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वायुसेना अफसर से ब्रह्मोस इंजीनियर और DRDO वैज्ञानिक तक... भारत की सुरक्षा पर हनी ट्रैप का जाल

IAF Wing Commander से लेकर DRDO वैज्ञानिक और BrahMos इंजीनियर तक, Honey Trap ने जासूसी का तरीका बदल दिया है. जानिए Social Media, Psychology और AI के सहारे कैसे Defence Secrets तक पहुंच बनाने की कोशिश की जाती है और क्यों अगला खतरा आपके फोन की स्क्रीन पर हो सकता है.

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प्यार, चैट और AI से जासूसी का नया खेल (फोटो-AI)

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  • दिल्ली पुलिस ने भारतीय वायु सेना के एक 44 वर्षीय विंग कमांडर को पाकिस्तानी खुफिया एज operatives से संपर्क में होने तथा संवेदनशील रक्षा जानकारी साझा करने के आरोप में गिरफ्तार किया है, जिसके खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई।
  • भारत में सोशल मीडिया का उपयोग कर हनी ट्रैप के माध्यम से संवेदनशील रक्षा जानकारियां निकालने के कई मामले सामने आए हैं, जिनमें वरिष्ठ अधिकारी, वैज्ञानिक और दूतावास कर्मचारी शामिल हैं, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा उत्पन्न होता है।
  • इन मामलों की जांच एवं अदालत में सुनवाई जारी है, और सुरक्षा एजेंसियां सोशल मीडिया व डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े साइबर हमलों तथा सोशल इंजीनियरिंग के खतरों को पहचान कर रोकथाम के उपाय बढ़ा रही हैं।

एक फ्रेंड रिक्वेस्ट आई. प्रोफाइल पर एक महिला की तस्वीर थी. बातचीत शुरू हुई. पहले सामान्य बातें हुईं. फिर निजी जिंदगी पर चर्चा होने लगी. भरोसा बढ़ा तो सामने वाले ने नौकरी और काम से जुड़े सवाल पूछने शुरू कर दिए. कुछ समय बाद कोई फाइल भेजी गई, कोई लिंक आया या ऐसी जानकारी मांगी गई जिसे साझा करना सामान्य स्थिति में संभव नहीं था.

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यहीं से एक साधारण सी सोशल मीडिया चैट राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला बन सकती है.

भारत में हनी ट्रैप, सोशल मीडिया जासूसी और डिफेंस साइबर सिक्योरिटी को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है. हाल के मामलों में भारतीय वायु सेना के एक 44 वर्षीय विंग कमांडर से लेकर DRDO के वरिष्ठ वैज्ञानिक, ब्रह्मोस एयरोस्पेस (BrahMos Aerospace) से जुड़े इंजीनियर और मास्को (Moscow) स्थित भारतीय दूतावास में तैनात कर्मचारी तक के मामले सामने आए हैं. इन मामलों की कानूनी स्थिति अलग अलग है, लेकिन एक बात कॉमन दिखाई देती है. डिजिटल दुनिया ने किसी संवेदनशील व्यक्ति तक पहुंच बनाने की कीमत और दूरी दोनों कम कर दी है.

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सबसे ताजा मामला भारतीय वायु सेना के विंग कमांडर का है. दिल्ली पुलिस ने उन पर पाकिस्तानी खुफिया ऑपरेटिव्स के संपर्क में आने और संवेदनशील रक्षा जानकारी साझा करने का आरोप लगाया है. जांच में एक सहकर्मी के मोबाइल फोन से डेटा हासिल करने के लिए कथित तौर पर डेटा चुराने वाला सॉफ़्टवेयर (Data Stealing Software) का इस्तेमाल करने की कोशिश का भी आरोप सामने आया. मामले में 30 जुलाई 2026 को चार्जशीट दाखिल होने की रिपोर्ट है.  

लेकिन ये सिर्फ एक केस की कहानी नहीं है. असली कहानी इससे कहीं बड़ी है.

