नरोत्तम मिश्रा टिकट काटने के बाद भी बीजेपी दतिया सीट का उपचुनाव हार गई. दिल्ली में ‘जेन जी’ आंदोलन के ठीक बाद हुए इस उपचुनाव के नतीजों के राजनीतिक मायने इस एंगल से भी निकाले ही जाएंगे. लेकिन फिलहाल इस सीट पर बीजेपी की हार और नरोत्तम मिश्रा के टिकट कटने के बीच का कनेक्शन सबसे मजबूत बताया जा रहा है.
दतिया उपचुनाव में बीजेपी को नरोत्तम मिश्रा के आंसुओं ने 'डुबो' दिया?
मध्य प्रदेश की दतिया सीट पर बीजेपी उम्मीदवार आशुतोष तिवारी को कांग्रेस के घनश्याम सिंह ने 6,016 वोटों से हरा दिया. राजनीतिक गलियारों में इस हार को नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटने और स्थानीय असंतोष से जोड़कर देखा जा रहा है.

नरोत्तम मिश्रा की जगह बीजेपी ने पार्टी के पदाधिकारी आशुतोष तिवारी को कैंडिडेट बनाया था. सोमवार, 3 अगस्त को घोषित नतीजों में उन्हें कांग्रेस के घनश्याम सिंह ने 6016 वोटों से हरा दिया. आशुतोष तिवारी को 60 हजार 741 वोट मिले. जबकि घनश्याम सिंह ने 66 हजार 757 वोट हासिल किए.
दतिया में बीजेपी का पेच कहां फंसा?दतिया से जब बीजेपी आलाकमान ने नरोत्तम मिश्रा को चुनाव न लड़ाने का फैसला किया था तो स्थानीय लेवल पर पार्टी के भीतर जमकर बगावत हुई थी. हालांकि ऐसा नहीं है कि नरोत्तम मिश्रा ने बड़ा दिल नहीं दिखाया. वे न सिर्फ आशुतोष तिवारी के प्रचार में शामिल हुए बल्कि उनके नामांकन में भी पहुंचे. लेकिन लोगों को संबोधित करते वक्त उनका दुख आंसू बनकर बाहर आ ही गया. आशुतोष तिवारी का प्रचार करते-करते पूर्व गृह मंत्री रो पड़े. नतीजा, उनके ‘आंसू’ तिवारी के नामांकन से ज्यादा बड़ी न्यूज बन गए.
अब कहा जा रहा है कि नरोत्तम मिश्रा का रो पड़ना दतिया में बीजेपी को भारी पड़ गया. उनके आंसू स्थानीय बीजेपी समर्थकों के लिए एक इशारा बन गए, जिसे अब दतिया चुनाव के नतीजे से जोड़ा जा रहा है. वोटों की गिनती हुई तो पता चला बीजेपी को अपने जिला अध्यक्ष रघुवीर कुशवाहा के बूथ पर भी कांग्रेस से पिछड़ना पड़ा. दतिया तो बीजेपी की मजबूत सीट मानी जाती है. 2008, 2013 और 2018 में यहां से नरोत्तम मिश्रा लगातार चुनाव जीते थे. 2023 में उनका यह विजयरथ कांग्रेस के राजेंद्र भारती ने रोका था. उन्होंने नरोत्तम मिश्रा को 7742 वोटों से हराया था.
लेकिन जल्द ही उनके पास इस नतीजे को बदलने का मौका आया. अप्रैल 2026 में दिल्ली के एक स्पेशल एमपी-एमएलए कोर्ट ने राजेंद्र भारती को 1998 के एक फिक्स्ड डिपॉजिट (एफडी) धोखाधड़ी के पुराने मामले में 3 साल की सजा सुना दी. इससे उनकी विधानसभा सदस्यता रद्द हो गई और दतिया में उपचुनाव का ऐलान हो गया. फिर क्या था, नरोत्तम मिश्रा ‘भूलसुधार’ के लिए एक्टिव हो गए. लेकिन इस बार पार्टी उन्हें मौका देने के मूड में नहीं थी.
बीजेपी ने अपने उम्मीदवार के चयन में इस बार बड़ा फेरबदल कर दिया. हारे हुए मंत्री नरोत्तम मिश्रा का इलाके में प्रभाव तो था. पार्टी की स्थानीय इकाई में भी ठीक-ठाक पकड़ थी. फिर भी उनका टिकट काट दिया गया और उन्हें इसके लिए मना भी लिया गया. तभी तो आशुतोष तिवारी के नामांकन में ‘रोने’ के बावजूद वह घर-घर जाकर बीजेपी के लिए वोट मांगते दिखे थे.
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नरोत्तम मिश्रा की जगह पर लाए गए 45 साल के आशुतोष तिवारी को दतिया में जनरेशनल चेंज के तौर पर प्रोजेक्ट किया गया. चुनाव में बीजेपी ने ये दिखाने की कोशिश की कि उसने किसी दिग्गज राजनीतिक चेहरे को उतारने की बजाय पार्टी के एक मामूली पदाधिकारी पर भरोसा किया. लेकिन ये सारे प्रोजेक्शन उनके नामांकन में नरोत्तम मिश्रा की ‘भावुकता’ के सामने फेल हो गए. जानकार कह रहे हैं कि पूर्व मंत्री की भावनाओं ने राजनीतिक संकेत का रूप धरकर नतीजों में अपनी छाप छोड़ दी और दतिया की सीट बीजेपी के हाथ से दूसरी बार फिसल गई.
घनश्याम सिंह कौन हैं?लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि कांग्रेस के घनश्याम सिंह का चुनाव जीतना कोई अचानक हुई घटना या राजनीतिक चमत्कार है. स्थानीय तौर पर वो एक जाने-माने नेता हैं. उनका इलाके में पुराना पॉलिटिकल नेटवर्क है. दतिया के पूर्व शाही परिवार से उनके संबंध हैं. घनश्याम सिंह पहली बार 1993 में दतिया से विधायक बने थे. फिर 2003 में भी इसी सीट से जीते. बाद में सेवड़ा विधानसभा सीट से भी विधायकी की कुर्सी संभाली. अब फिर से उपचुनाव में ही सही, लेकिन घनश्याम सिंह की दतिया की सत्ता पर वापसी हो गई है.
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