संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता का दावा करने वाले भारत ने एकबार फिर UNSC की अस्थाई सीट पर अपनी दावेदारी का ऐलान कर दिया है. मगर इस बार राह थोड़ी मुश्किल दिखाई दे रही है. मुकाबला उज्बेकिस्तान से है, जिस यूं तो अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में भारत से कोई मुकाबला नहीं, मगर एक नए अपडेट ने विदेश मंत्री जयशंकर और उनकी टीम की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. ये डिप्लोमैटिक डेवलपमेंट हैं, इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) का उज्बेकिस्तान को समर्थन देने का ऐलान…
UNSC की रेस: भारत को उज्बेकिस्तान की चुनौती, क्या खाड़ी देशों का साथ बदल पाएगा खेल?
India's Campaign for UNSC Seat: भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में 2028-29 के कार्यकाल के लिए अपनी दावेदारी पेश कर दी है. सामने उज्बेकिस्तान है, जिसे इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) के समर्थन के बाद मुकाबला दिलचस्प हो गया है.


ऑल इंडिया रेडियो (AIR) के मुताबिक विदेश मंत्रालय ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की अस्थाई सीट के लिए अपने अभियान की औपचारिक शुरुआत कर दी है. भारत ने साल 2028-29 के कार्यकाल के लिए अपना दावा ठोका है. ये कदम ऐसे वक्त में उठाया गया है जब दुनिया के समीकरण तेजी से बदल रहे हैं. विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी खुद अपने एक्स हैंडल पर इस बाबत जानकारी दी है.
लेकिन क्या ये राह आसान है? बिल्कुल नहीं. ‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के मुताबिक इस बार मुकाबला उज्बेकिस्तान से है और उज्बेकिस्तान के पीछे खड़ा है इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) का बड़ा कुनबा. अगर नंबर गेम में देखें तो ये आंकड़ा 57 वोटों का बैठता है. जबकि चुने जाने के लिए भारत को कम से कम 129 वोटों की जरूरत होगी. ऐसे में 57 वोट हाथ से निकले तो थोड़ी दिक्कत वाली बात हो सकती है.
उज्बेकिस्तान बनाम भारत: 57 देशों का गणित
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अस्थाई सीट पर चुने जाने के लिए 193 सदस्य देशों में से दो तिहाई के वोट हासिल करना जरूरी होता है. जैसा की हम पहले ही बता चुके हैं कि दो तिहाई का ये आंकड़ा मतलब 129 वोट.
दिक्कत ये है कि उज्बेकिस्तान को OIC के 57 देशों का सीधा समर्थन मिलने की खबरें हैं. अब तक 8 बार UNSC की अस्थाई सीट हासिल कर चुके भारत का सबसे शानदार प्रदर्शन 2021-22 में रहा. जब हमें वोट देने वाले 192 सदस्यों में से 184 का समर्थन हासिल हुआ था. अब इस संख्या में से OIC के 57 वोट घटा दें तो 127 वोट बचते हैं. यानी जीत के लिए जरूरी 129 वोटों से दो कम. क्यों है ना टेंशन वाली बात?
मुस्लिम देशों में सेंधमारी
मगर थांबा-थांबा-थांबा…इतना सबकुछ जानने समझने के बाद अगर आप सोचने लगे हैं कि इतना बड़ा गुट आपके खिलाफ तो जीत की राह मुश्किल हो जाएगी. तो आप थोड़ी जल्दीबाजी कर रहे हैं. OIC में सेंध लगाना मुश्किल भले हो मगर नामुमकिन बिल्कुल नहीं है. वो कैसे? तो चलिए ये गणित भी समझा देते हैं.
कूटनीतिक थिंक टैंक ‘इंडिया मैटर्स’ के रोहित शर्मा इसे आसान शब्दों में समझाते हुए कहते हैं,
“भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान और कतर के अमीर शेख तमीम बिन हमद अल थानी से दोस्ती किसी से छिपी नहीं है. इसके अलावा अभी इंडोनेशिया यात्रा के दौरान वहां के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांटो के साथ पीएम मोदी का रिश्ता भी सबने देखा.”
रोहित शर्मा आगे कहते हैं कि,
“ये तीनों देश ना सिर्फ खुद OIC के सक्रिय सदस्य हैं, बल्कि कई अन्य मुस्लिम देशों पर भी प्रभाव रखते हैं. ऐसे में उज्बेकिस्तान के कथित 57 सॉलिड वोटों में सेध लगाना पूरी तरह से मुमकिन है.”
इसके अलावा विदेश मंत्री एस.जयशंकर ने हाल ही में बहरीन, कतर, कुवैत और ओमान जैसे देशों का सफल दौरा किया. विदेश नीति के जानकार मानते हैं कि यात्रा के दौरान सुरक्षा परिषद की अस्थाई सीट पर चर्चा जरूर हुई होगी.

ग्लोबल साउथ वाला एंगल
भारत जहां एक तरफ मुस्लिम देशों के संगठन में सेंध मारने की पूरी कोशिश कर रहा है. वहीं ‘ग्लोबल साउथ’ (Global South) वाले फॉर्मूले को भी सुरक्षा परिषद के चुनाव में भुनाने की पूरी तैयारी हो चुकी है.