जासूसी की दुनिया में सबसे पहले निशाना इंसान बनता है

पुराने जमाने की जासूसी में किसी एजेंट को सीमा पार भेजना, किसी सरकारी अधिकारी तक पहुंच बनाना और लंबे समय तक भरोसा कायम करना पड़ता था. आज सोशल मीडिया ने इस पूरी प्रक्रिया को बदल दिया है.

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फेसबुक, इंस्टाग्राम, WhatsApp और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म किसी व्यक्ति की सार्वजनिक जानकारी का विशाल डेटाबेस बन चुके हैं. किसी व्यक्ति की नौकरी, शहर, रुचियां, दोस्तों का नेटवर्क, यात्राएं, पसंदीदा विषय और सामाजिक गतिविधियां अक्सर ऑनलाइन दिखाई देती हैं.

एक विदेशी खुफिया ऑपरेटर के लिए ये जानकारी सिर्फ सोशल मीडिया पोस्ट नहीं है. ये Target Profile का हिस्सा हो सकती है.

किसे संपर्क करना है, किस भाषा में बात करनी है, किस विषय से बातचीत शुरू करनी है और किस तरह भरोसा पैदा करना है, इन सवालों के जवाब सोशल मीडिया से निकाले जा सकते हैं.

यहीं से हनी ट्रैप शुरू होता है…

IAF विंग कमांडर और सोशल मीडिया का जाल

2026 का IAF मामला इस बदलती जासूसी का ताजा उदाहरण है.

‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली पुलिस और भारतीय वायु सेना की खुफिया व्यवस्था ने एक 44 वर्षीय विंग कमांडर को गिरफ्तार किया. आरोप है कि अधिकारी सोशल मीडिया के जरिए एक महिला के संपर्क में आया और बाद में पाकिस्तानी खुफिया ऑपरेटिव्स से जुड़ी गतिविधियों का हिस्सा बन गया.

जांच एजेंसियों के मुताबिक अधिकारी ने संवेदनशील रक्षा जानकारी साझा की. इससे भी गंभीर आरोप ये है कि उसने अपने एक सहकर्मी के मोबाइल फोन में ऐसा सॉफ्टवेयर इंस्टॉल करने की कोशिश की जिससे डिवाइस का डेटा हासिल किया जा सके.

यानी कथित हनी ट्रैप का अंतिम लक्ष्य सिर्फ बातचीत नहीं था. डिजिटल पहुंच (Digital Access) हासिल करना भी इसका हिस्सा था. 

ये अंतर बेहद अहम है. क्योंकि अगर किसी अधिकारी को किसी फर्जी प्रोफाइल के जरिए सिर्फ निजी बातचीत में उलझाया जाए तो ये एक बात है. लेकिन अगर उसी संपर्क के जरिए उसे किसी डिवाइस, फाइल या दूसरे अधिकारी की जानकारी तक पहुंच बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाए तो मामला साइबर जासूसी की दिशा में चला जाता है.

फिलहाल इस मामले में सामने आए आरोपों को अदालत में साबित तथ्य नहीं माना जा सकता. जांच और न्यायिक प्रक्रिया जारी है. लेकिन सुरक्षा एजेंसियों के लिए ये केस इस बात की याद जरूर है कि सोशल इंजीनियरिंग और साइबर अटैक अब अलग अलग खतरे नहीं रह गए हैं. दोनों एक ही ऑपरेशन का हिस्सा हो सकते हैं.  

DRDO वैज्ञानिक प्रदीप कुरुलकर और 'ज़ारा दासगुप्ता'

अगर किसी केस को भारतीय डिफेंस हनी ट्रैप की सबसे चर्चित मिसालों में रखा जाए तो प्रदीप कुरुल्कर (Pradeep Kurulkar) का मामला सामने आता है.

महाराष्ट्र ATS ने मई 2023 में DRDO के ‘वैज्ञानिक और अनुसंधान और विकास प्रतिष्ठान इंजीनियर्स’ (Research & Development Establishment Engineers) के तत्कालीन निदेशक प्रदीप कुरुलकर को गिरफ्तार किया था. उन पर आरोप था कि उन्होंने एक पाकिस्तानी Intelligence Operative के साथ संपर्क में रहते हुए संवेदनशील रक्षा जानकारी साझा की.

