आपने एक प्रॉपर्टी लंबे वक्त से किराये पर ले रखी है. आप वक्त से किराया भी भर रहे हैं, लेकिन आपने रेंट एग्रीमेंट रिन्यू नहीं करवाया. अगर आप भी ऐसा करते हैं तो आपको लंबा फटका लग सकता है. ऐसे ही एक केस में Delhi High Court ने बड़ा फैसला दिया है. किरायेदारी की अवधि खत्म होने के बाद भी किरायेदार कई साल तक प्रॉपर्टी पर रहा. बाद में विवाद कोर्ट पहुंचा. अब हाई कोर्ट ने किरायेदार को मकान मालकिन को करीब ₹3.27 करोड़ के 'मीस्न प्रॉफिट' ( Mesne Profits ) का भुगतान करने का आदेश दिया है. इस रकम पर 6 फीसदी सालाना ब्याज भी देना होगा.
प्रॉपर्टी विवाद में दिल्ली HC का बड़ा फैसला, भारी पड़ा बिना Rent Agreement के रहना, लगा ₹3.27 करोड़ का हर्जाना
दिल्ली हाईकोर्ट ने Smt. Raj Kumari Garg v. State Bank of India मामले में बैंक को संपत्ति पर अनधिकृत कब्जे की अवधि के लिए लगभग ₹3.27 करोड़ मेस्ने प्रॉफिट यानी मध्यवर्ती लाभ, वह भी 6 फीसदी सालाना ब्याज के साथ देने का आदेश दिया है.

दिल्ली का डिफेंस कॉलोनी मार्केट, शहर के सबसे महंगे इलाकों में शामिल है. इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इसी इलाके में मकान मालकिन राज कुमारी गर्ग ने अपनी प्रॉपर्टी को साल 2002 में एसबीआई को किराये पर दिया था. पहली मंजिल और दूसरी मंजिल को मिलाकर कुल 2,800 स्क्वेयर फीट जगह तीन साल के लिए किराये पर दी गई. रेंट एग्रीमेंट के साथ 62000 रुपये महीने और उसके बाद रिन्यू की कंडीशन में 20 फीसदी किराया बढ़ाने की शर्त भी एग्रीमेंट में लिखी थी.
31 दिसंबर 2004 को जब एग्रीमेंट खत्म हुआ तो बैंक ने ना तो उसे रिन्यू करवाया और ना प्रॉपर्टी खाली की. हालांकि बैंक हर साल 20 फीसदी किराया बढ़ाकर भुगतान करता रहा. 9 मई 2008 को मकान मालकिन ने किरायेदार को कानूनी नोटिस भेजकर प्रॉपर्टी खाली करने और जून 2008 से 4 लाख रुपये प्रति माह मध्यवर्ती लाभ Mesne Profits देने की मांग की. हालांकि, नोटिस मिलने के बाद भी बैंक प्रॉपर्टी पर बना रहा. इसके बाद मकान मालकिन ने किरायेदार के कब्जे को चुनौती देते हुए अदालत का रुख किया. वैसे तो बैंक ने 31 दिसंबर 2017 को प्रॉपर्टी खाली कर दी मगर अदालत में केस चलता रहा.
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अदालत का फैसला9 जुलाई 2026 को दिल्ली हाई कोर्ट ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया को 3.27 करोड़ रुपये 'मीस्न प्रॉफिट' के तौर पर देने का निर्देश दिया है. दिल्ली हाई कोर्ट ने 9 जुलाई 2026 के फैसले में मई 2012 से दिसंबर 2015 तक की अवधि के लिए 163 प्रति स्क्वेयर फीट प्रति माह की दर से ‘मीस्न प्रॉफिट’ देने का आदेश दिया. इसके बाद जनवरी 2016 से 31 दिसंबर 2017 तक की रकम की गणना किराये में 15 फीसदी की बढ़ोतरी के आधार पर करने का निर्देश दिया गया. इसके साथ ही आदेश में 6 फीसदी सालाना ब्याज भी लगाया गया.
Mesne Profits या मध्यवर्ती लाभ वह मुनाफा या हर्जाना है, जो किसी अवैध या गलत कब्जेदार को संपत्ति के असली मालिक को चुकाना पड़ता है. सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 की धारा 2(12) के तहत इस राशि की चर्चा की गई है.
इस केस का एक दूसरा पहलू भी है. मकान मालकिन राज कुमारी गर्ग ने साल 2007 में बैंक/किरायेदार से 25 लाख रुपये का लोन लिया था. लोन की शर्तों के तहत मकान मालकिन ने एक नोटरीकृत अंडरटेकिंग पर साइन किया था. इसमें उन्होंने लोन पूरी तरह चुकाए जाने तक किरायेदार को प्रॉपर्टी में रहने देने पर सहमति जताई थी. यह भी तय हुआ था कि लोन की EMI मकान मालकिन को दिए जाने वाले किराये में एडजस्ट की जाएगी. लोन आखिरकार मई 2012 में पूरा चुका दिया गया. यही वो समय था जिसे अदालत ने किरायेदारी खत्म होने के लिहाज से अहम माना. लोन चुकने के बाद किरायेदार के कब्जे को अनधिकृत माना गया.
इस पूरे मामले का सबसे अहम पहलू ये है कि रेंट एग्रीमेंट खत्म होने के बाद किरायेदार का कब्जा किस तारीख से अनधिकृत माना जाएगा. कुल जमा बात ये है कि आप मकान मालिक हो या किरायेदार, अगर एग्रीमेंट खत्म हो गया है तो बिना देरी किए उसे रिन्यू कीजिए.
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