लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी (Rahul Gandhi) ने सैनिक स्कूलों (Sainik School) को लेकर बड़ा आरोप लगाया है. नेता विपक्ष का आरोप है कि नए सैनिक स्कूलों को आरएसएस (RSS) से जुड़े संस्थानों को सौंपा जा रहा है. उन्होंने यह भी आरोप लगाया है कि सैनिक स्कूलों का निजीकरण किया जा रहा है. साथ ही, उनका प्रबंधन भी आरएसएस से जुड़े संगठनों को सौंपा गया है. लेकिन रक्षा सूत्रों ने राहुल गांधी के इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया है.
राहुल गांधी का आरोप- 'RSS के लोग चला रहे हैं सैनिक स्कूल', सरकार ने बताया सच
लोकसभा में मानसून सत्र के दौरान नेता विपक्ष राहुल गांधी ने सैनिक स्कूलों को लेकर बड़ा आरोप लगाया है. उन्होंने दावा किया था कि नए सैनिक स्कूलों के संचालन का जिम्मा RSS को सौंपा जा रहा है. हालांकि, रक्षा मंत्रालय से जुड़े सूत्रों ने इससे इनकार किया है.

सूत्रों ने इंडिया टुडे को बताया कि सैनिक स्कूलों की व्यवस्था पूरी से तरह पारदर्शी है. उनका कहना है पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल के तहत होने वाली चयन प्रक्रिया है. इसमें जांच की कई परतें शामिल होती हैं. यह स्पष्टीकरण तब आया है जब रक्षा पर संसदीय स्थायी समिति (Parliamentary Standing Committee on Defence) की बैठक के दौरान तीखी नोकझोंक हुई थी. इस मामले पर एक विश्वस्त सूत्र ने इंडिया टुडे को बताया,
PPP मॉडल के तहत नए सैनिक स्कूलों के चयन की प्रक्रिया काफी पारदर्शी है.
सूत्रों के मुताबिक, बीजेपी के एक सांसद ने इस आरोप का कड़ा विरोध किया है. उन्होंने राहुल गांधी से कहा कि इस आरोप को उन्हें कागजी सबूतों के साथ पेश करना चाहिए. वहीं, समिति के अध्यक्ष राधा मोहन सिंह ने कहा कि समिति से स्कूलों के मैनेजमेंट की जानकारी मांगेगी. साथ ही, वो कामकाज में निजी संस्थानों की भूमिका के बारे में भी सरकार से विस्तृत जानकारी मांगेगी.
कैसे खुल रहे नए सैनिक स्कूल?केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अक्टूबर 2021 में PPP मॉडल के तहत 100 नए सैनिक स्कूल खोलने को मंजूरी दी थी. इनमें से तीन चरणों में 86 स्कूलों को मंजूरी दी गई है. जबकि 79 स्कूल अभी भी चल रहे हैं. बाकी स्कूलों के लिए चौथे चरण के तहत आवेदन प्रोसेस किए जा रहे हैं. अब NGO, ट्रस्ट, सोसाइटी, प्राइवेट और सरकारी स्कूल, ग्रीनफील्ड या ब्राउनफील्ड कैटेगरी के तहत नया सैनिक स्कूल खोलने के लिए आवेदन कर सकते हैं.
आवेदन एक ऑनलाइन पोर्टल के जरिए जमा किए जाते हैं. सबसे पहले पांच यूनिफॉर्म यानी वर्दी वाले अधिकारियों वाली 'डॉक्यूमेंट्स स्क्रूटनी कमिटी' उनकी जांच करती है. पैनल देखता है कि आवेदन करने वाला जमीन, इंफ्रास्ट्रक्चर, खेल सुविधाओं और बाकी बुनियादी शर्तों को पूरा करता है या नहीं. जो स्कूल यह स्टेज पार कर लेते हैं, उनका निरीक्षण होता है. ये निरीक्षण 'स्कूल इवैल्यूएशन कमिटी' करती है. इस समिति में जिला मजिस्ट्रेट या कलेक्टर, जिले के नवोदय विद्यालय या केंद्रीय विद्यालय के प्रिंसिपल और नजदीकी सैनिक स्कूल के प्रिंसिपल शामिल होते हैं. समिति आवेदन करने वाले की सुविधाओं की पुष्टि करती है और अपनी रिपोर्ट सैनिक स्कूल्स सोसाइटी को सौंपती है.
इसके बाद रिपोर्ट की जांच एक मंजूरी समिति करती है. इसमें सैनिक स्कूल सोसाइटी के मानद सचिव, स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग के प्रतिनिधि और ब्रिगेडियर रैंक के अधिकारी समेत अन्य लोग शामिल होते हैं.
कैसे मिलता है अप्रूवल?रक्षा सूत्रों के मुताबिक शॉर्टलिस्टिंग के प्रोसेस में कई पॉइंट्स को ध्यान में रखा जाता है. इसमें भौगोलिक विस्तार, जिले की जनसंख्या का घनत्व और हर जिले में एक नया सैनिक स्कूल मंजूर करने के सिद्धांत शामिल हैं. ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट्स के मुकाबले मौजूदा ब्राउनफील्ड स्कूलों को प्राथमिकता दी जाती है. ब्राउनफील्ड आवेदकों में, बेहतर एकेडमिक रिकॉर्ड वाले स्कूलों को प्राथमिकता मिलती है. सूत्रों ने बताया कि इसमें प्राइवेट डे-स्कूलों के मुकाबले बोर्डिंग स्कूलों को भी प्राथमिकता दी जाती है.
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नए सैनिक स्कूल डे-स्कूल, रेजिडेंशियल स्कूल या डे-कम-बोर्डिंग संस्थानों के तौर पर चल सकते हैं. डे-स्कूलों के लिए कम से कम छह एकड़ जमीन की ज़रूरत होती है, जबकि रेजिडेंशियल स्कूलों के लिए कम से कम आठ एकड़ जमीन चाहिए. सूत्रों के मुताबिक इस स्कीम का मकसद यंग स्टूडेंट्स को जिम्मेदार नागरिक बनाना है. उन्होंने जोर देकर कहा कि कई चरणों वाली चयन प्रक्रिया राजनीतिक या वैचारिक जुड़ाव के बजाय निष्पक्ष है.
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