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डोभाल चीन पहुंचे, बॉर्डर पर क्या बात होगी? गलवान के 6 साल बाद कैसे हैं भारत-चीन रिश्ते

Ajit Doval China visit 2026: भारत और चीन के Special Representatives की 25 अगस्त की बातचीत में सीमा विवाद के साथ LAC पर शांति, पेट्रोलिंग व्यवस्था, 2024 के डिसएंगेजमेंट के बाद की स्थिति और दोनों देशों के रिश्तों को आगे बढ़ाने जैसे मुद्दे अहम रहेंगे. सितंबर में BRICS Summit के लिए शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा ने इस बैठक की अहमियत और बढ़ा दी है.

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डोभाल चीन क्यों पहुंचे हैं? (फोटो- इंडिटा टुडे)

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  • भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल बीजिंग में चीन के विदेश मंत्री वांग यी के साथ 25 अगस्त को भारत-चीन सीमा विवाद पर विशेष प्रतिनिधि की 25वीं बैठक करेंगे, जिसे चीन के विदेश मंत्रालय ने आधिकारिक रूप से पुष्टि की है।
  • भारत और चीन के बीच 2020 के गलवान संघर्ष के बाद दोनों देशों के बीच सीमा पर तनाव और सेनाओं की तैनाती में वृद्धि हुई, जिसके कारण लंबी सैन्य गतिरोध और कूटनीतिक बातचीत की स्थिति बनी है।
  • इस बैठक के बाद सीमा प्रबंधन, पेट्रोलिंग व्यवस्था और तनाव कम करने के लिए दोनों देशों द्वारा आगे के व्यावहारिक कदम और संवाद की संभावना बनी है, जिससे सितंबर में होने वाले ब्रिक्स समिट में संभावित वार्ता पर प्रभाव पड़ सकता है।

भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल इस वक्त बीजिंग में हैं. वो दो दिन की चीन यात्रा पर गए हैं और 25 अगस्त को चीनी विदेश मंत्री वांग यी के साथ भारत-चीन सीमा विवाद पर विशेष प्रतिनिधि (Special Representatives) की 25वीं बैठक करेंगे. इस बातचीत की आधिकारिक पुष्टि चीन के विदेश मंत्रालय ने की है. चीन के मुताबिक दोनों पक्ष सीमा विवाद के अलावा द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी विचारों का आदान-प्रदान करेंगे.

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विशेष प्रतिनिधि यानी SR बातचीत कोई नई व्यवस्था नहीं है. इसकी शुरुआत 2003 में हुई थी और इसका मकसद भारत-चीन के लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवाद का राजनीतिक समाधान तलाशना है. डोभाल भारत की तरफ से और वांग यी चीन की तरफ से इस व्यवस्था के विशेष प्रतिनिधि हैं.

इसलिए आज की बैठक को सिर्फ एक और कूटनीतिक मुलाकात समझना ठीक नहीं होगा. 2020 के गलवान संघर्ष के बाद दोनों देशों के रिश्तों में जो सबसे बड़ा झटका लगा था, उसके बाद सीमा पर स्थिरता बनाए रखना इस पूरी बातचीत का सबसे अहम हिस्सा है.

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आखिर LAC है क्या?

भारत-चीन सीमा की बात करते समय अक्सर LAC यानी Line of Actual Control का नाम आता है. आसान भाषा में समझें तो LAC वो वास्तविक नियंत्रण रेखा है, जहां दोनों देशों की सेनाएं अपने-अपने नियंत्रण वाले इलाकों में तैनात हैं. लेकिन दिक्कत ये है कि भारत और चीन के बीच LAC की पूरी लंबाई पर एक जैसी धारणा नहीं है. दोनों देशों की अपनी-अपनी धारणाएं हैं कि सीमा कहां से गुजरती है.

यही वजह है कि कई इलाकों में दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे के दावे वाले क्षेत्रों में पेट्रोलिंग को लेकर आमने-सामने आती रही हैं. अंतिम सीमा का समाधान अलग मुद्दा है, लेकिन तब तक LAC पर शांति और स्थिरता बनाए रखना दोनों देशों के लिए बेहद जरूरी है.

2020 में गलवान में क्या हुआ था?

साल 2020 में पूर्वी लद्दाख में भारत और चीन के बीच सैन्य तनाव बेहद गंभीर स्तर तक पहुंच गया. अप्रैल-मई 2020 के बाद पश्चिमी सेक्टर में LAC पर स्थिति बदलने की कोशिशों को लेकर भारत ने चीन के खिलाफ आपत्ति दर्ज कराई और दोनों देशों की सेनाओं के बीच लंबा गतिरोध शुरू हुआ. 15 जून 2020 को गलवान घाटी में हिंसक झड़प हुई, जिसमें भारतीय सेना के 20 जवानों की मौत हुई.

