5 अगस्त 2019 को जब केंद्र सरकार ने संसद में जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 और 35A को खत्म करने का ऐतिहासिक फैसला लिया था, तब देश से लेकर दुनिया भर की निगाहें इसी घाटी पर टिकी थीं. सरकार का तर्क था कि इस एक फैसले से आतंकवाद की कमर टूट जाएगी, विकास की बयार बहेगी और आम कश्मीरी की ज़िंदगी बदल जाएगी. आज 5 अगस्त 2026 है और इस फैसले को पूरे 7 साल बीत चुके हैं.
कश्मीर से धारा 370 हटने के 7 साल बाद ज़मीन पर असल में क्या बदला है?
Article 370 Abrogation Impact: 5 अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर से धारा 370 को हटाया गया था. आज 7 सालों बाद सरकारी दावों की मानें तो सिक्योरिटी से लेकर आर्थिक निवेश तक और टूरिज्म से लेकर हेल्थ तक सूबे में सब चंगा है. मगर क्या स्थानीय लोग इस सरकारी दावों से सहमत हैं?

इन सात सालों में सियासत ने कई करवटें लीं. चुनाव हुए, नई सरकारें बनीं और सुरक्षा के मोर्चे पर भी तस्वीर बदली. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल ये है कि कागजी दावों और सरकारी फाइलों से निकलकर ज़मीन पर असल में क्या बदला है. क्या वाकई वो पुराने दिन पीछे छूट चुके हैं या फिर कश्मीर की फिज़ा में आज भी कुछ अनकहे सवाल बाकी हैं.
क्या वाकई थम गए विरोध के स्वर?
अगर आप 2019 से पहले के कश्मीर को याद करें, तो जुमे की नमाज़ के बाद लाल चौक या नौहट्टा के इलाकों से पत्थरबाज़ी की तस्वीरें आम थीं. स्कूल-कॉलेज महीनों बंद रहते थे और हुर्रियत के एक बंद के आह्वान पर पूरी घाटी थम जाती थी. पिछले 7 सालों में इन तस्वीरों में नाटकीय बदलाव आया है. गृह मंत्रालय (MHA) के आंकड़ों के मुताबिक, घाटी में कानून-व्यवस्था को चुनौती देने वाली हिंसा और पथराव की घटनाओं में 90 प्रतिशत से ज्यादा की कमी दर्ज की गई है.
अब वो चौराहे सूने नहीं रहते जहां कभी टायर जलाए जाते थे, बल्कि वहां ट्रैफिक सिग्नल और देर रात तक खुली रहने वाली दुकानें दिखती हैं. हालांकि, जानकारों का मानना है कि ये शांति प्रशासनिक सख्ती और सुरक्षा बलों की भारी तैनाती का नतीजा है, जिसके अपने मनोवैज्ञानिक पहलू भी हैं.
सैलानियों से गुलज़ार हुई घाटी
कश्मीर की अर्थव्यवस्था रीढ़ यानी पर्यटन सेक्टर के लिए पिछले 7 साल किसी टर्निंग पॉइंट से कम नहीं रहे हैं. कभी जिन इलाकों में पर्यटकों के जाने पर पाबंदी थी या डर का माहौल था, वहां आज देश-विदेश से आने वाले सैलानियों का तांता लगा हुआ है. जम्मू-कश्मीर पर्यटन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, साल 2023 से लेकर 2025-26 के बीच घाटी में आने वाले पर्यटकों का आंकड़ा सालाना दो करोड़ के पार पहुंच चुका है, जो पिछले कई दशकों में सबसे ज्यादा है.
श्रीनगर के मशहूर डल झील में शिकारा चलाने वालों से लेकर गुलमर्ग और पहलगाम के होटल कारोबारियों तक, हर कोई इस बूम से खुश है. दशकों बाद बंद पड़े सिनेमा हॉल दोबारा खुले हैं और युवाओं के लिए नाइटलाइफ़ का कल्चर भी पहली बार बड़े पैमाने पर शुरू हुआ है.
ज़मीनी हक़ीक़त और लोकल अर्थव्यवस्था
आर्टिकल 370 हटने के बाद सबसे बड़ा बदलाव ज़मीन खरीदने और बाहरी निवेश को लेकर आया था. सरकार का दावा था कि इससे बड़े पैमाने पर औद्योगिक निवेश आएगा और स्थानीय युवाओं को बंपर नौकरियां मिलेंगी. जम्मू-कश्मीर प्रशासन के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले कुछ सालों में देश के बड़े औद्योगिक समूहों ने घाटी में निवेश के लिए प्रस्ताव दिए हैं और कई प्रोजेक्ट्स ज़मीन पर उतरे भी हैं.
