सोशल मीडिया स्क्रॉल करते हुए क्या आपने हाल में वो वीडियो देखा है, जिसमें लोग एसी-3 टियर या स्लीपर कोच के टॉयलेट के पास भेड़-बकरियों की तरह ठंसे हुए हैं. या वो वीडियो, जहां कंफर्म टिकट वाले यात्री अपनी ही सीट पर बैठने के लिए मिन्नतें कर रहे हैं क्योंकि पूरी बोगी पर वेटिंग टिकट वालों का कब्जा है. ये तस्वीरें किसी एक रूट की नहीं हैं. उत्तर से लेकर दक्षिण और पूर्व से लेकर पश्चिम तक, भारतीय रेल के सामान्य और स्लीपर कोचों से ऐसी ही डरा देने वाली तस्वीरें आ रही हैं.
स्लीपर क्लास की 'मौत' और एसी कोचों की बाढ़, आम आदमी की लाइफलाइन 'भारतीय रेलवे' कहां जा रही है?
Indian Railways: वेटिंग टिकट वालों का बढ़ता रेला, जनरल बोगियों में पैर रखने की जंग और बदलती प्राथमिकताओं के बीच मिडिल क्लास के सफर का ऐसा सच जो भारतीय रेल पर सवालिया निशान खड़े करता है.


मॉनसून के इस सीजन में जब ट्रेनें लेट हो रही हैं, तो स्टेशनों और ट्रेनों के भीतर का ये संकट और गहरा गया है. संसद से लेकर सोशल मीडिया तक एक ही सवाल गूंज रहा है कि क्या भारतीय रेलवे अब आम आदमी की लाइफलाइन नहीं रही. क्या मिडिल क्लास और गरीब तबके का सफर अब रेलवे की प्राथमिकताओं से बाहर हो चुका है.
वंदे भारत बनाम आम आदमी की एक्सप्रेस: आंकड़ों का सच
रेलवे का जो नया चेहरा हम देख रहे हैं, वो चमचमाती वंदे भारत ट्रेनों, अमृत भारत स्टेशनों और बुलेट ट्रेन के प्रोजेक्ट्स से सजा है. लेकिन इस चमक के पीछे एक कड़वा सच छिपा है. पिछले 5 सालों में भारतीय रेलवे ने चुपचाप अपनी ट्रेनों का कंपोजिशन बदल दिया है. जो ट्रेनें पहले 12-14 स्लीपर और जनरल कोच के साथ चलती थीं, उनमें अब स्लीपर कोच घटकर 2 से 4 रह गए हैं. उनकी जगह ले ली है इकोनॉमी एसी (3E) और थर्ड एसी (3A) के कोचों ने.
आंकड़ों की बात करें तो रेलवे का पूरा फोकस अब प्रीमियम सेगमेंट पर है. बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट साल 2024-25 के अंतरिम बजट और रेलवे की परफॉर्मेंस रिपोर्ट्स को देखें, तो साफ होता है कि नॉन-एसी कोचों (स्लीपर और जनरल) की मैन्युफैक्चरिंग को धीरे-धीरे कम किया गया है. उदाहरण के लिए, एलएचबी (LHB) कोचों के आने के बाद नए बनने वाले कोचों में एसी बोगियों की संख्या को प्राथमिकता दी जा रही है. जब संसद में इस पर सवाल उठा, तो सरकारी आंकड़ों में ये बात सामने आई कि रेलवे ट्रेनों की संख्या तो बढ़ा रहा है, लेकिन उनमें आम आदमी के बैठने की क्षमता यानी जनरल और स्लीपर बर्थ लगातार कम हो रहे हैं.
इकोनॉमिक क्लास डिवाइड: क्या रेलवे सिर्फ अमीर यात्रियों के लिए है
‘द हिंदू’ की भारतीय रेलवे के कंपोजिशन पर ग्राउंड रिपोर्ट की मानें तो ये पूरा संकट एक बड़े 'इकोनॉमिक क्लास डिवाइड' को जन्म दे रहा है. भारत में आज भी एक बहुत बड़ी आबादी ऐसी है जिसके लिए 400 या 500 रुपये का स्लीपर टिकट ही बजट की आखिरी सीमा है. जब आप एक झटके में ट्रेन से स्लीपर कोच हटाकर वहां 1200 रुपये का थर्ड एसी कोच लगा देते हैं, तो वो गरीब या निम्न-मध्यम वर्ग का यात्री कहां जाएगा. उसके पास दो ही रास्ते बचते हैं. या तो वो अपनी जेब काट कर महंगा टिकट खरीदे, या फिर बचे-खुचे 2-3 जनरल कोचों में जानवरों की तरह ठंसकर सफर करे.
