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सबरीमाला पर सुनवाई, सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने गिना दिए 'पुरुषों के लिए बैन' मंदिर

Men entry restricted in temples: धार्मिक स्थल पर भेदभाव से जुड़ी याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रही है. इस बीच सोलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कई ऐसे मंदिरों का जिक्र किया, जहां पुरुषों को एंट्री नहीं दी जाती है. उनके लिए नियम सख्त हैं.

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कई मंदिरों में पुरुषों को प्रवेश की अनुमति नहीं दी जाती है. (फोटो-इंडिया टुडे)

सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले कथित भेदभाव से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है. इसमें केरल का सबरीमाला मंदिर भी शामिल है. साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की बेंच ने मंदिर में महिला श्रद्धालुओं पर लगी उम्र की पाबंदी हटाने का फैसला सुनाया था. साथ ही केरल हिंदू सार्वजनिक पूजा स्थल नियम, 1965 के नियम 3(b) को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द किया था. यह नियम रीति-रिवाजों के आधार पर महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगाने की अनुमति देता था. लेकिन इसके बाद पुनर्विचार याचिका दायर की गई.

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अब इन मामलों पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की तरफ से सॉलीसिटर जनरल तुषार मेहता ने जजों के सामने अपना पक्ष रखा. तर्क दिया कि हिंदू धर्म न सिर्फ महिलाओं को पुरुषों के बराबर मानता है, बल्कि उन्हें पुरुषों से कहीं ऊंचे दर्जे पर भी रखता है. उन्होंने कहा कि ये हिंदू धर्म ही है जिसमें हमेशा से 'वुमनहुड' की पूजा की अवधारणा रही है. यहां तक कि प्रीहिस्टोरिक टाइम में भी. हिंदू धर्म में देवियों की न केवल पूजा की जाती है, बल्कि पुरुष उनके चरण स्पर्श करते हैं. और पवित्र 'मातृ देवियों' के भक्त बन जाते हैं.

NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक, अपनी दलील में उन्होंने ऐसे कुछ मंदिरों का भी जिक्र किया, जहां पुरुषों का प्रवेश वर्जित है. इनमें से एक जगह ऐसी है, जहां पुरुष देवी का आशीर्वाद पाने के लिए महिलाओं जैसे कपड़े पहनते हैं. तुषार मेहता ने ऐसे 6 मंदिरों का जिक्र किया और कहा कि लिंग के आधार पर प्रवेश की अनुमति देना 'लिंग-भेदभाव' का पहलू नहीं है. बल्कि ये धार्मिक रीति-रिवाजों, आस्था और विश्वास का एक हिस्सा है, जो न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर है. 

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सॉलीसिटर जनरल तुषार मेहता ने जिन मंदिरों का जिक्र किया है, उनमें ये मंदिर शामिल हैंः

अट्टुकल भगवती मंदिर, केरल- .यह मंदिर किसी धार्मिक कार्यक्रम के लिए महिलाओं के सबसे बड़े जमावड़े के तौर पर गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में अपना नाम दर्ज करवा चुका है. पोंगल के मुख्य दिन पुरुषों को मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं होती.

चक्कूलाथूकावु मंदिर, केरल-  चक्कूलाथूकावु मंदिर में देवी भगवती की पूजा की जाती है. यहां हर साल 'नारी पूजा' नाम का एक अनुष्ठान होता है, जिसमें पुरुष पुजारी 10 दिनों तक उपवास रखने वाली महिला भक्तों के पैर धोते हैं. 'नारी पूजा' के दौरान मंदिर में सिर्फ महिलाओं को ही प्रवेश की अनुमति होती है.

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ब्रह्मा मंदिर, पुष्कर- ब्रह्मा मंदिर का निर्माण  14वीं शताब्दी में हुआ था. ऐसा माना जाता है कि जो विवाहित पुरुष इस मंदिर में जाकर भगवान ब्रह्मा की नजदीक से पूजा करते हैं. उनके वैवाहिक जीवन में परेशानियां आ सकती हैं. परंपरा की मानें तो शादीशुदा पुरुष मंदिर के गर्भगृह में नहीं जा सकते.

भगवती अम्मन मंदिर, कन्याकुमारी- इस मंदिर में देवी कन्या कुमारी की पूजा की जाती है. देवी को 'संन्यास की देवी' के रूप में भी जाना जाता है. मंदिर में सिर्फ अविवाहित पुरुषों को ही मुख्य द्वार तक जाने की अनुमति है जबकि विवाहित पुरुषों का मंदिर परिसर में प्रवेश पूरी तरह से वर्जित है.

माता मंदिर, बिहार- मुजफ्फरपुर में स्थित इस मंदिर में एक विशेष  समय अवधि के दौरान पुरुषों का प्रवेश पूरी तरह से प्रतिबंधित रहता है. यहां तक कि इस बीच किसी पुरुष पुजारी को भी मंदिर परिसर में प्रवेश करने की अनुमति नहीं होती.  

कोट्टनकुलंगरा श्री देवी मंदिर, केरल- इस मंदिर में एक अनोखी परंपरा है, जिसे 'चमयविलक्कू' कहा जाता है. इस परंपरा में पुरुष महिलाओं की वेशभूषा धारण कर देवी का आशीर्वाद लेते हैं. इस मंदिर में एक और प्रथा भी प्रचलित है, जिसके मुताबिक, 10 साल से कम आयु के लड़के-लड़कियों की तरह वेशभूषा धारण करते हैं.

कामाख्या मंदिर, असम- मंदिर में 'अंबुबाची' पर्व के दौरान पुरुषों का प्रवेश वर्जित रहता है. मान्यता है कि इस समय देवी अपने वार्षिक मासिक धर्म से गुजर रही होती हैं. इस खास अवधि में मंदिर की सेवा-पूजा का काम सिर्फ महिला पुजारी ही करती हैं.

सॉलीसिटर जनरल ने तर्क दिया कि सेक्युलर अदालत किसी धार्मिक प्रथा को सिर्फ अंधविश्वास नहीं कह सकती. क्योंकि उनके पास ऐसा करने की विशेषज्ञता नहीं होती. हमारा समाज विविधतापूर्ण है. यहां अलग-अलग धर्म के लोग हैं. उनकी मान्यताएं भी अलग हैं. 

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