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चीन के चक्कर में नेपाल में फंसे शिवभक्त, कैलाश मानसरोवर यात्रा पर MEA की नई एडवाइजरी का पूरा सच

Kailash Mansarovar Yatra: विदेश मंत्रालय (MEA) ने नेपाल के रास्ते कैलाश मानसरोवर जाने वाले भारतीय यात्रियों के लिए सख्त चेतावनी जारी की है. चीन की वीजा नीतियों में देरी और प्राइवेट टूर ऑपरेटर्स के सिंडिकेट के कारण सैकड़ों शिवभक्त सिमिकोट में फंसे हैं. पैसे फंसाने से पहले ये पूरी गाइडलाइन पढ़ लें.

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कैलाश मानसरोवर यात्रा पर MEA की नई एडवाइजरी (फाइल फोटो- इंडिया टुडे)

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  • लखनऊ से कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर निकले तीर्थयात्रियों को वीजा मिलने में देरी के कारण नेपाल के सिमिकोट और हिल्सा में दो दिनों से फंसा हुआ है, जिससे उनकी यात्रा अधर में लटकी हुई है।
  • कोविड-19 महामारी और भारत-चीन सीमा तनाव के कारण पारंपरिक नाथू-ला और लिपुलेख रूट बंद होने से यात्रियों को नेपाल के रास्ते से जाना पड़ रहा है, जहां चीनी वीजा प्रक्रिया में देरी हो रही है।
  • भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस स्थिति को देखते हुए 27 जून 2026 को एडवाइजरी जारी कर यात्रियों को सावधानी बरतने को कहा है, और भारत सरकार घरेलू यात्रा विकल्पों को बढ़ावा दे रही है।

लखनऊ से कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर निकले 52 साल के रमेश शर्मा (बदला हुआ नाम) अधर में लटके हुए हैं. दो दिनों से नेपाल के सिमिकोट के अपने लॉज में बैठे-बैठे उसकी तीर्थयात्रा का जोश अब बेचैनी में बदलने लगा है. अगर सब कुछ प्लान के मुताबिक चल रहा होता वो अब तक वो तिब्बत बॉर्डर क्रॉस करके कैलाश मानसरोवर के बेहद करीब पहुंच चुके होते. मगर वीजा मिलने में देरी और जेब में खत्म होते पैसों ने उनकी टेंशन बढ़ा दी है. लल्लनटॉप से बात करते हुए वो कहते हैं,

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एजेंट ने कहा था कि काठमांडू पहुंचते ही चीनी ग्रुप वीजा मिल जाएगा. हम नेपालगंज आए, वहां से सिमिकोट आए, लेकिन अब ऑपरेटर कह रहा है कि बीजिंग से क्लीयरेंस अटक गया है. ना आगे जा सकते हैं, ना पीछे लौटने का मन हो रहा है.

ये कहानी सिर्फ रमेश की नहीं है. ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की खबर के मुताबिक इस समय नेपाल के रास्ते कैलाश मानसरोवर जाने की आस में निकले सैकड़ों भारतीय शिवभक्त सिमिकोट, हिल्सा और काठमांडू के अलग-अलग होटलों में फंसे हैं.चीनी दूतावास की तरफ से वीजा मिलने में होने वाली देरी यात्रियों के लिए आफत बन गई है. यात्रियों की इसी मुसीबत को देखते हुए भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) को शनिवार, 27 जून 2026 को एक बेहद जरूरी एडवाइजरी जारी करनी पड़ी है.

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पुराना रूट बनाम नया रूट: कैसे आफत बन गया ये सफर?

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक 20 जून को ही सिक्किम के गर्वनर ओम प्रकाश माथुर ने नाथू-ला रूट से कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए निकले तीर्थयात्रियों को रवाना किया था. यहां ये जान लेना जरूरी है कि सालों तक भारतीय यात्री उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे या सिक्किम के नाथू-ला रूट से ही से सुरक्षित कैलाश मानसरोवर जाते थे. वो रूट सरकारी था, जहां कुमाऊं मंडल विकास निगम (KMVN) जैसी सरकारी एजेंसियां पूरा जिम्मा संभालती थीं. लेकिन कोविड के बाद से और भारत-चीन के बीच सीमा पर बढ़े तनाव के कारण ये पारंपरिक काफी समय तक बंद रहे.