आरोपित ऑपरेटिव ने कथित तौर पर जारा दासगुप्ता (Zara Dasgupta) नाम की पहचान का इस्तेमाल किया था.

‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के मुताबिक महाराष्ट्र ATS की चार्जशीट में आरोप लगाया गया कि कुरुल्क और कथित पाकिस्तानी ऑपरेटिव के बीच डिजिटल बातचीत हुई और संवेदनशील जानकारी साझा की गई. 2023 में ATS ने 1,000 से ज्यादा पन्नों की चार्जशीट दाखिल करने की बात कही थी. 

लेकिन इस केस की कहानी अभी अदालत में खत्म नहीं हुई है.

अप्रैल 2026 में बॉम्बे हाई कोर्ट (Bombay High Court) ने कुरुल्क की जमानत याचिका खारिज कर दी. अदालत के सामने अभियोजन की दलील थी कि संवेदनशील पद पर रहते हुए कथित तौर पर पाकिस्तानी खुफिया एजेंट (Intelligence Operative) के साथ संपर्क और जानकारी साझा करने के आरोप गंभीर हैं और जमानत मिलने पर गवाहों को प्रभावित करने या फरार होने की आशंका हो सकती है.  

जून 2026 में Pune की विशेष अदालत ने मामले में आरोप तय कर दिए और ट्रायल की राह खुल गई. यानी अभी इस केस में अंतिम दोषसिद्धि का दावा करना सही नहीं होगा.  

इस केस की सबसे बड़ी सीख क्या है? एक व्यक्ति के पास जितनी ज्यादा तकनीकी और रणनीतिक जानकारी होगी, उसके Digital Footprint की सुरक्षा उतनी ही महत्वपूर्ण होगी.

BrahMos के निशांत अग्रवाल और 'सेजल कपूर'

2018 में ब्रह्मोस एयरोस्पेस से जुड़े निशांत अग्रवाल (Nishant Agarwal) की गिरफ्तारी ने देश में हनी ट्रैप और रक्षा जासूसी (Defence Espionage) की बहस को काफी तेज किया था.

नागपुर में ब्रह्मोस एयरोस्पेस से जुड़े निशांत पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने पाकिस्तानी खुफिया एजेंट के साथ संपर्क किया और संवेदनशील जानकारी साझा की. जांच में 'सेजल कपूर' नाम के सोशल मीडिया प्रोफाइल समेत दूसरे डिजिटल संपर्कों की बात सामने आई.

‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के मुताबिक जांचकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि कुछ मैलवेयर प्रोग्राम (Malware Programs) के जरिए उनके कंप्यूटर सिस्टम तक पहुंच बनाई गई और संवेदनशील डेटा हासिल करने की कोशिश हुई.

ये केस इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि इसमें हनी ट्रैप और मैलवेयर का कनेक्शन दिखाई देता था. पहले डिजिटल संपर्क, फिर भरोसा और उसके बाद कथित तौर पर तकनीकी माध्यम से डेटा तक पहुंच.

अदालत ने इस केस में क्या कहा?

2025 में Bombay High Court की Nagpur Bench ने Nishant Agarwal की उम्रकैद की सजा रद्द कर दी. अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष सबसे गंभीर आरोप, यानी गोपनीय जानकारी (classified information) को किसी तीसरे पक्ष तक पहुंचाने की बात पर्याप्त रूप से साबित नहीं कर पाया. कुछ दूसरे आरोपों में भी उन्हें राहत मिली, जबकि ऑफिशियल सीक्रेट एक्ट (Official Secrets Act) के एक कम गंभीर प्रावधान के तहत सजा बरकरार रही. 

इसलिए निशांत अग्रवाल को आज भी 'BrahMos के सीक्रेट पाकिस्तान को बेचने वाला साबित जासूस' कहना गलत होगा.

लेकिन केस से मिला सुरक्षा सबक फिर भी महत्वपूर्ण है.

