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ट्रांसफर के बाद भी सरकारी बंगले से मोह नहीं छूटा, अब अफसर को देने होंगे 7.69 लाख

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यूपी में इनकम टैक्स के एक पूर्व असिस्टेंट कमिश्नर से 7.69 लाख रुपये की किराया वसूली बरकरार रखी है. ट्रांसफर के बाद भी उन्होंने चार साल से ज्यादा समय तक लखनऊ का सरकारी आवास नहीं छोड़ा. कोर्ट ने उन्हें निर्देशों का पालन न करने पर 10 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया.

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सरकारी बंगला खाली नहीं करने पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अफसर से लाखों वसूलने का आदेश बरकरार रखा (Courtesy- ITG)

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  • इलाहाबाद हाई कोर्ट ने वेदानंद ओझा को सरकारी बंगले में रहने के दौरान 7.69 लाख रुपये किराया वसूलने और 10 हजार रुपये जुर्माना लगाने के आदेश को सही ठहराया है।
  • वेदानंद ओझा का ट्रांसफर 2008 में पीलीभीत हुआ था, लेकिन उन्होंने निर्धारित समय तक लखनऊ के सरकारी आवास को खाली नहीं किया और अदालत की पूर्व निर्देशों का पालन नहीं किया।
  • कोर्ट ने आदेश के उल्लंघन के चलते वेदानंद की याचिका खारिज करते हुए अगले कदम में राहत न देने का निर्णय लिया है, जिससे उन्हें किराया और जुर्माना चुकाना होगा।

उत्तर प्रदेश के लखनऊ में सरकारी बंगला खाली नहीं करना एक अफसर को महंगा पड़ गया. ट्रांसफर होने के बावजूद अफसर चार साल से ज्यादा समय तक सरकारी आवास में रहते रहे. अब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उनसे करीब 7.69 लाख रुपये किराया वसूलने के आदेश को सही ठहराया है. इतना ही नहीं, कोर्ट ने अधिकारी पर 10 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है.

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इंडियन एक्सप्रेस की रपट के मुताबिक, मामला यूपी के कमर्शियल टैक्स डिपार्टमेंट में असिस्टेंट कमिश्नर रहे वेदानंद ओझा का है. जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की बेंच ने 12 अक्टूबर को उनकी याचिका खारिज कर दी.

ट्रांसफर के बाद भी नहीं छोड़ा सरकारी आवास

वेदानंद ओझा को साल 2005 में लखनऊ के गोमती नगर में मौजूद विराम खंड में सरकारी आवास मिला था. उन्होंने 28 अगस्त 2005 से वहां रहना शुरू किया. जून 2008 में उनका ट्रांसफर पीलीभीत हो गया. नियमों के मुताबिक उन्हें तय समय में सरकारी घर खाली करना था. लेकिन वो वहीं रहते रहे. जब विभाग ने आवास खाली कराने की कार्रवाई शुरू की, तो वेदानंद 2012 में हाई कोर्ट पहुंच गए. 

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कोर्ट ने कब तक घर खाली करने को कहा था?

रपट के मुताबिक, हाई कोर्ट ने 2 फरवरी 2012 को इस याचिका का निपटारा कर दिया था. उस समय दोनों पक्षों के बीच इस बात पर सहमति बनी थी कि तबादले के बाद भी सरकारी आवास में रहने के लिए अफसर को बाजार दर के हिसाब से किराया देना होगा. हालांकि, किराए की कुल रकम में से उनकी सैलरी से मकान किराया भत्ते (HRA) के तौर पर काटी गई राशि घटा दी. कोर्ट ने उन्हें 30 जून 2012 तक आवास खाली करने का लिखित भरोसा देने को भी कहा. लेकिन अफसर वेदानंद ने न तो लिखित भरोसा दिया और न ही तय तारीख तक घर खाली किया. आखिरकार 10 सितंबर 2012 को उन्होंने आवास छोड़ा. यानी कोर्ट की तय समयसीमा से दो महीने से ज्यादा देर बाद.  

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7.69 लाख रुपये की वसूली क्यों?

विभाग ने जुलाई 2008 से जून 2012 तक सरकारी आवास में रहने के बदले बाजार दर से 7.69 लाख रुपये किराया तय किया. वेदानंद ने इस वसूली को उत्तर प्रदेश राज्य लोक सेवा अधिकरण में चुनौती दी. लेकिन 1 जुलाई 2026 को ट्रिब्यूनल ने उनकी अपील खारिज कर दी. इसके बाद वो दोबारा हाई कोर्ट पहुंचे. उन्होंने ग्रेच्युटी से रोके गए 7.69 लाख रुपये ब्याज समेत वापस दिलाने की मांग की. 

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हाई कोर्ट ने क्या कहा?

हाई कोर्ट ने कहा कि बाजार दर से किराया देने का मामला फरवरी 2012 के आदेश में ही तय हो चुका था. इसके बावजूद अधिकारी ने कोर्ट के निर्देशों का पालन नहीं किया. बेंच ने कहा, 

‘जो व्यक्ति इस अदालत की गरिमा और सम्मान की जरा भी परवाह नहीं करता, वह अदालत से किसी तरह की राहत पाने या किसी रियायत का दावा करने का हकदार नहीं है.’ 

कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत राहत देना अदालत के विवेक पर निर्भर करता है. ओझा ने पहले के आदेशों का पालन नहीं किया, इसलिए उन्हें राहत नहीं दी जा सकती. 

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