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इसके बाद पैंगोंग त्सो, गोगरा-हॉट स्प्रिंग्स, गलवान, देपसांग और डेमचोक समेत पूर्वी लद्दाख के कई इलाकों में सैन्य तैनाती बढ़ गई. दोनों देशों ने सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर लगातार बातचीत की. कई इलाकों में डिसएंगेजमेंट हुआ, लेकिन कुछ जगहों पर स्थिति लंबे समय तक अटकी रही.

यही 2020 का संकट आज की बातचीत का सबसे बड़ा बैकग्राउंड है. क्योंकि सीमा पर तनाव सिर्फ सैनिकों की तैनाती का सवाल नहीं है. इसका सीधा असर भारत-चीन के पूरे रिश्ते पर पड़ा.

2024 में क्या बदला?

21 अक्टूबर 2024 को भारत और चीन ने पूर्वी लद्दाख के देपसांग और डेमचोक में पेट्रोलिंग व्यवस्था को लेकर समझौता किया. भारत सरकार के मुताबिक इससे 2020 में बने सभी friction points से डिसएंगेजमेंट पूरा हुआ. दोनों जगहों पर पेट्रोलिंग और जहां लागू हो, वहां चराई की गतिविधियां पुराने तरीके के मुताबिक फिर शुरू करने पर सहमति बनी. सरकार ने संसद में बताया कि समझौता लागू भी किया जा चुका है.

यानी 2020 के बाद पहली बार सीमा पर तनाव कम करने की दिशा में एक बड़ा कदम सामने आया. लेकिन इसे सीमा विवाद का समाधान समझना गलती होगी.

डिसएंगेजमेंट का मतलब सैनिकों को टकराव वाली जगहों से पीछे करना है. सीमा का अंतिम निर्धारण यानी दोनों देशों के बीच boundary settlement अभी भी अलग और कहीं ज्यादा जटिल प्रक्रिया है.

देपसांग और डेमचोक की बात क्यों अहम है?

क्योंकि पेट्रोलिंग सिर्फ सैनिकों के घूमने का सवाल नहीं है. LAC पर पेट्रोलिंग का मतलब ये भी है कि दोनों सेनाएं अपने दावे वाले इलाकों में मौजूदगी कैसे दर्ज कराती हैं और किसी संभावित टकराव से कैसे बचती हैं.

2024 के समझौते के बाद अब सवाल ये है कि नई व्यवस्था जमीन पर कितनी स्थायी और प्रभावी साबित होती है. क्या दोनों सेनाएं पुराने पैटर्न के मुताबिक पेट्रोलिंग कर पा रही हैं? क्या स्थानीय स्तर पर गलतफहमी या आमने-सामने आने की स्थिति को रोकने के लिए पर्याप्त तंत्र मौजूद है? और क्या डिसएंगेजमेंट के बाद अगला कदम de-escalation यानी सैनिकों और हथियारों की व्यापक कमी की दिशा में बढ़ सकता है?

भारत-चीन Special Representatives की पिछली बैठक में भी border management और de-escalation को आगे बढ़ाने की बात हुई थी. चीन के विदेश मंत्रालय के मुताबिक 2025 की 24वीं बैठक में दोनों पक्षों ने सीमा प्रबंधन के लिए Working Group बनाने और सैन्य व कूटनीतिक स्तर के मौजूदा तंत्रों के जरिए de-escalation पर चर्चा आगे बढ़ाने पर सहमति जताई थी.

क्या कैलाश क्षेत्र की भी बात होगी?

कैलाश क्षेत्र और सीमा से जुड़े दूसरे इलाकों का व्यापक संदर्भ बातचीत में आ सकता है, लेकिन अभी तक दोनों सरकारों ने 25 अगस्त की बैठक के लिए कोई सार्वजनिक विस्तृत एजेंडा जारी नहीं किया है. इसलिए ये कहना कि डोभाल आज किसी खास जगह या खास सैन्य प्वाइंट पर निश्चित रूप से बातचीत करेंगे, तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा.

आधिकारिक तौर पर इतना जरूर स्पष्ट है कि सीमा संबंधी विवाद मुख्य मुद्दा है और इसके साथ द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी चर्चा होगी.

फिर शी जिनपिंग की भारत यात्रा का क्या कनेक्शन है?

यहीं से बैठक और ज्यादा दिलचस्प हो जाती है. भारत इस साल 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में ब्रिक्स समिट (BRICS Summit) की मेजबानी करने वाला है. Reuters ने 24 अगस्त को रिपोर्ट किया कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के सितंबर में भारत आने की संभावना है. हालांकि उनकी यात्रा की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है.