इसी का नतीजा है कि अब स्लीपर और एसी कोचों में भी वेटिंग टिकट वाले या बिना टिकट वाले यात्री जबरन घुस रहे हैं. जब जनरल बोगी में पैर रखने की जगह नहीं होगी, तो मजदूर, रेहड़ी-पटरी वाले और छोटे कामगार उन ट्रेनों के स्लीपर कोचों का रुख करेंगे ही, जो उनके सामने से गुजर रही हैं. ये नीतिगत बदलाव आम आदमी को रेलवे से दूर धकेल रहा है और सफर को एक लग्जरी बना रहा है.
सुरक्षा और भीड़ मैनेजमेंट: क्षमता से तीन गुना भीड़ और हादसों का डर
ये सिर्फ आरामदेह सफर का मामला नहीं है, ये सीधे-सीधे इंसानी जान और सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मुद्दा है. किसी भी ट्रेन की एक तय क्षमता होती है. अगर एक स्लीपर कोच में 72 सीटें हैं, तो वो अधिकतम 80 से 90 लोगों का भार संभालने के लिए डिजाइन किया गया है. लेकिन आज के दौर में स्लीपर कोचों में 200 से 250 लोग सवार हो रहे हैं. पैर रखने के गलियारे, दो बोगियों को जोड़ने वाले कपलिंग एरिया और टॉयलेट के पास की जगह पूरी तरह ब्लॉक रहती है.
रेल सुरक्षा पर कैग (CAG) की रिपोर्ट के मुताबिक क्षमता से तीन गुना अधिक भीड़ होने पर रश मैनेजमेंट पूरी तरह फेल हो जाता है. अगर ट्रेन में कोई तकनीकी खराबी आए या अचानक ब्रेक लगाना पड़े, तो बोगी के अंदर भगदड़ मच सकती है. सीनियर जर्नलिस्ट मधुरेंद्र कुशवाहा कहते हैं,
भगदड़ से भी बड़ा खतरा ये है कि इतनी भीड़ के कारण इमरजेंसी एग्जिट (आपातकालीन खिड़कियां) और दरवाजे ब्लॉक हो जाते हैं. भगवान ना करे अगर कोई हादसा हो जाए, तो बोगी से बाहर निकलना नामुमकिन हो जाएगा.
मुधरेंद्र आगे कहते हैं कि अगर ऐसा हो गया तो रेलवे का आरपीएफ (RPF) और स्टाफ इस भीड़ के सामने पूरी तरह बेबस होगा.

रेलवे का तर्क: क्या स्लीपर कोच सच में घाटे का सौदा हैं
अब बात करते हैं रेलवे के पक्ष की. रेलवे का अपना एक रेवेन्यू मॉडल है और वो इसके पीछे अपने तर्क देता है. रेलवे का कहना है कि पैसेंजर सेगमेंट हमेशा से घाटे में चलता है. आम यात्रियों को सस्ते में सफर कराने के लिए रेलवे मालगाड़ियों (Freight Earnings) से होने वाली कमाई का इस्तेमाल करता है, जिसे क्रॉस-सब्सिडी कहा जाता है.
भारतीय रेलवे की वित्तीय वार्षिक रिपोर्ट और प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) रिलीज के मुताबिक, स्लीपर और जनरल क्लास का किराया लागत से काफी कम रखा जाता है, जिससे रेलवे को हर साल भारी नुकसान होता है. इसके ठीक उलट, एसी कोचों से रेलवे को अच्छी कमाई होती है. इसलिए रेलवे अपने इंफ्रास्ट्रक्चर को अपग्रेड करने, पटरियों को आधुनिक बनाने और नई तकनीक लाने के लिए एसी कोचों की संख्या बढ़ा रहा है ताकि रेवेन्यू जेनरेट किया जा सके. लेकिन यहां सवाल ये उठता है कि क्या एक कल्याणकारी राज्य (Welfare State) में देश की सबसे बड़ी सार्वजनिक परिवहन सेवा का मकसद सिर्फ मुनाफा कमाना होना चाहिए.
संतुलन की भारी जरूरत
भारतीय रेलवे का आधुनिकीकरण जरूरी है, वंदे भारत जैसी ट्रेनें देश का गौरव हैं, इसमें कोई दोराय नहीं है. लेकिन ये विकास आम आदमी की कीमत पर नहीं होना चाहिए. जब तक देश के करोड़ों लोगों की आर्थिक स्थिति एसी में सफर करने लायक नहीं हो जाती, तब तक स्लीपर और जनरल कोचों की संख्या को बरकरार रखना होगा. रेलवे को प्रीमियम ट्रेनों को चलाने के साथ-साथ साधारण मेल और एक्सप्रेस ट्रेनों में नॉन-एसी कोचों की संख्या फिर से बढ़ानी होगी, ताकि भारत का मिडिल क्लास और गरीब तबका सुरक्षित और सम्मानजनक सफर कर सके.
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