दिल्ली के जंतर-मंतर पर CJP प्रोटेस्ट के दौरान लड़की को थप्पड़ मारने वाले ADCP संदीप लांबा को बड़ी राहत मिली है. लांबा पुलिस की ज्यादतियों से जुड़े साल 2025 के एक मामले की मॉनिटरिंग कर रहे हैं. दिल्ली हाई कोर्ट में एक याचिका डालकर उनको इस मामले से हटाने की मांग की गई थी. लेकिन कोर्ट ने उनको जांच की मॉनिटरिंग से हटाने से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी.
महिला प्रोटेस्टर को 'थप्पड़' मारने वाले पुलिस अधिकारी संदीप लांबा को किस केस में मिली राहत?
दिल्ली हाई कोर्ट ने जंतर मंतर पर महिला को थप्पड़ मारने के आरोपी संदीप लांबा को एक दूसरे मामले की मॉनिटरिंग से हटाने की याचिका खारिज कर दी है. अदालत ने साफ साफ कहा कि एक मामले में आरोप लगने से ये नहीं साबित हो जाता कि वह इंसान हर मामले में गलत तरीके से ही काम करेगा.

हाई कोर्ट ने कहा कि जांच में संदीप लांबा की भूमिका पर केवल इसलिए सवाल नहीं उठाया जा सकता क्योंकि एक वायरल वीडियो में उन्हें एक महिला प्रदर्शनकारी को कथित तौर पर थप्पड़ मारते हुए दिखाया गया था. याचिका खारिज करते हुए जस्टिस गिरीश कठपालिया ने कहा कि किसी एक घटना में अधिकारी पर लगे आरोपों का मतलब यह नहीं है कि वह हर मामले में गलत तरीके से काम करेगा.
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस कठपालिया ने कहा,
केवल इसलिए कि एक वीडियो में वह कथित तौर पर एक महिला को थप्पड़ मारते हुए दिखा है, हम उसको बदनाम नहीं कर सकते. क्या हम उस समय की जमीनी हकीकत जानते हैं? अगर भीड़ संसद में घुस जाती, गोलीबारी होती और कई लोगों की जान चली जाती, तब क्या होता?
20 जुलाई को कॉकरोच जनता पार्टी के 'चलो संसद' मार्च के दौरान बवाल हुआ था. उसी दौरान संदीप लांबा ने एक महिला प्रदर्शनकारी को कथित तौर पर थप्पड़ मारा था जिसका वीडियो वायरल हुआ था. भारी विरोध के एक दिन बाद संदीप लांबा को जंतर-मंतर पर प्रोटेस्ट साइट की ड्यूटी से हटा दिया गया था.
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याचिका में क्या मांग की गई थी?
यह याचिका 68 साल की एक महिला ने दायर की थी. उनका आरोप है कि पिछले साल रमजान के दौरान दिल्ली पुलिस ने उनको जबरदस्ती घर से बाहर निकाला था और पूरी रात गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखा था. इस मामले में हाई कोर्ट ने स्वतंत्र जांच के आदेश दिए थे. संदीप लांबा इस मामले की मॉनिटरिंग कर रहे थे.
महिला ने कोर्ट में याचिका दायर करके मांग की कि लांबा को इस मामले की मॉनिटरिंग से हटा दिया जाए. उन्होंने तर्क दिया कि 20 जुलाई के प्रदर्शन के दौरान एक महिला को कथित तौर पर थप्पड़ मारने वाले वीडियो सामने आने के बाद लांबा की निष्पक्षता से उनका भरोसा उठ गया है.
याचिकाकर्ता ने ये आरोप भी लगाया कि संदीप लांबा ने पहले उनका बयान दर्ज किए बिना ही जांच बंद करने की कोशिश की थी, जिसके बाद कोर्ट ने उनको बयान दर्ज करने का निर्देश दिया था. इस पर हाई कोर्ट ने कहा,
विरोध करने का मौलिक अधिकार तो है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि संप्रभुता के केंद्र को नुकसान पहुंचाया जाए. भले ही यह सत्ता के दुरुपयोग का मामला हो, उन्हें इस तरह बदनाम नहीं किया जा सकता. उन्हें भी निष्पक्ष सुनवाई और जांच का अधिकार है. संस्था को बदनाम करना बंद करें.
कोर्ट ने आगे कहा कि अगर भविष्य में अधिकारी (संदीप लांबा) दोषी भी पाए जाते हैं, तब भी ये मान लेना सही नहीं होगा कि वह हर मामले में गलत या बायस्ड तरीके से ही काम करेंगे.
वीडियो: महिला को थप्पड़ मारने के आरोप में DCP संदीप लांबा पर क्या एक्शन लिया गया?










