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सद्गुरु के मंच पर सेना के अफसर, वो भी वर्दी में, मचा हंगामा, पूर्व वायुसेना चीफ ने भी उठाए सवाल

Army Officers in Isha Foundation Ceremony Row: जग्गी वासुदेव के ईशा फाउंडेशन का कार्यक्रम. मंच पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह मौजूद थे. उनके साथ भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना के सीनियर अधिकारी भी कार्यक्रम में शामिल हुए. अब निजी कार्यक्रम में अधिकारियों के वर्दी में शामिल होने पर सेना के रिटायर्ड ऑफिसर्स ने सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि यह सेना के गैर-राजनितिक स्वभाव के खिलाफ है.

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रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के साथ सेना के कई अधिकारियों ने की कार्यक्रम में शिरकत. (Photo: X)

महाशिवरात्रि का मौका. जग्गी वासुदेव के ईशा फाउंडेशन का कार्यक्रम. मंच पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह मौजूद थे. उनके साथ भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना के सीनियर अधिकारी भी कार्यक्रम में शामिल हुए. अधिकारी सेना की फुल यूनिफॉर्म में थे. यही नहीं, कार्यक्रम में सेना को सम्मानित भी किया गया. अब इस पूरे कार्यक्रम पर विवाद शुरू हो गया है.

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सवाल उठाया जा रहा है कि सेना के अधिकारी निजी कार्यक्रम में यूनिफॉर्म के साथ कैसे शामिल हो सकते हैं. पूछा यह भी जा रहा है कि गैर आधिकारिक कार्यक्रम से इतर एक अध्यात्मिक मंच में सेना को पुरस्कार कैसे दिया जा सकता है. पूरे विवाद पर सेना के रिटायर्ड अधिकारियों ने भी सवाल उठाए हैं.

क्या है पूरा विवाद?

पहले जानते हैं पूरा मामला क्या है. द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक 15 फरवरी 2026 को ईशा फाउंडेशन की ओर से महाशिवरात्रि के मौके पर तमिलनाडु के कोयंबटूर में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया. जानकारी के मुताबिक यह कार्यक्रम ईशा फ़ाउंडेशन ने इसी साल शुरू किया है. इसका मकसद है साइंस, आर्ट्स, स्पोर्ट्स, कल्चर और राष्ट्रीय सेवा जैसे सेक्टर्स में योगदान देने वालों को पहचान देना है. सद्गुरु जग्गी वासुदेव ने इसे “राष्ट्रीय गौरव” से जोड़ते हुए कहा कि ये पुरस्कार हर साल दिए जाएंगे.

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कार्यक्रम में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी शामिल हुए. उन्होंने इस समारोह में ऑपरेशन सिंदूर में अहम रोल निभाने के लिए सेना को सम्मानित किया. रिपोर्ट के मुताबिक इसमें भारतीय सशस्त्र बलों की तीन प्रमुख ऑपरेशनल कमांड्स: वेस्टर्न एयर कमांड, सेना की सदर्न कमांड और वेस्टर्न नेवल कमांड को सम्मानित किया गया. इन कमांड्स की ओर से एयर मार्शल जीतेंद्र मिश्रा, लेफ़्टिनेंट जनरल ए.वी.एस. राठी और वाइस एडमिरल आर.वी. गोखले मंच पर मौजूद थे.

यहीं से विवाद शुरू होता है, क्योंकि यह कोई सरकारी या सैन्य परेड नहीं थी. यह एक प्राइवेट, धार्मिक इवेंट था, जिसकी अगुआई भी एक धार्मिक गुरु ही कर रहे थे सद्गुरु जग्गी वासुदेव. इस मंच पर डिफ़ेन्स पर्सनेल का अपनी वर्दी में मौजूद होना कई रिटायर्ड मिलिट्री ऑफ़िसर्स (वेटरन) को असहज कर गया. पूर्व एयरफोर्स चीफ रिटायर्ड मेजर जनरल बी.एस. धनोआ ने साफ कहा है कि मिलिट्री ऑफिसर्स निजी समारोहों में शामिल तो हो सकते हैं, लेकिन वर्दी में नहीं. वह कहते हैं,

अगर पुरस्कार लेना ही था, तो सिविल ड्रेस में लिया जा सकता था. प्राइवेट मंच पर यूनिफॉर्म पहनना सेना के गैर–राजनीतिक स्वभाव के खिलाफ जाता है.

