भारत को चांद तक पहुंचाने और दुनिया की बड़ी अंतरिक्ष ताकतों में खड़ा करने वाली ISRO इस बार किसी मिशन की वजह से नहीं, बल्कि अपने ही वैज्ञानिकों के इस्तीफों को लेकर चर्चा में है. पिछले कुछ महीनों में बड़ी संख्या में वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों के संगठन छोड़ने की खबरों ने सरकार की चिंता बढ़ा दी. इसके बाद डिपार्टमेंट ऑफ स्पेस (DoS) को नया आदेश जारी करना पड़ा. आखिर ISRO से वैज्ञानिक क्यों इस्तीफा दे रहे हैं? क्या इसकी वजह बेहतर नौकरी, ज्यादा सैलरी है या फिर कोई और कहानी?
ISRO में इस्तीफों की सुनामी, सरकारी 'ब्रेक' और मिशन गगनयान पर मंडराता खतरा, क्या है पूरा माजरा?
ISRO Scientist Resignations: ISRO से वैज्ञानिकों के इस्तीफे के बाद सरकार ने सख्त कदम उठाए हैं. जानिए गगनयान मिशन और अन्य महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर इसका क्या असर पड़ेगा.


क्या हुआ है ISRO में?
ISRO के भीतर पिछले कुछ महीनों से एक ऐसा ट्रेंड देखने को मिला है, जिसने सरकार की भी चिंता बढ़ा दी. देश के कई बड़े स्पेस सेंटरों से वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों के लगातार इस्तीफे और वॉलंटरी रिटायरमेंट (VRS) सामने आए हैं. टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, अब तक 100 से 120 वैज्ञानिक संगठन छोड़ चुके हैं. इनमें अकेले यूआर राव सैटेलाइट सेंटर (URSC) से करीब 80 और विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर (VSSC) से कम से कम 20 वैज्ञानिक शामिल हैं. सबसे अहम बात यह है कि इनमें कई ऐसे विशेषज्ञ भी हैं, जो गगनयान जैसे भारत के सबसे महत्वाकांक्षी मानव अंतरिक्ष मिशन पर काम कर रहे थे. यही वजह है कि इन इस्तीफों ने ISRO और सरकार, दोनों की चिंता बढ़ा दी है.
सरकार का नया फरमान: अब ISRO में इस्तीफा देना आसान नहीं
लगातार बढ़ते इस्तीफों के बीच डिपार्टमेंट ऑफ स्पेस (DoS) ने 14 जुलाई को एक नया इंटरनल मेमोरेंडम जारी किया. इसके तहत गगनयान और दूसरे अहम स्पेस मिशनों से जुड़े 'ग्रुप ए' वैज्ञानिकों के इस्तीफे या VRS को अब सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं माना जाएगा. वियॉन की रिपोर्ट के अनुसार, अब किसी सेंटर डायरेक्टर के पास अकेले इस्तीफा मंजूर करने का अधिकार नहीं होगा. हर आवेदन सीधे डिपार्टमेंट ऑफ स्पेस भेजा जाएगा और अंतिम फैसला वहीं लिया जाएगा. खास बात यह है कि यह व्यवस्था 2020 में लागू किए गए नियम से बिल्कुल अलग है. तब सेंटर डायरेक्टर को ऐसे मामलों में अंतिम मंजूरी देने की शक्ति दी गई थी, लेकिन अब यह अधिकार वापस केंद्र सरकार के पास चला गया है.
इस्तीफे क्यों हो रहे हैं?
अब आपके मन में सवाल आएगा कि देश की सबसे प्रतिष्ठित एजेंसी को आखिर लोग छोड़ क्यों रहे हैं? इसके पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं,
प्राइवेट स्पेस सेक्टर: भारत में प्राइवेट स्पेस स्टार्टअप्स की संख्या तेजी से बढ़ रही है. ISRO के वैज्ञानिक वहां बेहतर मौकों और पैकेज की ओर रुख कर रहे हैं..