विदेश नीति से जुड़े मामलों को लंबे समय से कवर कर रहे वरिष्ठ पत्रकार रमेश ठाकुर भारत खुद को पूरे ग्लोबल साउथ के नुमाइंदे के तौरपर पेश कर रहा है. लल्लनटॉप से बात करते हुए रमेश कहते हैं,
“दिल्ली का मानना है कि वो केवल अपनी ताकत पर नहीं, बल्कि उन देशों के भरोसे चुनाव में उतरेगा जिसे वो 'वॉइस ऑफ ग्लोबल साउथ' कहता है. लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और कैरेबियन देशों के साथ भारत के रिश्ते पिछले कुछ सालों में काफी मजबूत हुए हैं.”
कई मीडिया रिपोर्ट्स से ये संकेत मिल रहा है कि भारत का तर्क खुद को विकासशील देशों की आवाज की तरह पेश करने का है, न कि किसी गुट विशेष का प्रतिनिधि के तौर पर.
क्या खाड़ी देश बनेंगे 'गेम चेंजर'?
भारत ने पिछले कुछ सालों में 'लुक वेस्ट' पॉलिसी के तहत खाड़ी देशों में जो निवेश किया है और जो भरोसा कमाया है, वो इस चुनाव में एक बड़ा फैक्टर साबित हो सकता है. अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के जानकार और शिक्षाविद डॉ डी.डी. कौशिक मानते हैं कि,
“सिर्फ यूएई ही नहीं सउदी अरब और ईरान जैसे देश में भारत के खिलाफ सीधा स्टैंड लेने से पहले कई बार सोचेंगे. पाकिस्तान बेशक सउदी और ईरान को भारत के खिलाफ वोट डालने के लिए उकसाने की कोशिश करेगा. मगर ये दोनों ही देश भारत से रिश्ते बिगाड़ना नहीं चाहेंगे.”
डॉ कौशिक के मुताबिक भारत की कोशिश होगी कि वो इन देशों को ये समझाए कि भारत का UNSC में होना उनके भी हित में है.
दरअसल यही वो पेंच है जो UNSC की इस पूरी कहानी को दिलचस्प बनाता है. OIC भले ही उज्बेकिस्तान के साथ हो, लेकिन भारत के खाड़ी देशों जैसे यूएई, सऊदी अरब और ओमान के साथ रिश्ते आज अपने चरम पर हैं.
नाम ना छापने की शर्त पर विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि इन देशों के साथ भारत का व्यापारिक और रणनीतिक तालमेल इतना गहरा है कि अगर ये देश OIC के औपचारिक स्टैंड से अलग जाकर भारत को गुप्त समर्थन दे दें तो किसी को ताज्जुब नहीं होना चाहिए.
इतिहास का गणित: भारत का UNSC सफर
भारत का UNSC में सफर उतार-चढ़ाव भरा रहा है. ‘यूनाइटेड नेशनल लाइब्रेरी’ के मुताबिक भारत कुल 8 बार अस्थाई सदस्य बना. मतलब कुल 16 सालों पर विश्व सुरक्षा में बतौर UNSC सदस्य अपना योगदान दिया.
चलिए एक नजर डालते हैं सुरक्षा परिषद में भारत की अब तक की यात्रा पर,
- 1950-51: भारत पहली बार सुरक्षा परिषद का हिस्सा बना.
- 1967-68: दूसरी बार, भारत ने एशिया-प्रशांत क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया.
- 1972-73: तीसरी बार सदस्यता.
- 1977-78: चौथी बार.
- 1984-85: पांचवीं बार.
- 1991-92: छठी बार.
- 2011-12: सातवीं बार (इस दौरान भारत ने शांति मिशन और आतंकवाद के मुद्दों पर जोर दिया).
- 2021-22: हालिया कार्यकाल, जिसे भारत की सबसे सफल कूटनीतिक जीत माना जाता है, क्योंकि इसमें भारत को 192 में से 184 वोट मिले थे.
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी 'सॉफ्ट पावर' और शांति मिशन में सबसे बड़ा योगदान देने वाला देश होना है. भारत को अब तक मिली जीतें इसी आधार पर मिली हैं.
ये साख का सवाल है बाबू भाई
रक्षा और विदेश मामलों के जानकारों का मानना है कि UNSC का ये चुनाव केवल वोटों का गणित नहीं है, बल्कि भारत की ग्लोबल साख की परीक्षा है.
‘इंडिया मैटर्स’ के रोहित शर्मा कहते हैं कि,
“भारत को इस बार अपनी उम्मीदवारी को 'रिफॉर्म' (UNSC सुधार) से जोड़ना होगा.”
भारत लगातार कहता रहा है कि वर्तमान UNSC का ढांचा पुराना हो चुका है और उसे आधुनिक दुनिया की हकीकत के हिसाब से बदलना चाहिए. ‘ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन’ के मुताबिक अगर भारत इस नैरेटिव को मजबूती से पेश करता है, तो वो उज्बेकिस्तान जैसे पारंपरिक दावेदारों को पीछे छोड़ सकता है.
UNSC की मंजिल हासिल होगी?
भारत के लिए 2028-29 की राह मुश्किल है, लेकिन नामुमकिन नहीं. उज्बेकिस्तान के पास 57 देशों का साथ हो सकता है, लेकिन भारत के पास कूटनीतिक कौशल, मजबूत आर्थिक साझेदारी और वैश्विक स्तर पर बढ़ती स्वीकार्यता है. अब देखना ये होगा कि 'ग्लोबल साउथ' का कार्ड भारत के लिए कितना कारगर साबित होता है.
दिल्ली का फोकस अब उन छोटे-छोटे देशों पर है जो अक्सर अनसुने रह जाते हैं. अगर भारत उन्हें अपने पाले में लाने में कामयाब रहा, तो सुरक्षा परिषद की वो कुर्सी बहुत दूर नहीं है.
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