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ट्रेन में आधी सीटें खाली, फिर भी ऐप पर 'नो-रूम'? जानिए टीटीई के टैबलेट का असली खेल!

Indian Railways: गर्मियों की छुट्टियों में ट्रेन के भीतर सीटें खाली दिखने के बावजूद आईआरसीटीसी ऐप पर 'नो-रूम' क्यों दिखाता है? समझिए टीटीई के 'हैंडहेल्ड टर्मिनल्स' (HPT टैबलेट) को जानबूझकर ऑफलाइन करने का वो पूरा खेल, जिस पर अब रेलवे बोर्ड के विजिलेंस विंग ने कड़ा एक्शन शुरू कर दिया है.

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समर सीजन में खाली सीटों की ब्लैक-मार्केटिंग पर आई बड़ी रिपोर्ट (फोटो- PTI)

चुभती जलती गर्मी का मौसम और उस पर छुट्टियों का वक्त. किसी को फैमिली के साथ हिल स्टेशन जाना है तो कोई नाना-नानी, दादा-दादी के घर जाने को बेताब है. ऐसी आपा-धापी में अगर कंफर्म टिकट मिल गया तो फिर कहना ही क्या. मगर रिजर्वेशन कंफर्म नहीं है और आप सिर्फ वेटिंग टिकट पर ट्रेन में जा बैठे हैं, ये सोचकर की रास्ते में कंफर्म हो ही जाएगा तो ये खबर आपके लिए है. 

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दरअसल रिजर्वेशन कराते वक्त आईआरसीटीसी (IRCTC) ऐप पर नो रूम लिखा देखने के बाद भी आपने बस इस उम्मीद पर टिकट ले लिया था कि चार्ट बनने तक क्लियर हो जाएगा. ट्रेन में चढ़ने के बाद खाली बोगी देखकर आपकी आंखों में चमक भी आ गई थी. मगर जैसे ही आपने टीटीई साहब को अपना टिकट बढ़ाया, उनका जवाब सुनकर हैरान हो गया. क्योंकि तमाम बर्थ खाली होने के बाद भी टीटीई (TTE) के टैबलेट पर  'नो-रूम' (No Room) ही लिखा मिल रहा होता है.

आप हैरान हैं, समझ नहीं आ रहा कि जो आंखें देख रही हैं, वो सच है या टीटीई के हाथ में चमक रहा वो सरकारी टैबलेट? जब सीटें साफ-साफ खाली दिख रही हैं, तो ऐप और सिस्टम पर 'नो-रूम' का बोर्ड क्यों लटका हुआ है?

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असल में ये कोई टेक्निकल ग्लिच नहीं, बल्कि रेल की पटरियों पर चल रहा एक बहुत ही शातिर और खामोश खेल है. इस खेल का असली विलेन है टीटीई को मिला वो आधुनिक उपकरण, जिसे रेलवे की भाषा में 'हैंडहेल्ड टर्मिनल' (HPT टैबलेट) कहा जाता है. रेलवे ने दावा किया था कि इस डिजिटल टैबलेट के आने के बाद भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा, पर जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है. 

आखिर भारतीय रेल के इस डिजिटल सिस्टम के अंदर ऐसी भी क्या खामी, जिसने आम यात्रियों की यात्रा नर्क बना रखी है?

दावों का हवाई महल और 'हैंडहेल्ड टर्मिनल्स' का सच

पहले समझिए कि रेलवे ने इस सिस्टम को लेकर जनता को क्या सपना दिखाया था. रेल मंत्रालय की डिजिटल पहल के तहत ऑन-बोर्ड स्टाफ को एचपीटी (HPT) टैबलेट बांटे गए थे. नियम के मुताबिक, जैसे ही ट्रेन स्टेशन से खुलेगी, टीटीई को इस टैबलेट पर लाइव चार्ट देखना होगा. जो यात्री ट्रेन में नहीं चढ़े (No Show), उनकी सीटें टीटीई को इस टैबलेट पर 'वेकेंट' यानी खाली मार्क करनी होती हैं.

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भारतीय रेल के नियमों की मानें तो जैसे ही टीटीई साहब किसी बर्थ को खाली मार्क करते हैं. वो डाटा तुरंत रेलवे के सेंट्रल रिजर्वेशन सिस्टम यानी PRS पर चला जाता है. जिसके बाद उन सभी यात्रियों को आरएसी (RAC) या वेटिंग क्लियर होने का मैसेज अपने आप चला जाता है, जो अगली बोगियों में वेटिंग टिकट पर सफर कर रहे हैं. इस व्यवस्था का मतलब है इंसानी दखलंदाजी रोकना और सिस्टम को ट्रांसपैरेंट बनाना. 

सुनने में बड़ा अच्छा लगता है कि भई वाह! अब टीटीई अपनी मर्जी से किसी को सीट नहीं बेच पाएंगे. पर यहीं पर कहानी में असली ट्विस्ट आता है. क्योंकि कुछ लोगों ने इस डिजिटल दीवार में भी एक बड़ा छेद ढूंढ निकाला है.

