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यूपी-महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा इंजीनियरिंग कॉलेज बंद, क्या खत्म हो गया बीटेक का क्रेज?

Shuts Down 58 Engineering Colleges: ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन (AICTE) ने देश भर के 58 इंजीनियरिंग और टेक्निकल कॉलेजों को बंद करने का फैसला लिया है. यूपी और महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा 12-12 कॉलेज बंद हुए हैं. जानिए इसके पीछे की असली वजह क्या है.

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क्या खत्म हो गया बीटेक का क्रेज? (फोटो- AI)

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  • शैक्षणिक वर्ष 2025-26 में देश भर के 58 इंजीनियरिंग और टेक्निकल कॉलेजों को 'प्रोग्रेसिव क्लोजर' के तहत चरणबद्ध तरीके से बंद करने की मंजूरी दी गई है, जिससे नए छात्रों का एडमिशन बंद हो जाएगा।
  • कॉलेज बंद होने के प्रमुख कारणों में लगातार खाली सीटें, फैकल्टी की कमी, आउटडेटेड सिलेबस और तकनीकी सुविधाओं का अभाव शामिल हैं, जिससे छात्रों को व्यावसायिक कौशल प्राप्त नहीं हो सके।
  • उच्च गुणवत्ता वाले कॉलेजों जैसे IIT और NIT में मांग बनी हुई है, और छात्रों को मॉडर्न टेक्नोलॉजी और स्किल्स पर ध्यान देना आवश्यक है ताकि वे रोजगार के बेहतर अवसर प्राप्त कर सकें।

एक दौर था जब गली-मोहल्ले में हर दूसरे लड़का-लड़की के हाथ में बीटेक की डिग्री दिख जाती थी. माता-पिता का सपना होता था कि बच्चा किसी भी तरह बस एक बार इंजीनियरिंग कॉलेज की दहलीज पार कर जाए, फिर तो करियर सेट है. लेकिन अब हवा बदल चुकी है. ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन (AICTE) के ताजा आंकड़े बता रहे हैं कि देश के भीतर इंजीनियरिंग की दुकानों पर तेजी से ताले लग रहे हैं.

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‘इकोनॉमिक्स टाइम्स’ के मुताबिक इस साल देश भर में कुल 58 इंजीनियरिंग और टेक्निकल कॉलेज बंद हो गए हैं. इनमें सबसे बुरी हालत उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र की है, जहां सबसे ज्यादा कॉलेजों पर गाज गिरी है. क्या बीटेक का क्रेज खत्म हो गया है या फिर इन कॉलेजों के पास बच्चों को देने के लिए वो हुनर ही नहीं था जिसकी मार्केट में मांग है? आइए इस पूरे मामले की कड़वी सच्चाई का गहराई से पोस्टमॉर्टम करते हैं.

सच्चाई का पोस्टमॉर्टम: क्यों बंद हुए 58 कॉलेज?

‘इंडिया टुडे’ ने AICTE की तरफ से जारी की गई जानकारी के हवाले से लिखा है कि शैक्षणिक वर्ष 2025-26 के दौरान देश भर में 58 इंजीनियरिंग और टेक्निकल संस्थानों को 'प्रोग्रेसिव क्लोजर' यानी चरणबद्ध तरीके से बंद करने की मंजूरी दी गई है. प्रोग्रेसिव क्लोजर का मतलब ये होता है कि ये कॉलेज अब फर्स्ट ईयर में नए बच्चों का एडमिशन नहीं ले पाएंगे, हालांकि जो बच्चे पहले से वहां पढ़ रहे हैं वो अपनी पढ़ाई पूरी कर सकेंगे. इसके अलावा अलग-अलग कॉलेजों में चलने वाले करीब 950 से ज्यादा टेक्निकल कोर्सेज को भी पूरी तरह से बंद कर दिया गया है.

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अब सवाल उठता है कि ऐसा क्यों हुआ? क्या बच्चों ने इंजीनियरिंग से तौबा कर ली? असल कहानी कुछ और है. AICTE के अधिकारियों के मुताबिक इन कॉलेजों को बंद करने के पीछे कई बड़े कारण हैं. सबसे पहला कारण है 'लो स्टूडेंट इनटेक' यानी इन कॉलेजों में सीटें लगातार खाली रह जा रही थीं. जब क्लासरूम खाली रहेंगे तो कॉलेज का खर्च कैसे चलेगा?

दूसरा बड़ा कारण है फैकल्टी की कमी. ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की खबर के मुताबिक इन कॉलेजों के पास कायदे के प्रोफेसर और ट्रेनर ही नहीं थे जो बच्चों को नई तकनीक सिखा सकें. कई कॉलेजों के पास ना तो ढंग की कंप्यूटर लैब थी और ना ही बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर. जब कॉलेज सिर्फ कागजों पर और बड़ी-बड़ी इमारतों में चलेंगे लेकिन अंदर प्रैक्टिकल नॉलेज के नाम पर शून्य होगा, तो उनका यही हश्र होना था. यहां से पास होने वाले बच्चों को बाजार में चपरासी तक की नौकरी मिलने में पसीने छूट रहे थे, क्योंकि उनके पास सिर्फ डिग्री थी, कोई काम का स्किल नहीं था.

