भारत के फेफड़े कहे जाने वाले जंगल के 4.48 लाख पेड़ कटेंगे? सरकारी कंपनी ने दिया प्रस्ताव
राजस्थान राज्य बिजली उत्पादन निगम लिमिटेड (RVUNL) ने हसदेव-अरंड जंगल में 4 लाख से ज़्यादा पेड़ काटने का प्रस्ताव रखा है. हसदेव, छत्तीसगढ़ में स्थित 1.75 हेक्टेयर में फैला वन क्षेत्र है जिसे ‘लंग्स ऑफ़ सेंट्रल इंडिया’ भी कहा जाता है.

राजस्थान राज्य बिजली उत्पादन निगम लिमिटेड (RVUNL) ने हसदेव-अरंड जंगल में 4.48 लाख से ज़्यादा पेड़ काटने का प्रस्ताव रखा है. हसदेव, छत्तीसगढ़ में स्थित 1.75 हेक्टेयर में फैला वन क्षेत्र है जिसे ‘लंग्स ऑफ़ सेंट्रल इंडिया’ भी कहा जाता है. RVUNL ने सरगुजा जिले में स्थित अपने केंटे एक्सटेंशन कोयला खदान (Kente Extension coal mine) के लिए ये प्रस्ताव रखा है. ये वनक्षेत्र पहले भी कोयले के खदानों के चलते विवादों में रहा है. ‘छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन’ संगठन ने इसपर आपत्ति जताई है.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट बताती है कि, साल 2015 में भी RVUNL को अपने छाबड़ा और सूरतगढ़ कोल माइन प्लांट्स में कोयले की माइनिंग के लिए ‘कोयला ब्लॉक’ यानी कोल रिज़र्व आवंटित किया गया था. अडानी समूह इस कोयला खदान का ऑपरेटर और डेवलपर है. RVUNL ने अब 1,742.6 हेक्टेयर वन क्षेत्र का इस्तेमाल करने का नया प्रस्ताव रखा है. बताया गया कि जो पेड़ काटे जाएंगे उसके बदले राज्य के दूसरे हिस्से में पेड़ लगाए जाएंगे. शुक्रवार को पर्यावरण मंत्रालय की फॉरेस्ट एडवाइजरी कमिटी (FAC) इस प्रस्ताव का मूल्यांकन करेगी.
इस क्षेत्र में पहले से ही दो खदान चालू हैं- परसा और परसा ईस्ट केंट बासन. जहां ये खदान हैं वो कभी प्रतिबंधित क्षेत्र हुआ करता था. केंद्र को भेजे गए एक पत्र में, RVUNL ने खदान के लिए इस नए वन क्षेत्र की कटाई को उचित ठहराया है. उनका दावा है कि केंटे एक्सटेंशन ब्लॉक प्रोजेक्ट के लिए और कोयले की ज़रूरत है. इसी प्रस्ताव के खिलाफ छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के आदिवासी सदस्यों ने फॉरेस्ट एडवाइजरी कमिटी में अपनी शिकायत दर्ज कराई है.
हसदेव इकोसिस्टमछत्तीसगढ़ के कोरबा, सरगुजा और सूरजपुर जिलों में फैले हसदेव-अरंड वन क्षेत्र का क्षेत्रफल 1.7-1.75 लाख हेक्टेयर है. यहां घने साल के जंगलों में तेंदुए, भालू और हाथी सहित नौ अनुसूचित-प्रजातियां पाई जाती हैं. यह हसदेव नदी और बंगो बांध का जलग्रहण क्षेत्र होने के साथ-साथ बाघों के लिए ‘हैबिटैट स्विच’ करने का एक सुरक्षित रास्ता भी है. आदिवासी समुदायों के लिए ये जंगल महत्वपूर्ण संसाधन माने जाते हैं. इन्हीं जंगलों से उनका गुज़र-बसर होता है.
नियम क्या कहते हैं?RVUNL द्वारा मंत्रालय को प्रस्तुत किए गए प्रस्तावों में 3,236.08 हेक्टेयर क्षेत्र में 'compensatory afforestation' (पेड़ काटने के बदले पेड़ लगाना) का वादा किया गया है. ये पेड़ वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980 के तहत लगाए जाते हैं.
इसके मुताबिक, वनों की हानि की भरपाई के लिए गैर-वन भूमि को पहली प्राथमिकता दी जाती है. और नए पेड़ लगाने के लिए अन्य प्रकार की भूमि के उपयोग को उचित ठहराया जाना जरूरी है. इसके अलावा, गैर-वन भूमि अगर मौजूद न हो तो राजस्व वन भूमि पर नए पेड़ लगाए जा सकते हैं. ये वैसे जंगल होते हैं जो रिकॉर्ड में तो दर्ज होते हैं, लेकिन फॉरेस्ट डिपार्टमेंट द्वारा मैनेज नहीं किए जाते हैं. द इंडियन एक्सप्रेस को दिए गए जवाब में RVUNL का कहना है कि ये प्रस्ताव वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980 के तहत ही रखे गए हैं.
वीडियो: पेड़ कटाई पर पर्यावरण मंत्रालय की रिपोर्ट, आंकड़ें बेहद चौंकाने वाले हैं!

