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उत्तर भारत में जून की तपिश के बीच अचानक क्यों आया चक्रवाती तूफान? 13 का डाटा बदला, 15 सूबों पर आफत

IMD Issues Orange Alert: जून के महीने में भीषण लू (Heatwave) की जगह आखिर क्यों चल रहा है आंधी-बारिश का ये 'चक्रवातीय खेल'? कैसे पिछले 13 साल में भारत में गर्मी के दिन दोगुने हो गए हैं और मौसम का ये बदलता मिजाज? आपकी खेती और बजट को कैसे प्रभावित कर रहा है.

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क्लाइमेट चेंज का डरावना पैटर्न (फोटो- PTI)

पल में तोल, पल में माशा... कुदरत ने लगता है इन दिनों इस मुहावरे का प्रैक्टिकल यूज़ करना शुरू कर दिया है. तभी तो जून के पहले हफ्ते में, जहां कुछ दिन झुलसाने वाली गर्मी और लू (Heatwave) के थपेड़े पड़ते हैं. वहीं दो-तीन दिन जमकर आंधी-बारिश और हवा के ठंडे झोंकों से लोगों का सामना हो रहा है. In short, करण जौहर की फिल्मों की तरह "हर घड़ी बदल रहा है रूप" ये मौसम.

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वरना आमतौर पर जून के पहले और दूसरे हफ्ते में नॉर्थ इंडिया के सारे इलाके भयंकर वाली गर्मी और तबाही मचाने वाले लू के लपेटे में रहते हैं. सूरज चाचू का पारा इतना चढ़ा रहता है कि 45 डिग्री से लेकर 48 डिग्री के नीचे उतरने का नाम नहीं लेता. आउटडोर तो छोड़िए, घरों के अंदर भी लोग एसी-कूलर के आगे से हटने को तैयार नहीं होते. कम से कम अपनी मर्जी से तो बिल्कुल नहीं.

लेकिन अबकी बार मौसम ने तमाम वेदर एक्सपर्ट्स और थ्यौरी की ऐसी-तैसी करते हुए 360 डिग्री पलटी मार ली है. हालांकि दल बदलने में अब भी मौसम का नंबर दूसरा है. (क्योंकि पहले नंबर पर तो TMC के बागी विधायक और सांसद ही हैं.) मगर मौसम के इस डिंग-डॉन्ग ने पूरा सिस्टम उलट-पुलट दिया है.

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भारतीय मौसम विभाग यानी IMD ने देश के 15 से ज्यादा राज्यों में ओलावृष्टि और भारी बारिश के साथ तेज आंधी का 'ऑरेंज अलर्ट' जारी कर दिया है. धूल भरी हवाओं की रफ्तार ऐसी कि मानो हवा ओलम्पिक रेस की तैयारी कर रही हो. बोले तो 90 से 100 किलोमीटर प्रतिघंटा.  ऐसा लगता है कि कोई छोटा मोटा चक्रवात (Cyclone) ही आ गया हो.

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गर्मी में बरसात क्यों? (फोटो-PTI)

ऐसे में ये सवाल तो बनता ही है कि गुरु आखिर ऐसा भी क्या हो गया है, जो जून में महीने में आसमान से आग नहीं बरस रहा बल्कि आंधी-तूफान और बरसात वाला फुल-टू माहौल बन रहा है. अब सवाल उठा है तो किसी ना किसी को उसका जवाब भी खोजना पड़ेगा. तो क्यों ना हम और आप ही मिलकर जवाब खोजते हैं.

तो आइये इस क्लाइमेट चेंज के पीछे छिपे साइंस को समझते हैं और साथ ही इसके इकोनॉमिक्स यानी हमारी-आपकी जेब पर पड़ने वाले पॉसिबल असर की भी पड़ताल करते हैं.  

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जून का जूनून और ये अचानक वाली आंधी-बारिश

मौसम वैज्ञानिकों की माने तो वेदर की इस अजीबोगरीब हरकत के पीछे कोई मैजिक नहीं बल्कि साइंस है. दो बेहद ताकतवर मौसमी सिस्टम का एक साथ एक्टिव हो जाना. मानो स्पाइडरमैन और सुपरमैन ने एक साथ कहीं पर धावा बोल दिया हो. बात अब चल ही निकली है तो चलिए इन दोनों पावरफुल वेदर सिस्टम से भी रूबरू हो लेते हैं.

1. बैक-टू-बैक वेस्टर्न डिस्टर्बेंस (पश्चिमी विक्षोभ): अब आप कहेंगे कि ये नाम तो हम ना जाने कितने सालों से सुनते चले आ रहे हैं. फिर इस बार ऐसा क्या नया हो गया? तो नया ये है कि आमतौर पर भूमध्य सागर (Mediterranean Sea) से उठने वाली ये ठंडी हवाएं सर्दियों में भारत में बर्फबारी और बारिश लाती हैं. लेकिन इस बार जून में भी एक के बाद एक बेहद सक्रिय वेस्टर्न डिस्टर्बेंस ने नॉर्थ इंडिया में दस्तक दे दी है.

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मौसम का बदलता ट्रेंड (फोटो- IMD)

2. लोकल चक्रवातीय परिसंचरण (Cyclonic Circulation): राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के ऊपर हवा के कम दबाव का क्षेत्र (Low-Pressure Area) बना हुआ है. जब अरब सागर से आने वाली नमी और इन दोनों सिस्टम्स का मिलन होता है, तो मौसम एकदम से आग-बबूला हो जाता है. नतीजा नब्बे किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से आंधी के साथ-साथ भारी बारिश शुरू हो जाती है.