डिजिटल संपर्क (Digital Contact), मैलवेयर और संवेदनशील रक्षा जानकारी (Sensitive Defence Information) का कॉम्बिनेशन सुरक्षा व्यवस्था के लिए कितना गंभीर हो सकता है, ये मामला इसका उदाहरण बन गया.

मास्को में तैनात सतेंद्र सिवाल और सोशल मीडिया हनी ट्रैप

अब आते हैं उस केस पर जिसने दिखाया कि खतरा सिर्फ सैन्य अधिकारी या रक्षा वैज्ञानिकों तक सीमित नहीं है.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक फरवरी 2024 में यूपी ATS ने सतेंद्र सिवाल (Satendra Siwal) को गिरफ्तार किया. सिवाल, मास्को स्थित भारतीय दूतावास में इंडिया बेस्ड सुरक्षा सहायक के तौर पर काम कर रहे थे.

UP ATS के मुताबिक एक महिला ने सोशल मीडिया के जरिए सिवाल से संपर्क बनाया और बाद में कथित तौर पर पाकिस्तानी खुफिया एजेंट के रूप में सामने आई. आरोप था कि सिवाल ने भारतीय रक्षा प्रतिष्ठानों से जुड़ी संवेदनशील जानकारी साझा की.

UP ATS ने दावा किया कि इसमें भारतीय वायुसेना (Indian Air Force) और भारतीय नौसेना (Indian Navy) की हथियार प्रणाली (weapon systems) से जुड़ी जानकारी भी शामिल थी. 

इस केस में भी कहानी का रास्ता सोशल मीडिया से शुरू हुआ.

यानी टारगेट जरूरी नहीं कि सीधे सेना में काम करता हो. अगर उसके पास संवेदनशील जानकारी तक पहुंच है, तो वो किसी विदेशी खुफिया नेटवर्क के लिए संभावित लक्ष्य बन सकता है.

और यही बात आधुनिक काउंटर इंटेलीजेंस को कठिन बनाती है.

अब सुरक्षा की परिधि सिर्फ सोल्जर, ऑफिसर्स, या साइंटिस्ट तक सीमित नहीं है. कॉन्ट्रैक्टर, टेक्नीशियन, सपोर्ट स्टाफ, दूतावासों में काम करने वाले कर्मचारी और निजी डिफेंस फर्म में काम करने वाला शख्स भी अहम हो सकता है.

एक और केस जो खतरे की नई दिशा दिखाता है: Ravindra Verma

2025 में महाराष्ट्र ATS ने 27 वर्षीय जूनियर इंजीनियर रविंद्र मुरलीधऱ वर्मा (Ravindra Murlidhar Verma) को गिरफ्तार किया. वो डिफेंस टेक्नॉलजी से जुड़ी एक निजी कंपनी के लिए काम कर रहे थे.

ATS के अनुसार एक महिला ने फेसबुक के जरिए उनसे संपर्क किया. बातचीत आगे बढ़ी और बाद में WhatsApp पर जानकारी साझा किए जाने का आरोप सामने आया.

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो जांच एजेंसी के मुताबिक नवंबर 2024 से मार्च 2025 के बीच रविंद्र ने इंडियन नेवी डॉकयार्ड के उन प्रतिबंधित क्षेत्र (restricted areas) से जुड़े दस्तावेज साझा किए जिन तक उनकी नौकरी के कारण पहुंच थी.  

ये केस इसलिए खास है क्योंकि इसमें टारगेट कोई वरिष्ठ सैन्य अधिकारी नहीं था.

एक प्राइवेट डिफेंस कंपनी का जूनियर इंजीनियर भी संभावित टारगेट बन सकता है. यानी आधुनिक जासूसी में सवाल सिर्फ ये नहीं है कि आप कितने बड़े पद पर हैं.

सवाल ये है कि आपके पास किस तरह की जानकारी तक पहुंच है.

हनी ट्रैप की असली ताकत प्यार नहीं, साइकोलॉजी है

हनी ट्रैप को सिर्फ सेक्स या रोमांस के चश्मे से देखना इस खतरे को छोटा करके देखना होगा. इसका असली हथियार मनोविज्ञान (Psychology) है.

