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जनवरी की नाकाम लॉन्चिंग के बाद 7 महीने तक ISRO ने रॉकेट क्यों नहीं उड़ाया? 4 सितंबर को क्या होने वाला है

जनवरी 2026 में PSLV-C62/EOS-N1 मिशन की नाकामी के बाद ISRO 4 सितंबर को EOS-05 को GSLV-F17 से लॉन्च करने जा रहा है. समझिए PSLV-C61 और C62 की failures के बाद क्या जांच हुई, सात महीने का launch gap क्यों आया? EOS-05 क्या काम करेगा? इस मिशन की सफलता भारत के space programme के लिए क्यों अहम है.

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7 महीने बाद इसरो लगाने जा रहा नई छलांग (फोटो- ISRO/AI)

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  • ISRO 4 सितंबर 2026 को सुबह 2:55 बजे GSLV-F17 रॉकेट से EOS-05 उपग्रह को उप-भूस्थिर स्थानांतरण कक्षा में लॉन्च करेगा, जो GSLV की 19वीं उड़ान होगी।
  • जनवरी 2026 में PSLV-C62 मिशन में तीसरे चरण में खराबी आई थी, जिसके कारण करीब सात महीने तक ISRO ने किसी भी ऑर्बिटल लॉन्च को निलंबित रखा था।
  • इस लॉन्च के सफल होने से ISRO के ऑपरेशनल विश्वास को पुनःस्थापित करने में मदद मिलेगी और भविष्य के मिशनों के लिए निरंतरता बनी रहेगी।

ISRO 4 सितंबर को EOS-05 को GSLV-F17 से लॉन्च करने जा रहा है. जनवरी की PSLV-C62 विफलता के बाद ये लॉन्चिंग करीब सात महीने के operational gap को खत्म करेगी. लेकिन कहानी सिर्फ जनवरी की नाकाम उड़ान की नहीं है. इसके पीछे PSLV की लगातार दो नाकामियां, उनकी जांच और फिर लॉन्च सिस्टम को दोबारा भरोसे के साथ तैयार करने की पूरी प्रक्रिया है.

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1 सितंबर की सुबह मीडिया ने रिपोर्ट किया कि ISRO 4 सितंबर 2026 को सुबह 2:55 बजे श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से EOS-05 को GSLV-F17 के जरिए लॉन्च करेगा. ISRO ने भी 29 अगस्त को GSLV-F17/EOS-05 मिशन की आधिकारिक जानकारी जारी की है. इसके मुताबिक GSLV-F17, GSLV की 19वीं flight होगी और EOS-05 को ‘उप-भूस्थिर स्थानांतरण कक्षा’ (Sub-Geosynchronous Transfer Orbit) यानी Sub-GTO में पहुंचाएगी.

ISRO के लॉन्च रिकॉर्ड को देखें तो आखिरी ऑर्बिटल लॉन्च 12 जनवरी 2026 को PSLV-C62/EOS-N1 मिशन था. इसके बाद 4 सितंबर की EOS-05 उड़ान होने जा रही है. यानी कैलेंडर पर करीब आठ महीने का अंतर और सामान्य भाषा में करीब सात महीने तक launch hiatus यानी लॉन्च में रुकावट.

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जनवरी में PSLV-C62 के साथ क्या हुआ था?

12 जनवरी 2026 को PSLV-C62 को EOS-N1 और दूसरे उपग्रहों (satellites) के साथ उड़ना था. ISRO के मुताबिक मिशन के दौरान PS3 यानी PSLV के तीसरे चरण के अंत में एक ‘खामी’ (anomaly) सामने आई. इसके बाद सैटेलाइट को उसकी तय ऑर्बिट में इंजेक्ट नहीं किया जा सका. ISRO ने उसी समय कहा था कि मामले का गहन विश्लेषण (detailed analysis) शुरू किया गया है.