बड़ा विरोधाभास: 13 साल में दोगुने हुए गर्मी के दिन

अब आप सोच रहे होंगे कि गुरु, अगर चारों तरफ आंधी-बारिश हो रही है, तो फिर ग्लोबल वॉर्मिंग और बढ़ते तापमान का रोना क्यों रोया जा रहा है? यहीं पर छिपा है मौसम का सबसे खतरनाक वाला विरोधाभास बोले तो contradiction.

एक तरफ जहां जून के कुछ दिन हमें ठंडे मिल रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ भारत में सालाना 'हीटवेव' यानी जानलेवा लू के दिनों की संख्या में डराने वाली बढ़ोतरी हुई है. आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले 13 वर्षों में भारत में भीषण गर्मी वाले दिनों की संख्या लगभग दोगुनी हो चुकी है,

साल 2013 के आसपास: देश में एक साल के भीतर औसतन करीब 100 दिन ऐसे होते थे, जिन्हें हीटवेव या अत्यधिक गर्म दिनों की श्रेणी में रखा जाता था. इसमें अलग-अलग राज्यों के अलग-अलग महीने शामिल थे.

अब वर्तमान (दशक का ट्रेंड): ये आंकड़ा बढ़कर औसतन 200 दिन के पार पहुंच चुका है. यानी साल के आधे से ज्यादा समय भारत का कोई ना कोई हिस्सा असामान्य रूप से तप रहा होता है.

जलवायु परिवर्तन (Climate Change), बिना सोचे समझे किया जा रहा शहरीकरण (Urbanization) और कंक्रीट के जंगलों जैसी ऊंची-ऊंची इमारतों (Urban Heat Islands) ने मिलकर धरती के पारा इस कदर बढ़ा दिया है कि मौसम का पूरा बैलेंस ही बिगड़ गया है और वो भी गंदा वाला.  

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हीट वेव के दिन भी बढ़ रहे हैं (फोटो- PTI)

खेती और अर्थव्यवस्था का बिगड़ा गणित: भारत के कृषि कैलेंडर पर चोट

मौसम का ये चक्रवातीय खेल सिर्फ रील्स बनाने या चाय-पकोड़े खाने तक सीमित नहीं है, बल्कि ये भारत के ग्रामीण अर्थशास्त्र और कृषि कैलेंडर को पूरी तरह तहस-नहस कर रहा है.

खरीफ फसलों पर संकट: जून का महीना किसानों के लिए धान, मक्का, बाजरा और कपास जैसी खरीफ फसलों की बुवाई का समय होता है. इसके लिए किसान मानसून की रेगुलर बारिश का इंतजार करते हैं. लेकिन अनियंत्रित प्री-मानसून आंधी और ओलावृष्टि से खेतों में तैयार खड़ी अन्य फसलें और सब्जियों के बाग पूरी तरह बर्बाद हो रहे हैं.

सप्लाई चेन का टूटना: अचानक आने वाले इन तूफानों से आम, लीची जैसे मौसमी फलों को भारी नुकसान पहुंचता है, जिससे मंडियों में आवक कम हो जाती है और खुदरा बाजार में कीमतें आसमान छूने लगती हैं.

बदलते मौसम का पूरा गणित

नीचे दिए गए ब्रेकअप से समझिए कि हमारे मौसम में पिछले कुछ सालों में कितना बड़ा और खतरनाक शिफ्ट आया है,

Climate Shift Report

भारत का बदलता मौसमी कैलेंडर

13 साल में किस तरह बदला मौसम का पूरा मिजाज

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गर्मी के दिनों में दोगुनी बढ़ोतरी

साल 2013 के आसपास जहां देश में सालाना औसतन 100 दिन भीषण गर्मी वाले होते थे, वह आंकड़ा अब बढ़कर 200 दिन के पार जा चुका है.

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जून का चक्रवातीय मिजाज

पारंपरिक रूप से शुष्क और अत्यधिक गर्म रहने वाले जून के शुरुआती हफ्तों में अब सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ के कारण 90 किमी/घंटा की रफ्तार से आंधियां चल रही हैं.

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कृषि कैलेंडर पर सीधा संकट

इस अनियंत्रित और बेमौसम प्री-मानसून चक्रवातीय गतिविधि से खरीफ फसलों (धान, कपास, मक्का) की बुवाई का पारंपरिक चक्र और सप्लाई चेन पूरी तरह प्रभावित हो रही है.

*भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और वैश्विक जलवायु परिवर्तन रुझानों के आधिकारिक आंकड़ों पर आधारित. AI की मदद से तैयार ग्राफिक्स

क्या है आगे का रास्ता?

गुरु, कहानी का सीधा और साफ निचोड़ ये है कि प्रकृति अब हमें लगातार वॉर्निंग सिग्नल्स दे रही है. जून के महीने में कभी 48 डिग्री की भयंकर गर्मी पड़ना और अगले ही दिन चक्रवात जैसी आंधी आना, इस बात का पुख्ता सबूत है कि 'क्लाइमेट चेंज' अब भविष्य की बात नहीं, बल्कि हमारे वर्तमान की कड़वी हकीकत बन चुका है.

जब तक हम शहरीकरण के ढर्रे को नहीं सुधारेंगे, हरियाली को वापस जगह नहीं देंगे और कार्बन उत्सर्जन पर लगाम नहीं लगाएंगे, तब तक मौसम का ये चक्रवातीय खेल हमारी जेब, सेहत और खेती को इसी तरह हिलाता रहेगा.

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अब एक सवाल आपके लिए: क्या आपने भी इस बार जून के महीने में अपने शहर के मौसम में ये अजीबोगरीब बदलाव महसूस किया है? नीचे कमेंट बॉक्स में अपने शहर के हाल के साथ अपनी राय जरूर साझा करें!
 

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