  • पहले टारगेट की पहचान.
  • फिर उसका डिजिटल फुटप्रिंट.
  • फिर बातचीत.
  • फिर भरोसा.
  • फिर निजी जानकारी.
  • फिर काम से जुड़ी जानकारी.
  • और आखिर में संवेदनशील जानकारियों तक पहुंच.

कई मामलों में सामने वाला खुद को महिला, नौकरी देने वाले व्यक्ति, दोस्त, प्रेमी या किसी दूसरे भरोसेमंद संपर्क के रूप में पेश कर सकता है. यही सोशल इंजीनियरिंग है.

हैकर को हमेशा कंप्यूटर का पासवर्ड तोड़ने की जरूरत नहीं होती. अगर इंसान को इस तरह प्रभावित कर दिया जाए कि वो खुद संवेदनशील जानकारी दे दे या किसी संदिग्ध फाइल को डाउनलोड कर ले, तो तकनीकी सुरक्षा की कई दीवारें बेकार हो सकती हैं.

अकेलापन क्यों बन सकता है सिक्योरिटी रिस्क?

हनी ट्रैप की चर्चा में अक्सर एक शब्द आता है, कमजोरी (Vulnerability). लेकिन इस कमजोर नस का मतलब सिर्फ सेक्स या रोमांस नहीं है.

  • ये अकेलापन हो सकता है.
  • करियर की चिंता हो सकती है.
  • पैसे की जरूरत हो सकती है.
  • मानसिक दबाव हो सकता है.
  • किसी से बात करने की जरूरत हो सकती है.
  • या फिर सिर्फ Recognition पाने की इच्छा.

किसी विदेशी इंटेलिजेंस ऑपरेटर (Intelligence Operator) के लिए टारगेट की यही कमजोरियां एंट्री पॉइंट बन सकती हैं. इसलिए आधुनिक काउंटर इंटेलीजेंस में मानवीय व्यवहार (Human Behaviour) को समझना साइबर सुरक्षा जितना ही महत्वपूर्ण होता जा रहा है.

अब AI इस खेल को और खतरनाक क्यों बना सकता है?

यहीं से कहानी का अगला अध्याय शुरू होता है. आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (Artificial Intelligence) ने फेक इमेज, डीपफेक वीडियो, वायस क्लोनिंग (Voice Cloning) और ऑटोमेटेड चैट (Automated Chat) को ज्यादा आसान बना दिया है.

आज किसी फर्जी प्रोफाइल के लिए असली व्यक्ति की तस्वीर चुराना जरूरी नहीं है. AI-जेनेरेटेड चेहरे बनाए जा सकते हैं. किसी व्यक्ति की आवाज की नकल की जा सकती है. बातचीत को स्वचालित किया जा सकता है.

लेकिन यहां एक जरूरी फर्क समझना होगा. भारत में सामने आए हर हनी ट्रैप केस को AI हनी ट्रैप कहना अभी सही नहीं है.

ताजा IAF मामले में भी उपलब्ध रिपोर्टिंग AI-generated woman, डीपफेक वीडियो या वायस क्लोनिंग के इस्तेमाल की पुष्टि नहीं करती. इसलिए इसे AI हनी ट्रैप का साबित केस कहना गलत होगा.

लेकिन खतरा भविष्य का नहीं, उभरता हुआ वर्तमान है.

जेनरेटिव एआई (Generative AI) का इस्तेमाल सोशल इंजीनियरिंग को ज्यादा व्यक्तिगत बनाने में किया जा सकता है. किसी व्यक्ति की सार्वजनिक सोशल मीडिया गतिविधि देखकर उसके लिए ज्यादा विश्वसनीय और व्यक्तिगत फिशिंग मैसेज (phishing messages) तैयार किए जा सकते हैं.

यानी आने वाला जासूस शायद सिर्फ एक खूबसूरत तस्वीर लेकर नहीं आएगा.

