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CJP Protest: BNS 223 लागू, उल्लंघन करने पर जेल या कितना जुर्माना लगेगा? हर डिटेल जानें

CJP Protest: नई दिल्ली जिले में BNSS की धारा 163 (पहले धारा 144 CrPC) लागू कर दी गई है. इसके तहत कौन सी पाबंदियां लागू होती हैं और सजा के क्या प्रावधान हैं? इन सारे सवालों के जवाब जानें यहां.

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CJP ने संसद मार्च निकालने का ऐलान किया है. (PTI)

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  • सोशल एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक की अपील पर 20 जुलाई को कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा संसद तक 'चलो संसद' मार्च निकालने की योजना बनाई गई है, जो संसद के मानसून सत्र के साथ मेल खाती है।
  • नई दिल्ली जिले में BNSS की धारा 188 और 223 के तहत सार्वजनिक जगहों पर पांच या अधिक लोगों के इकट्ठा होने पर रोक लगी है, जिसके उल्लंघन पर पुलिस कानूनी कार्रवाई कर सकती है।
  • दिल्ली पुलिस ने मार्च के दौरान सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के लिए अतिरिक्त जवान तैनात किए हैं, और उल्लंघन करने वालों के खिलाफ BNSS 223 के तहत जेल या जुर्माने की कार्रवाई हो सकती है।

सोशल एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक की अपील पर जंतर-मंतर पर लोगों का जुटना शुरू हो गया है. कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) तय प्लान के मुताबिक, 20 जुलाई को संसद तक 'चलो संसद' मार्च निकालने की तैयारी में हैं. दिल्ली पुलिस भी मुस्तैद है. इसी दिन संसद का मानसून सत्र शुरू है. ऐसे में सुरक्षा व्यवस्था कायम रखना पुलिस के लिए बड़ी चुनौती है. नई दिल्ली जिले में BNSS की धारा 188 लागू है. उल्लंघन किया तो दिल्ली पुलिस BNS 223 और अन्य कानूनी प्रावधानों के तहत कार्रवाई करेगी. संसद मार्च में हिस्सा लिया, तब भी यही कार्रवाई हो सकती है. BNS 223 के तहत क्या है नियम और सजा के प्रावधान?

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BNS 223 माने भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 223. इसके तहत उन लोगों पर कार्रवाई होती है, जो किसी लोक सेवक (पुलिस अधिकारी या सरकारी अधिकारी) के जारी कानूनी आदेश को नहीं मानता. उसकी नाफरमानी करता है. उसे मानने से इनकार कर देता है.

BNS 223: जमानत का प्रावधान

BNS की धारा 223 और इसके जमानत के प्रावधान पर दी लल्लनटॉप ने सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट अरविंद मणियम. के. से बात की. उन्होंने बताया कि BNS 223 एक जमानती अपराध (Bailable Offence) है. माने, इसमें आरोपी को पुलिस स्टेशन या मजिस्ट्रेट के सामने कानूनी प्रावधानों के साथ बेल मिल सकती है.

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उन्होंने आगे कहा कि मामले में यह भी देखा जाता है कि BNS 223 के अलावा कोई गैर-जमानती अपराध (Non-Bailable Offence) से जुड़ी धाराएं ना लगी हों. ऐसे में जमानत की प्रक्रिया बदल जाती है. इसलिए जमानत का मामला केस दर केस पर निर्भर करता है.

एडवोकेट अर्विंद मणियम. के. ने यह भी साफ किया कि सिर्फ पीसफुल प्रोटेस्ट करना अपने आप में BNS 223 का उल्लंघन नहीं है. सवाल ये होता है कि क्या कानूनी तौर पर जारी कोई आदेश था और क्या उसका जान-बूझकर उल्लंघन हुआ?

दिल्ली पुलिस ने क्या कहा?

दिल्ली पुलिस ने 19 जुलाई को X पर एक पोस्ट में लिखा,

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"नई दिल्ली जिले में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 163 (पहले धारा 144 CrPC) के तहत रोक लगी हुई है. इसलिए, जंतर-मंतर पर तय प्रोटेस्ट साइट को छोड़कर, प्रोटेस्ट मार्च, जुलूस, प्रदर्शन और पांच या उससे ज्यादा लोगों के इकट्ठा होने पर पूरी तरह से रोक है."

Delhi Police BNS 223
दिल्ली पुलिस का पोस्ट. (X)

आगे दिल्ली पुलिस ने लिखा,

"इन रोक लगाने वाले ऑर्डर को तोड़ने वाला कोई भी व्यक्ति BNS की धारा 223 और कानून के दूसरे लागू नियमों के तहत केस का सामना कर सकता है."

दिल्ली पुलिस ने लोगों से सरकारी आदेश और कानून का सम्मान करने की अपील की. अगर आदेश नहीं माना और पुलिसिया कार्रवाई हो गई, तो कितनी सजा मिलेगी?

BNS 223: कितन सजा?

1. आम उल्लंघन - BNS 223(a)

अगर किसी सरकारी अधिकारी के आदेश को ना मानने से किसी व्यक्ति को रुकावट, परेशानी या कोई नुकसान पहुंचता है, तो इस धारा का उल्लंघन करने वाले को छह महीने तक की साधारण जेल या 2,500 रुपये तक का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं.

2. सीरियस खतरा या हिंसा - BNS 223(b)

अगर सरकारी आदेश ना मानने से इंसानी जान, सेहत या सुरक्षा को खतरा होता है, या दंगा भड़कने की संभावना होती है, तो नियम तोड़ने वाले को एक साल तक की जेल या 5,000 रुपये तक का जुर्माना, या दोनों हो सकते हैं.

यह भी पढ़ें: मेट्रो स्टेशन बंद, 5 हजार जवान तैनात, CJP के मार्च को लेकर दिल्ली पुलिस का एक्शन प्लान

एक बात और समझिए. जरूरी नहीं है कि आदेश का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति का इरादा किसी को नुकसान पहुंचाने का ही हो या वह यह सोचता हो कि उसके आदेश ना मानने से नुकसान हो सकता है. अगर उल्लंघन करने वाले को उस आदेश की जानकारी हो, जिसका वह जान-बूझकर पालन ना करे तो भी यह अपराध माना जाएगा.  आदेश के उल्लंघन से नुकसान हो जाए या नुकसान होने की संभावना हो, तब भी प्रावधान लागू होंगे.

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