‘अगर बिहार में आपके पैर में फ्रैक्चर होता है, तो प्लास्टर की जगह कार्टन (गत्ता) लग सकता है.’ क्योंकि, बिहार के एक सरकारी अस्पताल में यही ट्रीटमेंट एक मरीज को दिया गया है. मामला बेगूसराय का है. यहां दुर्घटना में एक शख्स का पैर फ्रैक्चर हो गया. उसे अनुमंडलीय अस्पताल पहुंचाया गया. वहां डॉक्टर ने गजब ट्रीटमेंट किया. फ्रैक्चर हुए पैर पर प्लास्टर लगाने की जगह गत्ते लगा दिए.
फ्रैक्चर्ड पैर का इलाज कराने आया युवक, डॉक्टरों ने गत्ता लगा दिया, फिर वही हुआ जो होना था
घायल दर्द से कराह रहा था. जब वो सरकारी अस्पताल पहुंचा तो वहां डॉक्टरों ने बताया कि पैर का ऑपरेशन करना पड़ेगा. उसमें भी करीब 10 दिन का समय लगेगा. लेकिन कोई शख्स 10 दिन तक फ्रैक्चर का दर्द कैसे सह सकता है?

बाद में घायल को सदर अस्पताल रेफर कर दिया गया. हालांकि, अनुमंडलीय अस्पताल के एक प्रभारी ने बताया कि किसी फ्रैक्चर हड्डी को ऐसे इमोबिलाइज्ड (हलचल से रोकना) किया जा सकता है.
घायल दर्द से कराह रहा था. जब वो सरकारी अस्पताल पहुंचा तो वहां डॉक्टरों ने बताया कि पैर का ऑपरेशन करना पड़ेगा. उसमें भी करीब 10 दिन का समय लगेगा. लेकिन कोई शख्स 10 दिन तक फ्रैक्चर का दर्द कैसे सह सकता है? फिर वही हुआ जो आप सोच रहे हैं. घायल सरकारी अस्पताल से प्राइवेट अस्पताल गया और अपना इलाज कराया. अब इस पूरे मामले पर घायल कृष्ण कुमार का बयान आया है.
इंडिया टुडे से जुड़े सौरभ कुमार की रिपोर्ट के मुताबिक, कृष्ण कुमार ने बताया कि वह अपने भाई के साथ गढ़पुरा से अपने घर महेशवाड़ा गांव लौट रहे थे. हरसाइन पुल के पास उन्हें एक गाड़ी ने टक्कर मार दी. इस टक्कर में उनके पैर में चोट लगी. करीब 15 से 20 मिनट वो वहीं सड़क पर पड़े रहे. सूचना मिलने पर घटनास्थल पर पुलिस पहुंची और घायल को मंझौल अनुमंडल अस्पताल पहुंचाया.
अस्पताल में पता चला कि पैर में फ्रैक्चर है. सो इलाज शुरू हुआ. कथित तौर पर इलाज में एक बॉटल स्लाइन चढ़ाया गया. फ्रैक्चर हुए पैर में प्लास्टर की जगह कागज के गत्ते बांधकर बेगूसराय सदर अस्पताल रेफर कर दिया गया.
कृष्ण बताते हैं कि सदर अस्पताल में प्राथमिक इलाज के बाद उन्हें बताया गया कि पैर का ऑपरेशन होगा, लेकिन उसमें भी हफ्ता-दस दिन लगेगा. उन्होंने आगे बताया कि दर्द बहुत ज्यादा था और वो उसे सह नहीं पा रहे थे. इसलिए प्राइवेट अस्पताल जाकर इलाज कराना पड़ा.
अब सरकारी मेडिकल स्टाफ का भी पक्ष जान लीजिए. अनुमंडलीय अस्पताल के एक प्रभारी ने कहा,
‘जब हड्डी का कोई पार्ट फ्रैक्चर करता है, तो वह इंटरनल इंजरी होती है. इंजरी के बाद हुए नुकसान को रोकने के लिए टूटे हुए पार्ट को इमोबिलाइज्ड करना होता है. तो इसके लिए हम लोग कच्चा प्लास्टर डालते हैं. अगर उसकी व्यवस्था नहीं है, तो वह स्प्लिंट डालकर हायर सेंटर इलाज के लिए भेज देते हैं.’
प्रभारी ने आगे बताया कि अस्पताल में हड्डी के डॉक्टर नहीं हैं और ड्रेसर की भी कमी है. इसलिए जो डॉक्टर मौजूद थे उन्होंने स्प्लिंट डालकर सदर अस्पताल रेफर कर दिया.
सदर अस्पताल के सिविल सर्जन डॉ अशोक कुमार का भी बयान आया है. उन्होंने कहा,
‘मामले की जांच करके कार्रवाई की जाएगी. लाइफ सेविंग में कोई भी काम जायज होता है. तो मान लेते हैं कि तत्काल रेफरल की व्यवस्था है और मरीज दर्द से छटपटा रहा है. तो जो भी सामने नजर आता है, उससे उसका इमोबिलाइजेशन किया जाता है.’
सिविल सर्जन ने बताया कि इमोबिलाइजेशन के लिए कोई भी वस्तु निर्धारित नहीं है. अगर इसे प्लांड तरीके से किया जाए, तो प्लास्टर एंड पेरिस से ही किया जाता है. लेकिन बिहार में सरकारी अस्पतालों की ऐसी हालत स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़ा करती है.
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