यूपी-महाराष्ट्र का 'कॉलेज स्कैम' और ग्राउंड रियलिटी

अगर हम राज्यों के हिसाब से इन बंद होने वाले कॉलेजों की लिस्ट देखें, तो उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र इस लिस्ट में सबसे ऊपर हैं. इन दोनों राज्यों में 12-12 इंजीनियरिंग कॉलेजों को बंद करने का आदेश दिया गया है. इसके बाद मध्य प्रदेश में 8, तेलंगाना और पंजाब में 4-4 कॉलेज बंद हुए हैं. आंध्र प्रदेश और राजस्थान में 3-3, जबकि गुजरात, कर्नाटक और तमिलनाडु में 2-2 कॉलेजों पर ताला लगा है.

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एक समय था जब उत्तर प्रदेश के नोएडा, गाजियाबाद और महाराष्ट्र के पुणे, नागपुर जैसे शहरों के आस-पास कुकुरमुत्ते की तरह प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेज खुल गए थे. इन कॉलेजों का बिजनेस मॉडल सिर्फ एक चीज पर टिका था- एडमिशन के नाम पर माता-पिता की गाढ़ी कमाई से मोटी फीस वसूलना. इनके ब्रोशर में चमचमाती लैब्स और विदेशी कंपनियों के नाम पर 100% प्लेसमेंट का दावा किया जाता था, लेकिन ग्राउंड रियलिटी ये थी कि तीसरे-चौथे दर्जे के इन कॉलेजों से निकलने वाले छात्रों को प्लेसमेंट के नाम पर 'ठेंगा' मिलता था.

जब हर साल हजारों बेरोजगार इंजीनियर हाथ में डिग्री लेकर सड़कों पर घूमने लगे, तो धीरे-धीरे बच्चों और पेरेंट्स का इन एलीट दिखने वाले फर्जी ढांचों से भरोसा उठ गया. बच्चों ने इन कॉलेजों में जाना बंद कर दिया, जिससे इनका रेवेन्यू मॉडल ध्वस्त हो गया और आखिरकार इन्हें बंद करने की नौबत आ गई. खास बात ये है कि बंद होने वाले 58 संस्थानों में से सिर्फ 3 सरकारी सहायता प्राप्त (Government Aided) हैं, बाकी के 55 पूरी तरह से प्राइवेटली फाइनेंस्ड कॉलेज थे.

AI और बदलते दौर की मार: पुराना सिलेबस बना बर्बादी का कारण

इस साल यानी 2026 में पूरी दुनिया की टेक इंडस्ट्री एक बहुत बड़े बदलाव से गुजर रही है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के आने के बाद से सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट, कोडिंग और बेसिक आईटी जॉब्स का पूरा ढांचा बदल चुका है. वो कोडिंग जो पहले एक फ्रेशर इंजीनियर कई घंटों में करता था, अब एआई टूल्स उसे कुछ सेकेंड्स में कर देते हैं. ऐसे में टेक कंपनियों को अब घिसे-पिटे कोडर्स की जरूरत नहीं है, बल्कि उन्हें ऐसे इंजीनियर्स चाहिए जो एआई टूल्स को मैनेज कर सकें और क्रिटिकल थिंकिंग के साथ काम कर सकें.

बंद होने वाले इन प्राइवेट कॉलेजों की बर्बादी का सबसे बड़ा कारण इनका पुराना और आउटडेटेड सिलेबस रहा. दुनिया जहां जेनरेटिव एआई, क्लाउड कंप्यूटिंग और डेटा साइंस की बात कर रही है, वहीं ये कॉलेज बच्चों को आज से दस साल पुरानी थ्योरी और बेसिक सी-लैंग्वेज रटवा रहे थे. जब ये बच्चे इंडस्ट्री में इंटरव्यू देने जाते हैं, तो कंपनियों की जरूरतों के सामने टिक नहीं पाते.

JEE की कोचिंग चलाने वाले प्रशांत श्रीवास्तव का मानना है कि बीटेक का क्रेज खत्म नहीं हुआ है. लल्लनटॉप से बात करते हुए प्रशांत कहते हैं.

ऐसा नहीं है कि इंजीनियरिंग में दिलचस्पी खत्म हो गई हो. हां 'खराब बीटेक' का क्रेज जरूर खत्म हुआ है. आईआईटी (IIT), एनआईटी (NIT) और टॉप-टियर कॉलेजों में आज भी मांग वैसी ही बनी हुई है, क्योंकि वो समय के साथ खुद को बदलते हैं.

प्रशांत कहते हैं कि युवाओं को अब सिर्फ एक कागज की डिग्री के भरोसे रहने की बजाय एआई प्रॉम्प्ट इंजीनियरिंग, डेटा एनालिटिक्स, साइबर सिक्योरिटी, फुल-स्टैक डेवलपमेंट और क्लाउड आर्किटेक्चर जैसे मॉडर्न स्किल्स सीखने पर ध्यान देना चाहिए. अगर आपके हाथ में हुनर है, तो मार्केट में नौकरियों की कोई कमी नहीं है, लेकिन अगर सिर्फ डिग्री की दुकान से खरीदी हुई पर्ची है, तो फिर ताला लगना तय है. 

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