The Lallantop

उज्बेकिस्तान से हुई यूरेनियम सप्लाई पर बड़ी डील, भारत को इससे क्या फायदा?

PM नरेंद्र मोदी की Tashkent Visit के दौरान India और Uzbekistan ने Uranium की लॉन्ग-टर्म सप्लाई को लेकर अहम समझौते की घोषणा की है. भारत के मौजूदा कई Nuclear Reactors के लिए नैचुरल यूरेनियम जरूरी है.

Advertisement
post-main-image
पीएम मोदी की उज्बेकिस्तान यात्रा के दौरान एक अहम समझौता हुआ है (PHOTO- PTI)

Quick AI HighlightsClick here to view more

  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ताशकंद दौरे के दौरान भारत और उज्बेकिस्तान ने यूरेनियम की लॉन्ग टर्म सप्लाई के लिए द्विपक्षीय समझौते की घोषणा की।
  • भारत में प्रेशराइज्ड हेवी वॉटर रिएक्टरों की जरूरत को पूरा करने के लिए प्राकृतिक यूरेनियम की स्थायी आपूर्ति सुनिश्चित करने हेतु उज्बेकिस्तान जैसे विशाल न्यूक्लियर भंडार वाले देश से सहयोग जरूरी है।
  • इस समझौते से भारत के न्यूक्लियर ऊर्जा उत्पादन को 2047 तक 100 गीगावाट वृद्धि के लक्ष्य प्राप्ति में मदद मिलेगी और ऊर्जा सुरक्षा में स्थिरता आएगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ताशकंद दौरे के दौरान एक बड़ा अपडेट सामने आया है. भारत और उज़्बेकिस्तान ने 30 अगस्त को अपने द्विपक्षीय संबंधों को एक लेवल ऊपर बढ़ा दिया. इसी कड़ी में दोनों देशों के बीच यूरेनियम की सप्लाई के लिए लॉन्ग टर्म समझौता किया गया है. इस समझौते की घोषणा ताशकंद में उज्बेक राष्ट्रपति शौकत मिर्जियोयेव के साथ हुई डेलिगेशन लेवल की बातचीत के बाद की गई. दोनों देश डिफेंस, व्यापार और निवेश, डिजिटल कनेक्टिविटी और ऊर्जा के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमत हुए हैं. इस मौके पर पीएम मोदी ने कहा कि भारत यूरेनियम की सप्लाई के लिए एक लंबी अवधि की व्यवस्था करने जा रहा है. यानी आने वाले कई सालों तक भारत को बिना किसी रुकावट के यूरेनियम मिलता रहेगा.

Advertisement

द्विपक्षीय बातचीत के बाद विदेश मंत्रालय के सचिव (वेस्ट) सिबी जॉर्ज ने भी इस बारे में जानकारी दी. जॉर्ज ने कहा,

Advertisement

भारत को यूरेनियम की सप्लाई के लिए लंबे समय के इंतजाम पर पॉजिटिव बातचीत हुई. हम बहुत जल्द एक समझौते पर हस्ताक्षर करने के करीब हैं. दरअसल भारत उज्बेकिस्तान के सिविलियन न्यूक्लियर पावर प्रोग्राम से यूरेनियम हासिल करने की कोशिश कर रहा है.

भारत को क्यों चाहिए यूरेनियम?

भारत में एनर्जी जनरेशन के लिए जो रिएक्टर लगे हैं, उन्हें ‘प्रेशराइज्ड हेवी वॉटर रिएक्टर (PHWR)’ कहा जाता है. ऐसे रिएक्टर्स को चलाने के लिए भारत बाहर से आयात किए गए नैचुरल यूरेनियम कॉन्संट्रेट पर निर्भर है. साइंटिस्ट्स अपनी भाषा में इसे ‘येलोकेक’ भी कहते हैं. उज्बेकिस्तान उन देशों में से है, जिनके पास दुनिया का सबसे विशाल न्यूक्लियर भंडार है.

रिएक्टर में इस्तेमाल करने के लिए पहले कच्चे यूरेनियम अयस्क (Ore) के कंसंट्रेट (येलोकेक) को केमिकल प्रोसेस से गुजारा जाता है. फिर इसे शुद्ध करके यूरेनियम डाइऑक्साइड (UO₂) पाउडर में बदला जाता है. इस पाउडर को नियत प्रेशर और टेंपरेचर पर पकाया जाता है. पकने के बाद इसके सिरेमिक फ्यूल पेलेट बनाए जाते हैं. यूरेनियम का एक पेलेट एक पेंसिल वाले इरेजर के आकार का होता है. लेकिन ये छोटा सा टुकड़ा उतनी ही ऊर्जा दे सकता है जितना एक टन कोयला देता है.

Advertisement

(यह भी पढ़ें: SHANTI Bill को मोदी सरकार की मंजूरी, अब प्राइवेट कंपनियां बनाएंगी न्यूक्लियर बिजली)

2047 तक 100MW का लक्ष्य

इसका एक सिरा भारत के विजन 2047 से भी जुड़ा है. केंद्रीय बजट 2025-26 में भी इसका जिक्र किया गया था. तब बताया गया था कि भारत सरकार ने 2047 तक 100 GW परमाणु ऊर्जा क्षमता का एक बड़ा लक्ष्य तय किया है. इसे हासिल करने के लिए निर्बाध सप्लाई काफी जरूरी है. इसीलिए भारत ने उज्बेकिस्तान से समझौता किया है. पहले भी भारत ने उज्बेकिस्तान से न्यूक्लियर पावर के लिए यूरेनियम लिया है. अगर सप्लाई का ढांचा लंबे समय चलता है, तो ये भारत के घरेलू न्यूक्लियर पावर को बढ़ाने के लक्ष्य में काफी मदद करेगा.

वीडियो: जंग के बीच ईरान का यूरेनियम किधर है? इतने यूरेनियम से कितने बम बन सकते हैं?

Advertisement