जब पुराना रास्ता बंद हुआ, तो दिल्ली, लखनऊ और काठमांडू के प्राइवेट टूर ऑपरेटर्स ने एक नया रास्ता खोज निकाला. यात्री पहले दिल्ली या लखनऊ से काठमांडू पहुंचते हैं. वहां से डोमेस्टिक फ्लाइट लेकर नेपालगंज आते हैं. नेपालगंज से छोटे जहाजों या हेलीकॉप्टर के जरिए पहाड़ों के बीच बसे सिमिकोट लाया जाता है. सिमिकोट से फिर हेलीकॉप्टर लेकर हिल्सा (नेपाल-चीन बॉर्डर) पहुंचते हैं, जहां से तिब्बत में एंट्री होती है. 

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कैलाश मानसरोवर यात्रा रूट (फोटो- AI)

इस रूट से यात्रा होगी या नहीं, ये काफी हदतक चीनी अधिकारियों के रहमो करम पर निर्भर हो गया है. सिमिकोट और हिल्सा में इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम पर कुछ बुनियादी लॉज हैं. जब अचानक सैकड़ों यात्री वहां रुक जाते हैं, तो वहां खाना और दवाइयों का संकट खड़ा हो जाता है. प्राइवेट एजेंट्स के लिए ये रूट मोटी कमाई का जरिया बन गया है, जहां वो प्रति यात्री 3 से 5 लाख रुपये वसूल रहे हैं, लेकिन सुरक्षा और गारंटी के नाम पर हाथ खड़े कर देते हैं.

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चाइनीज डिप्लोमेसी: वीजा में 'होल्ड और देरी' का खेल

सवाल उठता है कि चीन आखिर ऐन वक्त पर वीजा देने में आनाकानी क्यों कर रहा है? डिप्लोमेटिक एक्सपर्ट्स मानते हैं कि ये सिर्फ लॉजिस्टिक्स या किसी तकनीकी खराबी का मामला नहीं है. रणनीतिक थिंक टैंक ‘इंडिया मैटर्स’ के रोहित शर्मा कहते हैं,

कैलाश मानसरोवर यात्रियों को वीजा देने में हिला हवाली करने के पीछे चीन का गहरा जियोपॉलिटिकल प्रेशर गेम है. चीन अक्सर भारत के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों के तनाव का गुस्सा इस यात्रा पर निकालता है. अबकी बार चीन ने ग्रुप वीजा के नियमों को अचानक कड़ा कर दिया है. वो वीजा एप्लीकेशन को 'होल्ड' पर रख रहा है और वेरिफिकेशन के नाम पर हफ्तों की देरी कर रहा है. 

रोहित मानते हैं कि चीन तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र (TAR) में एंट्री को पूरी तरह उसके नियंत्रण में होने का शो ऑफ कर रहा है. चीन जताना चाहता है कि वो जब चाहे भारतीय नागरिकों की आवाजाही को रोक सकता है. इस डिप्लोमैटिक खींचतान में नुकसान सिर्फ उन भोले-भाले शिवभक्तों का हो रहा है, जो जिंदगी भर की जमापूंजी लगाकर इस यात्रा पर निकलेे हैं.

टूर ऑपरेटर्स का सिंडिकेट: 5 लाख लेकर भी अधर में सफर

इस पूरी आफत को बड़ा बनाने में दिल्ली, लखनऊ और काठमांडू के टूर ऑपरेटर्स के सिंडिकेट का बड़ा हाथ है. ये एजेंट्स बड़े-बड़े विज्ञापनों के जरिए दावा करते हैं कि उनके पास 'कन्फर्म चीनी क्लीयरेंस' है. वो यात्रियों से 3 लाख से लेकर 5 लाख रुपये तक एडवांस ले लेते हैं.