यहां खामी का मतलब सीधे तौर पर ये नहीं होता कि रॉकेट फट गया या पूरा सिस्टम एक ही पल में खत्म हो गया. स्पेस मिशन में खामी का मतलब किसी सब सिस्टम या फ्लाइट सिक्वेंस का तय पैरामीटर के मुताबिक परफॉर्म नहीं करना भी हो सकता है. PSLV-C62 के मामले में ISRO ने सार्वजनिक रूप से इतना बताया कि खामी PS3 स्टेज के अंत में हुई थी. नाकामी के विश्लेषण (Failure analysis) की पूरी रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है.

जनवरी की नाकामी को दोष देना गलत क्यों होगा?

कहानी में एक और महत्वपूर्ण तारीख है 18 मई 2025. उस दिन PSLV-C61/EOS-09 मिशन भी सफल नहीं हुआ था. ISRO की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक व्हीकल का प्रदर्शन दूसरे स्टेज तक सामान्य था, लेकिन तीसरे चरण के ठोस मोटर (third stage solid motor) के काम करने के दौरान खामी आई और मिशन पूरा नहीं हो पाया. इसके बाद नेशनल लेवल कमिटी बनाई गई थी. कमिटी की सिफारिशों के आधार पर PSLV के तीसरे चरण के HPS3 मोटर का संशोधित डिजाइन (modified design) तैयार किया गया. अक्टूबर और नवंबर 2025 में उसके दो स्टैटिक टेस्ट सफलतापूर्वक किए गए.

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फिर जनवरी 2026 में PSLV-C62 में दूसरी खामी आ गई. 25 फरवरी को ISRO ने बताया कि PSLV व्हीकल की खामियों के कारणों की समीक्षा के लिए नेशनल लेवल एक्सपर्ट कमिटी गठित की गई है. इसलिए सात महीने का गैप सिर्फ एक नाकामी के बाद लगाया गया ब्रेक नहीं, बल्कि लगातार हुई तकनीकी समस्याओं के बाद भरोसे और जांच को लेकर अपनाई गई सावधानी के कॉन्टेस्ट में देखना ज्यादा सही है.

अब EOS-05 क्या है?

4 सितंबर का सैटेलाइट EOS-05 कोई सामान्य संचार उपग्रह (communication satellite) नहीं है. ISRO के मुताबिक ये स्टेट ऑफ आर्ट अर्थ ऑबजर्वेशन स्पेसक्राफ्ट है और भारत का पहला तस्वीरें खींचने वाला उपग्रह (imaging satellite) है जिसे भूसमकालिक कक्षा (Geosynchronous orbit) से फोटो खिंचने के लिए तैयार किया गया है. GSLV-F17 इसे Sub-GTO में पहुंचाएगा. मिशन का पेलोड करीब 2,367 किलोग्राम है.

अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट (Earth Observation Satellite) का काम जमीन की तस्वीरें लेने भर तक सीमित नहीं होता. इनके जरिए खेती, जल संसाधन, अर्बन प्लानिंग, जंगल, पर्यावरण, खनिज संसाधन और आपदा प्रबंधन जैसे कामों के लिए data हासिल किया जाता है. बाढ़, जंगल की आग और लैंडस्लाइड जैसी घटनाओं की मॉनिटरिंग में भी सैटेलाइट इमेजरी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.

PSLV की जगह GSLV ही क्यों?

यहीं इस लॉन्च की टेक्निकल कहानी और दिलचस्प हो जाती है. PSLV को ISRO की भरोसेमंद मशीन (workhorse) कहा जाता है और इसका इस्तेमाल अर्थ ऑब्जर्वेसन, नेविगेशन और कई दूसरे मिशन के लिए होता रहा है. GSLV का डिजाइन ज्यादा भारी सैटेलाइट को ऊंची ऑर्बिट तक पहुंचाने के लिए किया गया है और इसमें ‘स्वदेशी क्रायोजेनिक उच्च चरण’ (indigenous cryogenic upper stage) इस्तेमाल होता है.