जब जानबूझकर 'ऑफलाइन' हो जाता है सिस्टम

अब समझिए उस जमीनी खेल को, जो कई रूट्स पर धड़ल्ले से चल रहा है. टीटीई साहब जैसे ही ट्रेन में चढ़ते हैं, वे अपने इस चमचमाते टैबलेट को बीच रास्ते में ही 'ऑफलाइन' मोड पर डाल देते हैं. या फिर जैसे ही कोई यात्री खाली सीट के बारे में पूछता है, तो सीधे कह देते हैं-"अरे भाई, क्या करें, रास्ते में नेटवर्क ही नहीं आ रहा, टैबलेट काम ही नहीं कर रहा!"

नेटवर्क न होने का यह बहाना कोई मजबूरी नहीं, बल्कि एक सोची-समझी चाल है. टैबलेट को ऑफलाइन रखने का सीधा मकसद ये होता है कि जो सीटें ट्रेन में खाली रह गई हैं, वे मेन सिस्टम (PRS) पर लाइव न दिख सकें. अगर सीटें सिस्टम पर दिख गईं, तो वो ऑटोमैटिक तरीके से किसी जेन्युइन वेटिंग वाले यात्री को अलॉट हो जाएंगी. और अगर ऐसा हो गया, तो टीटीई साहब के हाथ क्या लगेगा? कुछ नहीं! इसलिए सीटों को सिस्टम की नजरों से छुपाकर रखा जाता है, ताकि बाद में मैन्युअल तरीके से, यानी पुराने ढर्रे पर यात्रियों से मोटा 'सुविधा शुल्क' (रिश्वत) लेकर वो सीटें ब्लैक में बेची जा सकें.

विजिलेंस विंग की एंट्री और औचक निरीक्षण का डर

रेलवे के गलियारों में यह खेल इतना बड़ा हो चुका था कि आखिरकार रेलवे बोर्ड के विजिलेंस विंग (सतर्कता विभाग) को इस मामले में कूदना पड़ा है. इस समर सीजन में देश भर से यात्रियों ने सोशल मीडिया और रेलवे की हेल्पलाइन पर धड़ाधड़ शिकायतें दर्ज कराईं कि ट्रेन खाली होने के बावजूद टीटीई पैसे मांग रहे हैं और टैबलेट खराब होने का रोना रो रहे हैं.

इसी का नतीजा है कि विजिलेंस विंग ने चलती ट्रेनों में हैंडहेल्ड टर्मिनल्स को जानबूझकर ऑफलाइन किए जाने और सीटों की इस ब्लैक-मार्केटिंग के खिलाफ एक बड़ा मोर्चा खोल दिया है. अलग-अलग जोन्स में औचक निरीक्षण (Surprise Inspection) के लिए स्पेशल टीमें बनाई गई हैं, जो बीच रास्ते में अचानक ट्रेन में चढ़कर टीटीई के टैबलेट चेक कर रही हैं. इन टीमों की साप्ताहिक रिपोर्ट भी बहुत जल्द आने वाली है, जिसमें कई बड़े खुलासे होने की उम्मीद है. जांच में यह भी देखा जा रहा है कि किस टीटीई ने यात्रा के दौरान कितने समय तक अपने डिवाइस को ऑफलाइन मोड पर रखा था.

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आम यात्री इस खेल से कैसे बचें?

इस पूरे ग्रिड गेम में पिसता सिर्फ आम यात्री है, जो गर्मी में धक्के खाने को मजबूर होता है. लेकिन इस डिजिटल दौर में आपको भी थोड़ा स्मार्ट बनना होगा ताकि कोई आपकी मजबूरी का फायदा न उठा सके.

अगर आपको ट्रेन में सीटें खाली दिख रही हैं और टीटीई टैबलेट खराब होने का बहाना बना रहा है, तो सीधे बहस करने के बजाय तुरंत RailMadad ऐप या रेलवे के ट्विटर हैंडल पर पीएनआर (PNR) और कोच नंबर के साथ शिकायत दर्ज कराइए. जैसे ही आप ऑनलाइन शिकायत करते हैं, वो सीधे ऊंचे अफसरों के डैशबोर्ड पर फ्लैश होती है, और ऐसे मामलों में टीटीई को तुरंत जवाब देना भारी पड़ जाता है.

सवाल ये है कि इनसे बचा कैसे जाए. जानकार कहते हैं कि इसके लिए रेलवे को एचपीटी प्रोजेक्ट की गाइडलाइंस में ऐसा कड़ा नियम बनाना होगा कि अगर कोई टीटीई बिना किसी ठोस तकनीकी खराबी के डिवाइस ऑफलाइन रखता है, तो उस पर सख्त से सख्त कार्रवाई हो. तब जाकर कहीं पटरियों पर चल रहा यह 'नो-रुक' का काला खेल पूरी तरह बंद हो पाएगा.

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