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होममेकर नहीं नेशन बिल्डर कहना चाहिए, इनका योगदान पैसों से नहीं आंका जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

Supreme Court ने हाउसवाइफ के काम पर अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि गृहणियों का जीवन कीमती होता है. उनके काम को कमतर करके नहीं आंका जा सकता है. सड़क हादसे में महिला की मौत मामले में कोर्ट ने अतिरिक्त मुआवजे का आदेश दिया.

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उन्हें हाउसवाइफ के बजाय 'राष्ट्र निर्माता' कहा जाना चाहिए. (सांकेतिक फोटो: AI)

सुप्रीम कोर्ट ने गृहणियों के जीवन और उनके समाज और देश के लिए योगदान पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है. कोर्ट ने एक हाउसवाइफ के काम की न्यूनतम कीमत 30,000 रुपये प्रति माह मानी है. अदालत ने एक हादसे में पत्नी की मौत के बाद उसके पति को अतिरिक्त मुआवजा देने का फैसला सुनाया. कोर्ट ने कहा कि अगर सड़क दुर्घटना में किसी व्यक्ति की पत्नी की मृत्यु हो जाती है या वह गंभीर रूप से घायल हो जाती है, तो बीमा कंपनी या जिम्मेदार पक्ष को उसके 'कमाऊ न होने' का बहाना बनाकर कम मुआवजा देने की अनुमति नहीं होगी.

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सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने गुरुवार, 11 जून को यह फैसला सुनाया. अदालत ने मोटर व्हीकल एक्ट (MV एक्ट) के तहत दावों में पत्नी की घरेलू सेवाओं के नुकसान को मुआवजे का एक अलग आधार माना.

सुप्रीम कोर्ट ने हाउसवाइफ के घरेलू काम की न्यूनतम कीमत 30,000 रुपये प्रति माह निर्धारित की है. यानी एक गृहिणी के घर के काम की वैल्यू निकाली जाए तो उसकी अनुमानित आय 30 हजार रुपए प्रतिमाह बनती है. बेंच ने कहा कि अब मोटर दुर्घटना दावों में मुआवजे की गणना करते समय इसे आधार माना जाएगा. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा,

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“हमारा भी यही मानना ​​है कि हाउसवाइफ इंसान और राष्ट्र के विकास में योगदान देती है. आप उस योगदान को पैसे के रूप में कैसे आंकेंगे? हमने घर की देखभाल नहीं हो पाने से होने वाले नुकसान की मासिक कीमत 30,000 रुपये तय की है.”

अदालत ने कहा कि उन्हें 'होममेकर' (घर संभालने वाली) कहने के बजाय नेशन बिल्डर 'राष्ट्र निर्माता' कहा जाना चाहिए. बेंच ने इस बात पर भी जोर दिया कि घर में महिला के काम का असर घर की चारदीवारी से कहीं आगे तक जाता है.

हाई कोर्ट को दिए निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों को निर्देश दिया कि वे मोटर दुर्घटना मुआवजे के मामलों पर नजर रखें ताकि उनका समय पर निपटारा हो सके. कोर्ट ने कहा कि मोटर वाहन अधिनियम की धारा 169 के तहत बताई गई ‘संक्षिप्त प्रक्रिया’ का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए ताकि पीड़ितों और उनके परिवारों को लंबी कानूनी लड़ाइयों का सामना न करना पड़े.

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किस मामले में सुनाया फैसला?

सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के 2024 के एक फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर यह फैसला सुनाया. यह मामला 2001 में दो जीपों के बीच हुई सड़क दुर्घटना से जुड़ा था, जिसमें एक महिला की मौत हो गई थी. हाई कोर्ट ने मृतका के परिवार को 8 लाख रुपये से ज्यादा का मुआवजा देने का आदेश दिया था. इसके बाद मृतका के परिवार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और हाई कोर्ट के फैसले को यह कहते हुए चुनौती दी कि हाई कोर्ट द्वारा तय किया गया 8 लाख रुपये का मुआवजा बहुत कम था. 

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