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वहीं, रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल डी.एस. हूडा ने एक अहम बिंदु पर बात की. उन्होंने कहा,

जहां डिफेन्स मिनिस्टर मौजूद हों, वहां किसी सर्विंग ऑफिसर के लिए ना कहना प्रैक्टिकली पॉसिबल नहीं होता. लेकिन पॉलिटिकल लीडरशिप की ज़िम्मेदारी बनती है कि वर्दीधारी कर्मचारी वर्ग को ऐसे मंचों पर न बुलाया जाए, जहां उनकी प्रोफेशनल निष्पक्षता पर सवाल खड़े हों.

सम्मानित किए जाने पर भी सवाल

ऐसा भी नहीं है कि वेटरन्स की नाराजगी सिर्फ यूनिफॉर्म तक ही सीमित हो. आलोचकों का कहना है कि यह सम्मान ‘फ़ॉर्मल मिलिट्री ऑनर्स सिस्टम’ के बाहर दिया गया. न तो यह राष्ट्रपति का दिया कोई वीरता पुरस्कार था, न ही रेजिमेंटल या सेवा–स्तर का सम्मान. इसके बजाय, मेडल एक आध्यात्मिक मंच पर दिए गए. एक त्योहार मनाने के लिए जुटी भीड़ के सामने. आलोचक ये बातें सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो क्लिप्स के आधार पर कह रहे हैं. आलोचकों का आरोप है कि इससे ऑपरेशन सिंदूर जैसे एक ‘पूरी तरह मिलिट्री ऑपरेशन’ का क्रेडिट, एक धार्मिक प्रदर्शनी में बदल दिया गया. क्रिटिक्स कहते हैं कि सैन्य उपलब्धियों की मान्यता हमेशा इंस्टिट्यूशनल फ़्रेमवर्क के तहत, तय प्रोटोकॉल और सिम्बल्स के साथ होती है, न कि किसी स्पिरिचुअल लीडर के डिजाइन किए मेडल्स के जरिए.

हालांकि ये धार्मिक कार्यक्रम, अन्य क्षेत्रों की नामचीन हस्तियों से भी भरा रहा. इस कार्यक्रम में सिर्फ रक्षा मंत्री ही नहीं, बल्कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, केंद्रीय मंत्री एल. मुरुगन और कई फिल्मी हस्तियां भी मौजूद थीं. यही पॉलिटिकल–सिलेब्रिटी मिक्स भी वेटरन्स को खटका. तर्क है कि सेना को ऐसे मंचों से जानबूझकर दूर रखा जाता रहा है, ताकि आर्म्ड फ़ोर्सेज (सशस्त्र बल) सत्ता, धर्म और लोकप्रियता की राजनीति से ऊपर बनी रहें. यह भी गौर करने वाली बात है कि सेना को सामूहिक रूप से सम्मानित करने की परंपरा है, जबकि इस अवॉर्ड सेरेमनी में ऑफ़िसर्स को व्यक्तिगत रूप से मंच पर बुलाया गया. उन्हें मेडल पहनाए गए और कैमरों के सामने पेश किया गया. कुछ रिटायर्ड ऑफ़िसर्स इसे ‘सजावट’ और ‘दिखावा’ कह रहे हैं, जो सैन्य संस्कृति से मेल नहीं खाती.

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इन आरोपों पर दि लल्लनटॉप ने ईशा फाउंडेशन का भी पक्ष जानने की कोशिश की. उनसे संपर्क करने का प्रयास किया, मगर संपर्क स्थापित नहीं हो पाया. जब वो इन आरोपों पर कोई प्रतिक्रिया देंगे, तो उसका अपडेट भी साझा किया जाएगा. फिलहाल सेना या सरकार की तरफ से भी कार्यक्रम को लेकर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई है. 

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