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आपके इलाके में क्राइम कम करने का 'ट्रंप कार्ड' मिल गया, पुलिस नहीं, SBI ने बताया है

SBI Report on Crime Rate: भारत के सबसे बड़े सरकारी बैंक ने देश में अपराध कम करने तरकीब खोज निकाली है. SBI की एक स्टडी रिपोर्ट बताती है कि देश के जिन शहरों ने सीसीटीवी और इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस में निवेश किया, वहां क्राइम कंट्रोल हुआ है.

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क्राइम रेट पर स्टेट बैंक की रिपोर्ट (फोटो- आजतक)

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  • भारतीय स्टेट बैंक (SBI) ने 28 शहरों में की गई स्टडी में पाया कि डिजिटल तकनीक और सीसीटीवी निगरानी के बजट में 1% की वृद्धि से अपराध दर में 0.36% की कमी आई है।
  • देश में अपराध दर में गिरावट के पीछे डिजिटल निगरानी, सीसीटीवी कैमरे और स्मार्ट सिटी मिशन के तहत कमांड सेंटर की भूमिका प्रमुख है, जबकि साइबर अपराध में तेजी से वृद्धि दर्ज हुई है।
  • SBI की रिपोर्ट के अनुसार अपराध दर में गिरावट आर्थिक विकास को बढ़ावा देती है, जिससे शॉर्ट-टर्म में जीडीपी ग्रोथ में 0.11% तक का इजाफा होता है।

डॉन की तलाश में जुटी 11 मुल्कों की पुलिस भी जो ना कर पाई, वो काम स्टेट बैंक ऑफ इंडिया यानी SBI ने कर दिखाया है. वो भी बिना किसी ‘जंगली बिल्ली’ के. नहीं-नहीं डॉन पकड़ में नहीं आया है. मगर एसबीआई वालों ने आपके इलाके का क्राइम रेट कम करने की निंजा टेक्निक खोज निकाली है. जी हां, अपने ओरिजनल काम यानी बैंकिंग में भले ही उसके कस्टमर लेट-लतीफी और खराब सर्विस की शिकायतें कर रहे हों. लेकिन भारत के इस सबसे बड़े सरकारी बैंक ने पुलिसवालों के लिए वो खास फॉर्मूला तैयार कर दिया है. जिसे अपनाकर क्राइम रेट कम किया जा सकता है. (कम से कम दावा तो यही है!)

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हमारी बातें पढ़कर जितना आप कंफ्यूजियाए हैं, उतना ही हमें भी झटका लगा था, मगर फिर हमने समाचार एजेंसी एएनआई की एक रिपोर्ट पढ़ ली. इस खबर के मुताबिक भारतीय स्टेट बैंक (SBI) देश के 28 शहरों में एक स्टडी कराई. और इस स्टडी से जो ‘मॉरल ऑफ स्टोरी’ निकल कर आई, वो ये थी कि,

जहां-जहां डिजिटल तकनीक और कड़ी निगरानी रखने (बोले तो CCTV वगैरह) का बजट एक फीसदी बढ़ाया गया, वहां क्राइम रेट में 0.36 फीसदी की कमी देखने को मिली.

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सिर्फ इतना ही नहीं एसबीआई की स्टडी बताती है कि देशभर में पारंपरिक और गंभीर अपराधों में करीब 6 फीसदी की कमी आई है. वहीं दूसरी तरफ साइबर क्राइम का खतरा तेजी से बढ़ा है. इसके मामले एक लाख के पार चले गए हैं.

सीसीटीवी की नजर और घटता अपराध

समाचार एजेंसी ANI ने SBI की इस रिसर्च रिपोर्ट के हवाले से बताया है कि, 

साल 2024 में देश के भीतर कुल 58.86 लाख संज्ञेय (cognizable) अपराध दर्ज किए गए, जो पिछले साल के मुकाबले 6 फीसदी कम हैं. इसी के साथ प्रति लाख आबादी पर अपराध दर भी 448.3 से घटकर 418.9 पर आ गई है.