GSLV-F17 तीन स्टेज वाला रॉकेट है. इसमें पहले स्टेज में सॉलिड कोर और चार लिक्विड स्ट्रैपऑन (liquid strap-ons) हैं, दूसरे चरण में लिक्विड प्रप्लशन (liquid propulsion) और तीसरे स्टेज में क्रायोजेनिक (cryogenic) CUS15 है. क्रायोजेनिक स्टेज में लिक्विड हाइड्रोजन और लिक्विड ऑक्सिजन का इस्तेमाल होता है. ये तकनीक ज्यादा प्रभावी होती है. लेकिन बेहद कम तापमान पर प्रपोलेंट्स को संभालने की वजह से तकनीकी दिक्कतें भी काफी ज्यादा होती है.

सबसे बड़ी तकनीकी चुनौती क्या होगी?

4 सितंबर की उड़ान में सिर्फ रॉकेट को आसमान में पहुंचाना मकसद नहीं है. असली काम EOS-05 को बेहद सटीक trajectory पर डालना है. ISRO के मिशन ब्रोसर के मुताबिक सैटेलाइट को करीब 170 किलोमीटर की सबसे नजदीकी (perigee) और 28,934 किलोमीटर सबसे दूर (apogee) वाली sub-GTO में पहुंचाने का लक्ष्य है. यानी लॉन्च व्हीकल को सिर्फ ताकत नहीं, बेहद सटीक गाइडेंस और ऑर्बिटल इंजेक्शन भी देना होगा.

और यही वजह है कि जनवरी की नाकामी के बाद ये मिशन सिर्फ एक सैटेलाइट लॉन्च नहीं माना जाएगा. अगर GSLV-F17 और EOS-05 मिशन सफल रहता है तो ये ISRO के लिए ऑपरेशनल कॉन्फिडेंस का भी बड़ा संकेत होगा.

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सात महीने बाद ये launch इतना अहम क्यों है?

ISRO के लिए सबसे बड़ी बात ये होगी कि जनवरी के बाद ‘ऑर्बिटल लॉन्च क्रम’ (orbital launch sequence) फिर शुरू होगा. इससे आगे के मिशन के लिए भी मोमेंटम बनेगा. स्पेस प्रोग्राम सिर्फ एक रॉकेट और एक सैटेलाइट का खेल नहीं है. लगातार लॉन्च से लॉन्च व्हीकल, ग्राउंड सिस्टम, टीम और मिशन ऑपरेशन की ऑपरेशनल रिद्म बनी रहती है.

आगे ISRO का फोकस अर्थ ऑब्जर्वेशन और कम्युकेशन सैटेलाइट्स के साथ गगनयान (Gaganyaan) जैसे बड़े प्रोग्राम पर भी है. गगनयान के लिए 'बिना चालक दल वाले शुरुआती मिशन' (uncrewed precursor missions) की योजना है और 2026 में क्यूर मॉड्यूल और पैराशूट सिस्टम (parachute system) के कई क्वालिफिकेशन टेस्ट भी हुए हैं. चंद्रयान-4 (Chandrayaan-4) की प्लानिंग भी आगे की बड़ी स्पेस मिशन में शामिल है, जिसका लक्ष्य लूनर सैंपल को पृथ्वी पर वापस लाना है.

इसलिए 4 सितंबर की सुबह 2:55 बजे होने वाली EOS-05 लॉन्च को सिर्फ एक और ISRO लॉन्च की तरह देखना थोड़ा कम होगा. जनवरी की नाकामी के बाद ये सवाल भी इसके साथ उड़ रहा होगा कि क्या ISRO ने टेक्निकल सेटबैक से जरूरी सबक ले लिए हैं और क्या उसका लॉन्च प्रोग्राम फिर उसी भरोसे के साथ आगे बढ़ने के लिए तैयार है. इसका जवाब रॉकेट के उड़ने के बाद ही मिलेगा.
 

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