लेकिन जैसे ही यात्री नेपाल के दुर्गम इलाकों में फंसते हैं, इन ऑपरेटर्स का रवैया बदल जाता है. वो सारा दोष मौसम या चीनी नियमों पर मढ़कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं. कई मामलों में तो ये भी देखा गया है कि एजेंट्स ने यात्रियों के पासपोर्ट ले लिए और वीजा रिजेक्ट होने के बाद भी रिफंड देने से मना कर दिया. विदेश मंत्रालय ने इसी सिंडिकेट से बचने के लिए यात्रियों को सख्त चेतावनी दी है.

भारत के पास और क्या रास्ते हैं?

अगर आप सोच रहे हैं कि क्या भारत की तरफ से कोई सीधा रास्ता खुला है, तो जवाब फिलहाल निराशाजनक है. उत्तराखंड के लिपुलेख और सिक्किम के नाथू-ला दर्रे से होने वाली आधिकारिक यात्रा साल 2020 से स्थगित कुछ सालों तक स्थगित रही. हालांकि भारत सरकार ने अपनी तरफ से लिपुलेख तक शानदार पक्की सड़क बना दी है, लेकिन चीन ने अपनी तरफ से बॉर्डर खोलने की अनुमति लंबे समय तक नहीं दी.

जिस वजह से एक और विकल्प जो हाल के दिनों में चर्चा में आया, वो है उत्तराखंड के पिथौरागढ़ से 'ओल्ड लिपुलेख' की चोटी पर जाकर दूर से ही कैलाश पर्वत के दर्शन करना. भारत सरकार इस डोमेस्टिक टूरिज्म रूट को प्रमोट कर रही है ताकि यात्रियों को चीनी वीजा के झंझट में ना पड़ना पड़े. लेकिन जो लोग पूरी परिक्रमा करना चाहते हैं, उनके लिए फिलहाल नेपाल के रास्ते चीन पर निर्भर रहने के अलावा कोई चारा नहीं है.

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कैलाश मानसरोवर यात्रा से जुड़ी हर जरूरी जानकारी (ग्राफिक्स- AI)

यात्रियों के लिए चेकलिस्ट: पैसे फंसाने से पहले ये 5 डॉक्युमेंट्स जरूर जांचें

अगर आप इस सीजन में या आने वाले समय में कैलाश मानसरोवर जाने का मन बना रहे हैं, तो विदेश मंत्रालय की गाइडलाइन के मुताबिक किसी भी ऑपरेटर को पैसे देने से पहले इन 5 लीगल डॉक्युमेंट्स की जांच जरूर कर लें,

एजेंट का रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट: सुनिश्चित करें कि टूर ऑपरेटर भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय या नेपाल टूरिज्म बोर्ड से मान्यता प्राप्त हो.

चाइनीज ग्रुप वीजा इनविटेशन लेटर: क्या चीन के तिब्बत फॉरेन अफेयर्स ऑफिस (TMA) ने उस बैच के लिए आधिकारिक इनविटेशन जारी किया है? इसकी कॉपी मांगें.

लिखित रिफंड और कैंसिलेशन पॉलिसी: अगर चीन वीजा नहीं देता या यात्रा रद्द होती है, तो कितने पैसे वापस मिलेंगे, ये स्टांप पेपर पर लिखित में होना चाहिए.

मेडिकल फिटनेस और इंश्योरेंस: नेपाल के रास्ते यात्रा में हाई एल्टीट्यूड सिकनेस का खतरा होता है. ऐसा इंश्योरेंस लें जो सिमिकोट या हिल्सा से मेडिकल इवैक्युएशन (हेलीकॉप्टर रेस्क्यू) को कवर करता हो.

नेपाल एंट्री और स्टे परमिट: ऑपरेटर से नेपालगंज और सिमिकोट में ठहरने और डोमेस्टिक फ्लाइट्स की कन्फर्म बुकिंग का प्रूफ मांगें.

फिलहाल जो कैलाश मानसरोवर तीर्थयात्री फंसे हैं, वो इसी वैकल्पिक रूट पर फंसे हैं. आकाशवाणी के मुताबिक पारंपरिक नाथू ला रूट से 41 तीर्थयात्री चीन सीमा में प्रवेश कर चुके हैं. 

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वीडियो: मानसरोवर यात्रा पर नेपाल ने जताया विरोध, भारत ने क्या जवाब दिया?

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