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रिपोर्ट कहती है कि इस गिरावट के पीछे सबसे बड़ा हाथ डिजिटलीकरण, सीसीटीवी कैमरों और मजबूत सर्विलांस का है. यूपीआई (UPI), फास्टैग (FASTag) और डिजिटल ट्रैकिंग की वजह से अब अपराधियों के पकड़े जाने का जोखिम बहुत ज्यादा बढ़ गया है. देश के जिन इलाकों में सीसीटीवी कैमरों का जाल मजबूत है, वहां अपराधों में साफ कमी देखी गई है. 

रिपोर्ट के मुताबिक स्मार्ट सिटी मिशन के तहत सभी 100 स्मार्ट शहरों में 'इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर' काम कर रहे हैं, जहां 84,000 से ज्यादा सीसीटीवी कैमरे, 1,884 इमरजेंसी कॉल बॉक्स और 3,000 से अधिक पब्लिक एड्रेस सिस्टम रीयल-टाइम मॉनिटरिंग कर रहे हैं.

ये बात और है कि एसबीआई के कुछ ‘फूफा टाइप’ शिकायती ग्राहकों की तरह कई पुलिस वाले भी पूरी तरह से SBI की रिपोर्ट को सही नहीं मानते. पूर्व आईपीएस अधिकारी और यूपी में एक सिक्योरिटी फर्म चलाने वाले हृदयनाथ श्रीवास्तव कहते हैं,

अगर सिर्फ सीसीटीवी से क्राइम कंट्रोल हो जाता तो लंदन को पूरी तरह से क्राइम फ्री हो जाना चाहिए था. क्योंकि लंदन में शायद ही कोई ऐसा कोना हो, जहां सीसीटीवी कैमरे नहीं लगे हों.

हालांकि पूर्व आईपीएस हृदयनाथ श्रीवास्तव ये तो मानते हैं कि टेक्नॉलजी में निवेश से पुलिस को क्राइम इनवेस्टिगेशन में मदद मिलती है और क्रिमिनल तक पहुंचना कुछ आसान हो जाता है. 

कम अपराध यानी बेहतर अर्थव्यवस्था

इस रिपोर्ट ने अपराध और देश की आर्थिक तरक्की (GDP) के बीच एक सीधा और अनोखा संबंध भी दिखाया है. रिपोर्ट के मुताबिक, जब अपराध बढ़ते हैं तो सुरक्षा का खर्च, अनिश्चितता और व्यापारिक लागत बढ़ जाती है, जिससे निवेश पीछे हट जाता है. SBI रिपोर्ट के आंकड़े साफ बताते हैं कि

प्रति लाख आबादी पर अपराध दर में महज 1% की गिरावट भी शॉर्ट-रन में वास्तविक जीडीपी ग्रोथ को लगभग 0.11% तक बढ़ा देती है. यानी अपराध मुक्त समाज सीधे तौर पर देश को आर्थिक मुनाफा पहुंचाता है.

महिला सुरक्षा: सिर्फ कानून नहीं, वर्कफोर्स का भी मुद्दा

महिला सुरक्षा को लेकर भी रिपोर्ट में कुछ अहम बातें कही गई हैं. साल 2023 के 4.48 लाख मामलों के मुकाबले 2024 में महिलाओं के खिलाफ अपराध 1.5 फीसदी घटकर 4.41 लाख हुए हैं. .ये बात और है कि देश में आपराधिक वारदातों की तादाद को देखते हुए, ये कमी अभी भी ऊंट के मुंह में जीरे जैसी लगती है है. 

NCRB रिपोर्ट 2024 के आंकड़ों के मुताबिक, पति या रिश्तेदारों की क्रूरता के ही 1.20 लाख से ज्यादा मामले दर्ज हुए हैं. वहीं NFHS-5 के सर्वे को आधार बनाएं तो करीब 6.69 करोड़ महिलाएं किसी न किसी रूप में घरेलू हिंसा का शिकार हैं.

SBI की रिपोर्ट में जोर देकर कहा गया है कि महिलाओं के खिलाफ होने वाला अपराध केवल कानून-व्यवस्था से जुड़ा मामला नहीं है. ये महिलाओं को नौकरी या काम पर जाने से रोकता है. इसलिए महिला सुरक्षा देश की लेबर मार्केट पॉलिसी का एक बेहद जरूरी हिस्सा है, ताकि देश की आधी आबादी बिना किसी डर के आर्थिक गतिविधियों में योगदान दे सके.

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