इसके अलावा, रियायतें खत्म होने के बाद अब देश का कोई भी नागरिक वहां ज़मीन खरीद सकता है, हालांकि स्थानीय लोगों के बीच इस बात को लेकर अपनी ज़मीनों की डेमोग्राफी और पहचान खोने का एक हल्का डर हमेशा बना रहा है. रोज़गार के मोर्चे पर सरकारी नौकरियों की प्रक्रिया में पारदर्शिता तो आई है, लेकिन प्राइवेट सेक्टर उस गति से नहीं फैल पाया जिसकी उम्मीद की जा रही थी.
कश्मीर की गलियों से उठती दूसरी आवाज़ें
एक तरफ जहां दिल्ली और श्रीनगर के सचिवालय से विकास और शांति के शानदार आंकड़े पेश किए जाते हैं, वहीं स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स और ज़मीन पर काम करने वाले पत्रकारों का नज़रिया थोड़ा अलग तस्वीर दिखाता है. लोकल सोर्सेज का कहना है कि भले ही हिंसा कम हुई है और टूरिज़्म बढ़ा है, लेकिन आम आदमी की जेब पर महंगाई का बोझ और बेरोज़गारी की समस्या अभी भी गंभीर बनी हुई है.
किसी दौर में हुर्रियत कॉन्फ्रेंस से जुड़े रहे और अब पत्रकारिता कर रहे यासिर (बदला हुआ नाम) ने लल्लनटॉप को फोन पर बताया,
राज्य की सरकारी नौकरियों के लिए पहले स्थानीय युवा ही आवेदन कर सकते थे. लेकिन अब हालात बदल गए हैं. राज्य की सरकारी नौकरियां सबके लिए खुल गई हैं. स्थानीय युवाओं को पूरे देश के युवाओं के साथ कॉम्पिटीशन करना पड़ा रहा है. लिहाजा राज्य सरकार की नौकरियों में लोकल नुमाइंदगी कम होती जा रही है.
बात सिर्फ नौकरियों तक ही सीमित नहीं है. सूबे के व्यापारी भी कुछ खास खुश नहीं हैं. कई छोटे कारोबारियों का दर्द ये है कि बड़े कॉर्पोरेट्स और बाहरी व्यापारियों के आने से स्थानीय स्तर पर छोटे वेंडर्स का मुनाफा कम हुआ है.
जम्मू-कश्मीर बैंक पर आरबीआई के कड़े नियम (जो कि देशभर के बैंकों पर पहले से ही लागू हैं) भी राज्य के लोगों को परेशान कर रहे हैं. हुर्रियत कॉन्फ्रेंस से जुड़े रहे और अब पत्रकारिता कर रहे यासिर (बदला हुआ नाम) कहते हैं,
पहले जम्मू एंड कश्मीर बैंक (J&K Bank) से बेहद सस्ते ब्याज दर पर लोन मिलता था और किश्त ना भरने की सूरत में रिकवरी का दबाव भी नहीं था. मगर अब हालात बदल चुके हैं. लिहाजा काफी लोगों को असुविधा भी हो रही है.
हालांकि सरकारी सूत्रों की मानें तो पहले की तुलना में अब बैंक के पैसों का मिसयूज पूरी तरह बंद हो गया है. बावजूद इसके जिन्हें असुविधा हो रही है, वो तो अपनी बात कहेंगे ही.
इसके अलावा, पिछले कुछ सालों में सुरक्षा के नाम पर जिस तरह की पाबंदियां और विधिक गिरफ्तारियां हुई हैं, उसने लोगों के मन में एक अनकहा डर पैदा कर दिया है, जिसे खुलकर कोई ज़ुबान नहीं देना चाहता.
उम्मीदों और आशंकाओं के बीच झूलता कश्मीर
इन 7 सालों का लेखा-जोखा निकाला जाए तो तस्वीर दोतरफा नज़र आती है. एक तरफ आधुनिक बुनियादी ढांचा, वंदे भारत ट्रेन की शुरुआत, हाइवे का जाल, सड़कों पर दौड़ती गाड़ियां और रिकॉर्डतोड़ सैलानी हैं, जो एक नए और बदलते कश्मीर की गवाही देते हैं. दूसरी तरफ, स्थानीय राजनीतिक नुमाइंदगी की कमी, पूर्ण राज्य के दर्जे की बहाली का इंतज़ार और सुरक्षा बलों की साये में जी रही आम जनता के मन में भविष्य को लेकर कई सवाल हैं.
ये भी पढ़ें: कैसे खत्म हुआ था 'अनुच्छेद 370', जिसने जम्मू-कश्मीर में बांध दिए थे भारतीय संविधान के हाथ
आर्टिकल 370 का हटना भारत के राजनीतिक इतिहास का एक बड़ा मील का पत्थर है, लेकिन इस फैसले के बाद कश्मीरी अवाम के दिलों की दूरी कितनी कम हुई है और भरोसे की दीवार कितनी मज़बूत हुई है, ये आने वाला वक्त ही तय करेगा.
वीडियो: जमघट: उमर अब्दुल्ला ने J&K, पाकिस्तान, आर्टिकल 370, बीजेपी, सत्यपाल मलिक पर क्या खुलासे किए?