अगर शी जिनपिंग भारत आते हैं तो 2020 के बाद भारत और चीन के शीर्ष नेतृत्व के बीच संवाद के लिहाज से ये बड़ा घटनाक्रम होगा. इसलिए डोभाल और वांग यी की बातचीत को उस संभावित यात्रा की जमीन तैयार करने वाले कूटनीतिक प्रयासों के हिस्से के रूप में भी देखा जा सकता है.

लेकिन यहां भी एक बात साफ रखना जरूरी है. डोभाल की बातचीत का आधिकारिक एजेंडा सीमा विवाद है. शी की संभावित यात्रा और दोनों नेताओं की संभावित मुलाकात अलग राजनीतिक घटनाक्रम हैं. दोनों के बीच संबंध जरूर है, लेकिन इसे पक्की डील या किसी बड़े समझौते का संकेत मान लेना जल्दबाजी होगी.

बॉर्डर शांत होगा तो व्यापार भी सुधरेगा?

भारत और चीन के रिश्ते में सीमा और व्यापार को अलग-अलग डिब्बों में रखना मुश्किल है. 2020 के बाद राजनीतिक भरोसा बुरी तरह प्रभावित हुआ और इसका असर आर्थिक रिश्तों पर भी पड़ा.

भारत का रुख लंबे समय से यही रहा है कि सीमा पर शांति और स्थिरता व्यापक द्विपक्षीय रिश्तों के सामान्य होने की बुनियादी शर्त है. 2024 के बाद डिसएंगेजमेंट और फिर उच्चस्तरीय बातचीत में बढ़ोतरी इसी दिशा में महत्वपूर्ण संकेत हैं.

2025 की विशेष प्रतिनिधित्व बैठक में तीन पारंपरिक सीमा व्यापार बाजारों को दोबारा खोलने पर भी सहमति बनी थी. इसके अलावा सीमा प्रबंधन, ट्रांस-बॉर्डर नदियों और दूसरे व्यावहारिक मुद्दों पर भी बातचीत का रास्ता खुला.

भारत-चीन के साथ अमेरिका भी क्यों याद रखना चाहिए?

भारत और चीन के रिश्ते अब सिर्फ दो देशों के बीच का मामला नहीं हैं. एशिया में चीन की बढ़ती ताकत, भारत की अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी और इंडो-पैसिफिक (Indo-Pacific) की बदलती राजनीति ने इस रिश्ते को और जटिल बना दिया है.

भारत अमेरिका के साथ क्वाड (Quad) जैसे मंचों पर काम करता है, लेकिन चीन के साथ भी सीमा, व्यापार, ब्रिक्स (BRICS) और दूसरे बहुपक्षीय मंचों पर बातचीत जारी रखता है. यानी भारत की रणनीति किसी एक खेमे में पूरी तरह चले जाने की नहीं, बल्कि अपने हितों के हिसाब से अलग-अलग रिश्तों को संभालने की है.

इसीलिए सीमा पर शांति भारत के लिए सिर्फ सैन्य राहत नहीं है. इससे विदेश नीति, अर्थव्यवस्था और रणनीतिक विकल्पों के लिए भी ज्यादा जगह बनती है.

अब अगले छह महीने में क्या देखना चाहिए?

सबसे पहला संकेत होगा कि 25 अगस्त की बैठक के बाद दोनों देश सीमा प्रबंधन पर क्या कहते हैं. दूसरा, क्या पेट्रोलिंग व्यवस्था को लेकर कोई नया व्यावहारिक कदम सामने आता है. तीसरा, क्या तनाव कम करने (de-escalation) पर बातचीत सिर्फ बयान तक रहती है या सैन्य स्तर पर भी आगे बढ़ती है.

चौथा बड़ा संकेत होगा सितंबर में ब्रिक्स समिट और उसमें शी जिनपिंग की भागीदारी. अगर उनकी भारत यात्रा होती है तो मोदी और शी की मुलाकात में सीमा के अलावा व्यापार, आर्थिक रिश्ते और रणनीतिक मुद्दे भी अहम होंगे. पांचवां संकेत ये होगा कि दोनों देशों के रिश्तों में सामान्य गतिविधियां कितनी तेजी से लौटती हैं.

कुल मिलाकर डोभाल और वांग यी की बातचीत से भारत-चीन सीमा विवाद खत्म होने वाला नहीं है. लेकिन 2020 के बाद रिश्तों को जिस जगह से वापस लाने की कोशिश हो रही है, उसमें ये बातचीत एक अहम पड़ाव जरूर है. असली परीक्षा बैठक में कही गई बातों से ज्यादा इस बात की होगी कि LAC पर अगले कुछ महीनों में जमीन पर क्या बदलता है.

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