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मौत के 17 साल बाद टीचर की नौकरी 'छिन' गई, अब हाईकोर्ट ने वापस दे दी

गुजरात हाईकोर्ट ने 1988 में नियुक्त एक शिक्षक की नौकरी 33 साल बाद रद्द करने के सरकारी फैसले को गलत ठहराते हुए उसे बहाल कर दिया. कोर्ट ने कहा कि कर्मचारी की मौत के सालों बाद और पेंशन देने के बाद नियुक्ति पर सवाल नहीं उठाए जा सकते.

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हाई कोर्ट ने गुजरात सरकार के फैसले को पलट दिया है (PHOTO-ITG)

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  • गुजरात हाईकोर्ट ने एक टीचर की नियुक्ति को उसकी मृत्यु के 17 साल बाद रद्द करने के आदेश को पलट दिया और कहा कि 33 वर्षों बाद नियुक्ति रद्द नहीं की जा सकती।
  • 2015 में स्कूल की तत्कालीन प्रिंसिपल के पति की शिकायत पर उन शिक्षकों की नियुक्ति रद्द की गई थी जिन पर भर्ती नियमों के उल्लंघन और जाली दस्तावेजों का उपयोग करने का आरोप था।
  • हाईकोर्ट के निर्णय के बाद टीचर की विधवा को पहले रोकी गई पेंशन पुनः मिलने लगी है और गुजरात सरकार की इस फैसले के खिलाफ अपील खारिज हो गई है।

गुजरात में एक टीचर की नौकरी उसकी मौत के 17 साल बाद छिन गई थी लेकिन अब कोर्ट के आदेश के बाद उसे बहाल कर दिया गया है. टीचर के तौर पर उनकी नियुक्ति के 33 साल भर्ती नियमों के उल्लंघन के आरोप में उन पर राज्य सरकार ने ऐक्शन लिया था. हालांकि, तब तक उनकी मौत हो गई थी लेकिन टीचर की पत्नी को इसी नौकरी की बदौलत पेंशन मिल रही थी. नियुक्ति रद्द होने के बाद यह पेंशन रोक दी गई. उन्होंने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और अब कोर्ट ने ये कहा है कि नौकरी देने के 33 साल बाद किसी की नियुक्ति को रद्द नहीं किया जा सकता. 

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क्या है मामला?

ये पूरा मामला साल 1988 से शुरू हुआ था. यहां हर्षद भवसार नाम से एक व्यक्ति को सुज्ञान एजुकेशन ट्रस्ट में 5 अन्य लोगों के साथ टीचर के पद पर नियुक्त किया गया था. उनके पास उस पद के लिए जरूरी योग्यता थी, इसलिए जिला शिक्षा अधिकारी ने 1989 में उनकी नियुक्ति को नियमित यानी रेगुलराइज कर दिया. 16 साल तक नौकरी करने के बाद साल 2004 में भवसार का निधन हो गया. इसके बाद शिक्षा विभाग ने भवसार की पत्नी मनोरमा को पेंशन देना शुरू कर दिया. 

साल 2021 में स्कूल के डायरेक्टर ने 6 शिक्षकों और एक लाइब्रेरियन की नियुक्ति रद्द कर दी. उन्हें मिल रहे सभी फायदे भी वापस ले लिए. साथ ही डायरेक्ट सैलरी स्कीम के तहत उनकी सैलरी भी रोक दी गई. भवसार भी उनमें से एक थे. टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार ने ये कार्रवाई 2015 में स्कूल की तत्कालीन प्रिंसिपल के पति की शिकायत के बाद शुरू की थी. इस शिकायत में आरोप लगाया गया था कि सारी नियुक्तियां भर्ती से जुड़े नियमों का उल्लंघन करके की गई थीं. नौकरी पाने के लिए जाली दस्तावेजों का सहारा लिया गया था. 

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नियुक्ति के लिए न तो 'नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट' (NOC) लिया गया था. न ही कोई विज्ञापन निकाला गया. इस मामले में एम्प्लॉयमेंट एक्सचेंज से नाम भी नहीं मांगे गए. इन नियुक्तियों की वजह से सरकारी खजाने को 6 करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान हुआ.

यह भी पढ़ें: हाई कोर्ट ने एक बार में 36 हजार टीचर्स की नियुक्ति रद्द कर दी, ऐसा क्या हो गया?

आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती

स्कूल ट्रस्ट और भवसार की पत्नी समेत सभी प्रभावित कर्मचारियों ने मिलकर 2021 में गुजरात हाईकोर्ट में इस आदेश को चुनौती दी. सिंगल-जज बेंच ने सरकार के फैसले को रद्द करते हुए कहा कि तीन दशक से ज्यादा समय बीत जाने के बाद नियुक्तियों को रद्द नहीं किया जा सकता. हालांकि, गुजरात सरकार ने हार नहीं मानी. उसने भवसार की नियुक्ति रद्द करने के हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील की. लेकिन उनकी अपील को खारिज करते हुए जस्टिस एनएस संजय गौड़ा और जस्टिस जेएल ओदेदरा की डिवीजन बेंच ने कहा, 

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अगर कोई नियुक्ति 1988 में की गई थी और 1989 में उसे रेगुलर कर दिया गया था तो नियुक्ति के लगभग 33 साल बाद राज्य उस पर सवाल नहीं उठा सकता या उसे चुनौती नहीं दे सकता. कर्मचारी की विधवा को फैमिली पेंशन देने के बाद राज्य अब उसी नियुक्ति पर सवाल उठा रहा है जिसे उसके अपने अधिकारियों ने रेगुलर किया था. 

कोर्ट ने कहा कि उनकी राय में सिंगल जज ने नियुक्ति रद्द करने के आदेश को सही ढंग से खारिज किया. कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार इतनी देर से नियुक्ति रद्द करने के लिए अपनी शक्तियों का इस्तेमाल नहीं कर सकता.

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