हिंदुस्तान का ‘पार्टी कैपिटल’ कहे जाने वाले गोवा में टूरिस्ट्स की संख्या घट रही है. यहां आने वाले यूरोपियन और रूसी टूरिस्ट्स खासतौर पर कम होते जा रहे हैं. कभी विदेशी टूरिस्ट्स से भरा रहने वाला पालोलेम बीच अब वैसा नहीं रहा. लेकिन गोवा में विदेशी टूरिस्ट्स घटने के पीछे कारण क्या है? क्या गोवा की 'वाइब' पहले जैसी नहीं रही? इसके कई कारण बताए जा रहे हैं. कुछ योगदान कोविड का भी है. तो कुछ वीजा अप्रूवल में देरी का, जो टूरिस्ट्स को दूसरे देशों की ओर भी भेज रहा है.
विदेशी टूरिस्टों में घट रहा गोवा का क्रेज, श्रीलंका-वियतनाम जा रहे, वजह कोविड भी है
विदेशी टूरिस्ट्स ने वीजा प्रोसेस को भी जिम्मेदार ठहराया है. उनका कहना है कि वीजा प्रोसेस लंबा और मुश्किल हो गया है. साथ ही पांच साल के वीजा फीस में हुई बढ़ोतरी भी एक बड़ा कारण है. और गोवा लगातार महंगा होता जा रहा है.


बीबीसी ने इस मामले पर एक विस्तृत रिपोर्ट छापी है. रिपोर्ट में सरकारी आंकड़ों से हवाले से बताया गया कि गोवा में विदेशी टूरिस्ट कम हो रहे हैं. गोवा के पर्यटन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक साल 2017 में लगभग 9 लाख विदेशी टूरिस्ट गोवा आए थे. लेकिन साल 2025 तक यह संख्या घटकर लगभग 5 लाख रह गई. हालांकि, विदेशियों के उलट हिंदुस्तान के लोगों की दिलचस्पी गोवा में बढ़ रही है. आकड़ें देखें तो साल 2016 में लगभग 68 लाख स्थानीय टूरिस्ट गोवा आए थे, जिनकी संख्या साल 2025 तक बढ़कर एक करोड़ से ज्यादा हो गई.
गोवा टूरज्म डिपार्टमेंट ने हाल ही में कहा कि फिलहाल जिस तरह के ग्लोबल जियोपॉलिटिकल हालात हैं, उसके कारण भी विदेशी टूरिस्ट्स के आने पर असर पड़ रहा है. गोवा के पर्यटन मंत्री रोहन खौंते ने एक स्थानीय मीडिया से कहा,
आगे की प्लानिंग करते समय समय हमें निराशावादी और आशावादी दोनों ही नजरिए को अपनाना होगा.
लेकिन गोवा में विदेशी टूरिस्ट्स की संख्या में गिरावट का कारण सिर्फ जियोपॉलिटिकल हालात नहीं हैं. आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं कि टूरिस्ट्स की संख्या में गिरावट दुनियाभर में जारी हालिया संघर्ष से पहले ही शुरू हो चुकी थी. सवाल उठता है कि 1960 और 1970 के दशक के "हिप्पी एरा" से लेकर अब तक जिस गोवा को विदेशी लोग पसंद करते रहे, अब वे इससे दूरी क्यों बना रहे हैं?
विदेशी टूरिस्ट्स का क्या कहना है?बीबीसी ने इस मुद्दे पर कुछ विदेशी टूरिस्ट्स से बात की. पांचवीं बार गोवा घूमने आईं रूस की बैले डांसर सोफी कहती हैं कि इस समय लोग सच में पैसों की तंगी से जूझ रहे हैं. पहले कोविड आया. फिर यूक्रेन युद्ध हुआ और अब मिडिल ईस्ट में जो कुछ हो रहा है, उसकी वजह से फ़्लाइट्स बहुंत महंगी हो गई हैं. सोफी के मुताबिक, पैसा इस मामले में यकीनन एक बड़ा फैक्टर है. वो कहती हैं कि मेरे कुछ दोस्त इस साल गोवा के बजाय तुर्किए या मिस्र को चुन रहे हैं क्योंकि वे पास में हैं और सस्ते भी. एक यूरोपियन टूरिस्ट रिको ने बताया कि वो पिछले 20 सालों से गोवा आ रहे हैं. रिको कहते हैं,
निश्चित रूप से मेरे देश में लोगों के पास इस समय विदेश घूमने के लिए पैसे बहुत कम हैं. पिछले तीन-चार सालों से वे अधिकतर छुट्टियां अपने ही देश में बिताना पसंद कर रहे हैं.
बीबीसी से बात करने वाले लगभग आधे दर्जन विदेशी टूरिस्ट्स ने वीजा प्रोसेस को भी जिम्मेदार ठहराया है. उनका कहना है कि वीजा प्रोसेस लंबा और मुश्किल हो गया है. साथ ही पांच साल के वीजा फीस में हुई बढ़ोतरी भी एक बड़ा कारण है.
वियतनाम और श्रीलंका बन रहे सस्ते विकल्पगोवा के टूरिस्ट एसोसिएशन के मेंबर और एक बड़ी ट्रैवल चार्टर कंपनी के ऑपरेटर अर्नेस्ट डायस कहते हैं कि सस्ते होटलों और आसानी से मिलने वाले ऑन-अराइवल वीजा ने यूरोपियन और रूसी टूरिस्ट्स को एशिया में दूसरी जगहों खासकर वियतनाम और श्रीलंका घूमने के लिए प्रेरित किया है. डायस कहते हैं,
आज लोग जल्दी फैसले लेना चाहते हैं और आखिरी समय पर ट्रिप फाइनल करना चाहते हैं. इसलिए वीजा में देरी निश्चित रूप से लोगों की संख्या में आई गिरावट का एक बड़ा कारण है. ऑन-अराइवल वीजा के अलावा गोवा की तुलना में इन देशों का किफायती होना भी एक कारण है. देश के भीतर घूमने वाले लोगों की बढ़ती संख्या और मीटिंग, कॉन्फ्रेंस, प्रदर्शनियां आदि के बढ़ने की वजह से अच्छे स्टार वाले होटलों के दाम इतने बढ़ गए हैं कि अब कई विदेशी टूरिस्ट्स के लिए वहां ठहरना महंगा पड़ने लगा है.
साथ ही गोवा में सस्ते बीच-किनारे वाले रिसॉर्ट्स की संख्या भी वियतनाम, श्रीलंका और थाईलैंड के मुकाबले कम है. वहां लोग आधे दाम में या उससे भी सस्ते में पूरा पैकेज लेकर घूम सकते हैं.
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