वर्कलोड और तनाव: अंतरिक्ष मिशनों का दबाव और पिछले कुछ समय में मिले झटकों (जैसे PSLV मिशन फेलियर) ने भी वैज्ञानिकों का मनोबल प्रभावित किया है.
आंतरिक मुद्दे: खबरें हैं कि कई लोग काम से जुड़े मुद्दों और इंटरनल मैनेजमेंट से खुश नहीं हैं.
स्टाफ की कमी: संसद में दी गई जानकारी के मुताबिक, ISRO में काफी समय से स्टाफ की कमी चल रही है. वैज्ञानिक और तकनीकी डोमेन में स्वीकृत पदों के मुकाबले लोग कम हैं, जिससे काम का बोझ उन लोगों पर ज्यादा बढ़ गया है जो अभी वहां हैं.
मिशनों पर क्या असर पड़ेगा?
गगनयान मिशन भारत का पहला मानव अंतरिक्ष मिशन है. इसे लेकर प्रधानमंत्री मोदी का सपना बहुत बड़ा है. ऐसे में अगर प्रोजेक्ट के अहम लोग ही छोड़कर चले जाएंगे, तो काम की रफ्तार पर असर पड़ना लाजमी है. ISRO के पूर्व अधिकारी और एक्सपर्ट्स का मानना है कि केवल सरकारी आदेश जारी कर इस्तीफों को रोकना समाधान नहीं है, बल्कि एजेंसी को अपनी आंतरिक समस्याओं और स्टाफ की जरूरतों को गंभीरता से देखने की जरूरत है.
ISRO में इस्तीफे और चुनौती
इससे पहले कि हम इस मुद्दे पर और आगे बढ़े, एक नजर इन इस्तीफों की वजह से आने वाली चुनौतियों पर डाल लेते हैं,
| श्रेणी | स्थिति / जानकारी |
| अनुमानित इस्तीफे | 100 - 120 (पिछले कुछ महीनों में) |
| प्रभावित सेंटर | URSC और VSSC |
| सरकार का नया कदम | गगनयान वैज्ञानिकों के इस्तीफे पर सख्त रोक, DoS की मंजूरी अनिवार्य |
| मुख्य कारण | प्राइवेट सेक्टर में मौके, वर्क लोड, इंटरनल इश्यू |
| मौजूदा चुनौती | स्टाफ की भारी कमी (साइंटिफिक डोमेन में ~11.5% खाली पद) |
आगे क्या होगा?
ISRO ने अप्रैल 2026 से मार्च 2027 के बीच 13 स्पेस लॉन्च का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है. लेकिन साल 2026 में अब तक सिर्फ एक लॉन्च हो सका और वह भी सफल नहीं रहा. ऐसे में एजेंसी के सामने दोहरी चुनौती है. एक तरफ मिशनों की रफ्तार फिर से पटरी पर लानी है, तो दूसरी तरफ उन वैज्ञानिकों का भरोसा बनाए रखना है, जिनके दम पर भारत ने चांद से लेकर अंतरिक्ष तक अपनी पहचान बनाई. अब सबकी नजर इस बात पर रहेगी कि सरकार का नया नियम अनुभवी वैज्ञानिकों के पलायन पर रोक लगा पाता है या नहीं.
कहानी का सबसे बड़ा सबक यही है कि किसी भी स्पेस एजेंसी की असली ताकत सिर्फ उसके रॉकेट, सैटेलाइट या लॉन्च पैड नहीं होते, बल्कि उन्हें बनाने वाले वैज्ञानिक और इंजीनियर होते हैं. अगर यही लोग लगातार संगठन छोड़ने लगें, तो असर सिर्फ एक संस्थान पर नहीं, बल्कि देश के भविष्य के अंतरिक्ष मिशनों पर भी पड़ सकता है. इसलिए ISRO के सामने इस वक्त सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ नए मिशन लॉन्च करना नहीं, बल्कि अपनी सबसे कीमती पूंजी, यानी अपने वैज्ञानिकों का भरोसा और मनोबल बनाए रखना भी है.
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