  • वो आपकी भाषा में बात करेगा.
  • आपकी पसंद के बारे में जानेगा.
  • आपके समय के हिसाब से ऑनलाइन आएगा.

और संभव है कि आपके डिजिटल व्यवहार से आपकी कमजोरियां पहचानकर उसी के हिसाब से कहानी बनाए.

AI हनी ट्रैप पर लल्लनटॉप ने कुछ दिन पहले एक लेख लिखा था, AI हनी ट्रैप का खौफनाक खेल, सेना के जवानों को फंसाने में जुटे सुंदर चेहरों वाले 'डिजिटल जासूस' शीर्षक से…इस डिजिटल हनी ट्रैप पर ज्यादा जानना हो तो लिंक को क्लिक कर सकते हैं.

Deepfake Video से ज्यादा खतरनाक है भरोसे का Deepfake

कल्पना कीजिए कि आपको वीडियो कॉल आती है…

  • सामने वही चेहरा है…
  • आवाज भी मिलती है…
  • आपका नाम भी पता है…
  • आपकी नौकरी के बारे में भी जानकारी है…

और सामने वाला आपको ऐसी बात बताता है जो सुनने में बिल्कुल विश्वसनीय लगती है. तो  आप क्या करेंगे?

यही डीपफेक और वायस क्लोनिंग का असली खतरा है. तकनीक सिर्फ चेहरा नकली नहीं बना रही. वो भरोसे को नकली बनाने की दिशा में जा रही है.

सुरक्षा प्रतिष्ठानों के लिए ये बेहद गंभीर चुनौती है क्योंकि कई संवेदनशील फैसले फोन, वीडियो कॉल और डिजिटल संदेशों पर होते हैं.

अगर किसी वरिष्ठ अधिकारी की आवाज की नकल करके कोई आदेश दिया जाए या किसी परिचित के नाम से संवेदनशील फाइल मांगी जाए, तो समस्या सिर्फ फेक वीडियो की नहीं होगी. वो ऑपरेशनल सिक्योरिटी का मामला बन जाएगा.

Social Media अब सिर्फ Social नहीं रहा

भारतीय सेना ने दिसंबर 2025 में अपनी सोशल मीडिया पॉलिसी (Social Media Policy) में बदलाव किए थे. सैनिकों को इंस्टाग्राम देखने की सीमित अनुमति दी गई, लेकिन पोस्टिंग, कमेंट, रिएक्शन और इंटरैक्शन पर प्रतिबंध बरकरार रखा गया.

WhatsApp, टेलीग्राम, सिग्नल और Skype जैसे प्लेटफॉर्म पर भी unclassified जानकारी के इस्तेमाल को लेकर सीमाएं तय की गईं. नीति का उद्देश्य ये था कि सैनिक डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर सकें, लेकिन ऑपरेशनल सिक्योरिटी से समझौता न हो.  

ये बदलाव अपने आप में एक संदेश है. आज सुरक्षा का मतलब सिर्फ बंदूक, बैरक और बॉर्डर नहीं है. सुरक्षा का मतलब मोबाइल फोन भी है. सुरक्षा का मतलब सोशल मीडिया भी है. सुरक्षा का मतलब डिजिटल फुटप्रिंट भी है.

चार केस, एक पैटर्न

अगर वायुसेना के विंग कमांडर, प्रदीप कुरुल्कर, निशांत अग्रवाल और सतेंद्र सिवाल के मामलों को एक साथ रखा जाए तो कोई एक जैसी कहानी नहीं बनती.

हर केस की अपनी कानूनी स्थिति है. हर केस में आरोप अलग हैं. हर मामले में जांच और अदालत की प्रक्रिया अलग है.

लेकिन एक पैटर्न दिखाई देता है.

