार ने दावा किया कि शख्स मामले को लेकर ‘ऑल-वीमन पुलिस स्टेशन’ गया. लेकिन यहां कानून के अनुसार कार्रवाई शुरू करने के बजाय पुलिस ने कथित तौर पर आपसी समझौते में मदद की.
उन्होंने याचिकाकर्ता को दहेज की रकम के आंशिक रिफंड के तौर पर सिर्फ 5 लाख रुपये लेने के लिए मनाया. बाकी रकम की वसूली के लिए एक और महीने इंतजार करने को कहा. फिर मामला बंद कर दिया.
कोर्ट ने 14 जुलाई को मांगा स्पष्टीकरणसरकारी वकील डी राजाबूपाथी ने याचिकाकर्ता के दावे का विरोध किया और कहा कि शिकायत की ठीक से जांच की गई थी और दोनों पक्ष स्वेच्छा से पुलिस स्टेशन के बाहर आपसी समझौते पर सहमत हुए थे.
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आखिर में यह मानते हुए कि इस मामले की गंभीरता से न्यायिक जांच होनी चाहिए. कोर्ट ने संबंधित पुलिस अधिकारी को मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच में 1-1 लाख रुपये जमा करने. और 14 जुलाई को विस्तृत स्पष्टीकरण के साथ कोर्ट में पेश होने का निर्देश दिया.
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