  • पहला, संवेदनशील जानकारी तक पहुंच रखने वाला कोई भी शख्स टारगेट बन सकता है.
  • दूसरा, सोशल मीडिया संपर्क बनाने का आसान माध्यम बन सकता है.
  • तीसरा, भरोसा पैदा करना किसी भी तकनीकी हमले का पहला चरण हो सकता है.
  • चौथा, व्यक्तिगत जानकारी और पेशेवर जानकारी के बीच की दीवार टूटते ही खतरा बढ़ जाता है.
  • पांचवां, साइबर जासूसी और ह्यूमन इंटेलीजेंस अब एक दूसरे से अलग दुनिया नहीं हैं.
  • और छठा, AI इस पूरी प्रक्रिया को ज्यादा तेज, व्यक्तिगत और scalable बना सकता है.

असली खतरा फोन में नहीं, फोन के उस पार है

हम अक्सर सोचते हैं कि साइबर हमला मतलब किसी ने पासवर्ड हैक कर लिया. लेकिन आधुनिक जासूसी का एक रास्ता इससे कहीं आसान हो सकता है.

पहले किसी व्यक्ति को खोजो. फिर उससे दोस्ती करो. फिर भरोसा जीतो. फिर उसके बारे में जानो. फिर उससे जानकारी लो. और अगर जरूरत पड़े तो उसके डिवाइस तक पहुंच बनाओ.

यानी कभी कभी सबसे आसान फायरवॉल इंसान होता है. और सबसे कमजोर पासवर्ड भी इंसान ही.

इसलिए किसी डिफेंस ऑफिसर्स की सोशल मीडिया सिक्योरिटी सिर्फ उसका निजी मामला नहीं है. ये नेशनल सिक्योरिटी का हिस्सा है.

  • अनजान व्यक्ति की अचानक बढ़ती दिलचस्पी.
  • असामान्य नौकरी का ऑफर.
  • बार बार निजी बातचीत की कोशिश.
  • पोस्टिंग या यूनिट से जुड़े सवाल.
  • गोपनीय दस्तावेज की मांग.
  • संदिग्ध लिंक.
  • अनजान ऐप इंस्टॉल करने का दबाव.
  • किसी दूसरे डिवाइस तक पहुंच की मांग.

ये सभी रेड फ्लैग (Red Flags) हो सकते हैं. और किसी संवेदनशील पद पर बैठे व्यक्ति के लिए एक बात हमेशा याद रखने वाली है.

आपको सिर्फ ये नहीं देखना कि सामने वाला क्या पूछ रहा है. ये भी देखना है कि वो आपसे पूछ क्यों रहा है.

जासूस हमेशा बंदूक लेकर नहीं आता

शायद आधुनिक जासूसी को समझने का सबसे आसान तरीका यही है.

  • दुश्मन हमेशा बंदूक लेकर नहीं आता.
  • कभी वो फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजता है.
  • कभी नौकरी का ऑफर देता है.
  • कभी दोस्त बनता है.
  • कभी प्रेम का भरोसा देता है.
  • कभी किसी परिचित की आवाज में बात करता है.

और आने वाले समय में संभव है कि वो AI की मदद से आपकी भाषा, आपकी पसंद और आपकी कमजोरियों को समझकर बिल्कुल आपके हिसाब से कहानी तैयार करे.

लेकिन इसी जगह एक जरूरी फर्क भी है. हर ऑनलाइन फ्रेंडशिप जासूसी नहीं है. हर फेक प्रोफाइल विदेशी खुफिया एजेंसी की नहीं होती. हर हनी ट्रैप केस में AI शामिल नहीं होता. और हर आरोपी अदालत में दोषी साबित हो, ये भी जरूरी नहीं.

इसीलिए राष्ट्रीय सुरक्षा की खबरों में सनसनी से ज्यादा जरूरी है तथ्य. क्योंकि जासूसी के खिलाफ पहली लड़ाई सिर्फ खुफिया एजेंसियां नहीं लड़तीं.

ये लड़ाई Information Discipline से शुरू होती है.

  • एक क्लिक से.
  • एक चैट से.
  • एक फोटो से.

और कभी कभी एक ऐसे भरोसे से, जो शायद करना ही नहीं चाहिए था.

वीडियो: पाकिस्तानी एजेंट के हनी ट्रैप में फंसे DRDO साइंटिस्ट, मिसाइल-ड्रोन की खुफिया जानकारी वॉट्सऐप कर दी

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