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अमेरिका में पहले मुस्लिम सीनेटर बने अब्दुल अल सईद, भारत से भी है खास कनेक्शन

मिशिगन से जीतकर इतिहास रचने वाले अब्दुल अल-सईद का भारत से भी गहरा नाता है. उनकी पत्नी सारा जुकाकू भारत के एक दिग्गज राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखती हैं. सारा मूल रूप से कर्नाटक के भटकल शहर से ताल्लुक रखती हैं.

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अब्दुल रहमान और उनकी पत्नी सारा (COURTSEY- X)

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  • मिशीगन से डेमोक्रेट कैंडिडेट अब्दुल रहमान मोहम्मद अल-सईद अमेरिका के पहले मुस्लिम सीनेटर बनने के करीब हैं, चुनाव में डेमोक्रेट्स सीनेट, हाउस और गवर्नर पदों पर बढ़त बनाए हुए हैं।
  • अब्दुल पर चुनाव प्रचार के दौरान पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप ने मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़ाव और 'जिहादी' होने के आरोप लगाए, साथ ही उनकी इजरायल को सैन्य मदद के खिलाफ रुख़ को भी विवादित बताया गया।
  • अब्दुल रहमान की जीत के बाद अमेरिकी राजनीति में मुस्लिम समुदाय की उपस्थिति मजबूत होगी और वे इजरायल को दी जाने वाली सैन्य सहायता पर अपनी नीतियों को आगे बढ़ा सकते हैं।

अमेरिका में मध्यावधि चुनावों के रिजल्ट आने लगे हैं. सीनेट, हाउस और गवर्नर तीनों ही चुनाव में डेमोक्रेट्स लीड कर रहे हैं. इस बीच मिशीगन से डेमोक्रेट कैंडिडेट अब्दुल रहमान मोहम्मद अल-सईद की काफी चर्चा हो रही है. वह अमेरिका के पहले मुस्लिम सीनेटर होंगे. राजनीति में आने से पहले रहमान महामारी एक्सपर्ट के तौर पर काम कर चुके हैं. पब्लिक हेल्थ एडमिनिस्ट्रेटर होने के साथ ही शिक्षाविद भी हैं. 

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इन सबके साथ ही इंडिया से उनका एक गहरा कनेक्शन है. अब्दुल काउंटिंग में लगातार आगे चल रहे हैं. उनकी जीत के साथ ही वो अमेरिका के पहले मुस्लिम सीनेटर बन जाएंगे. अब्दुल की पत्नी सारा कर्नाटक के भटकल की रहनेवाली हैं. वह कर्नाटक के चर्चित राजनीतिक घराने से जुड़ी हुई हैं.

भारत से अब्दुल का कनेक्शन 

अब्दुल रहमान की पत्नी का नाम सारा जुकाकू है. सारा हिंदुस्तान के एक प्रतिष्ठित राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखती हैं. सारा कर्नाटक के भटकल की रहनेवाली हैं. उनके पिता, डॉ जुकाकू एस तैयब की जिंदगी का लंबा समय भटकल में ही बीता. उनके दादा, जुकाकू शमसुद्दीन, मुख्यमंत्री बीडी जत्ती के कार्यकाल में मंत्री थे. आज, उनके परिवार के कई सदस्य बेंगलुरु में बस गए हैं. लेकिन, शिक्षा के क्षेत्र में दिए गए योगदान के जरिए जुकाकू परिवार की विरासत आज भी भटकल में कायम है.

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 द अमेरिकन बाजार की एक रिपोर्ट के अनुसार, सारा के दादा शमसुद्दीन को भटकल और उसके आसपास के इलाकों में बिजली और अन्य जरूरी बुनियादी सुविधाएं पहुंचाने का श्रेय दिया जाता है. उन्होंने उस दौर में शैक्षिक और सामुदायिक संस्थानों को मजबूत करने में भी अहम भूमिका निभाई. उनके इस योगदान के लिए उन्हें सम्मान देते हुए एक प्रमुख चौराहे का नाम 'शमसुद्दीन सर्कल' रखा गया है.

सारा के पिता का जन्म भी भटकल में ही हुआ था. 1976 में उन्होंने बैंगलोर मेडिकल कॉलेज से ग्रेजुएशन किया और फिर अपने प्रोफेशनल करियर की शुरुआत की. बाद में वह मिशिगन चले गए. मिशिगन के डेट्रॉइट शहर में ही डॉ जुकाकू एस तैयब ने अपनी मेडिकल प्रैक्टिस शुरू की.

सारा के एक चचेरे भाई ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि वे इस बात से बहुत खुश हैं कि उनकी बहन और अब्दुल इतने फेमस हैं. उन्होंने अब्दुल रहमान और शमसुद्दीन के बीच तुलना भी की. उन्होंने कहा,

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हालांकि हमारे परिवार में कुछ और लोग भी राजनीति में सक्रिय रहे हैं. हमें यह देखकर खुशी हो रही है कि सैयद में हमारे दादाजी वाले गुण मौजूद हैं. खास तौर पर ईमानदारी और लोगों की सेवा करने की भावना. एक परिवार के सदस्य के तौर पर हमें इसका गर्व है.

(यह भी पढ़ें: '10 में से 6 अमेरिकी ईरान जंग से खुश नहीं', इन मुद्दों ने वोटरों का रुख बता दिया)

सारा और अब्दुल रहमान कैसे मिले?

अमेरिका में जन्मी सारा ने अपने पिता की तरह मेडिकल फील्ड को चुना. उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन से सोशियोलॉजी और नियर ईस्ट स्टडीज में दोहरी डिग्री हासिल की. बाद में यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड से मास्टर डिग्री पूरी की. इसके बाद उन्होंने कोलंबिया यूनिवर्सिटी के वैगेलोस कॉलेज ऑफ फिजिशियंस एंड सर्जन्स से अपनी मेडिकल की पढ़ाई पूरी की.

सारा ने पहले यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन हेल्थ में काम किया था. वहां वो मनोरोग विभाग (साइकियाट्री) में एक सीनियर पोस्ट पर थीं. इसके बाद उन्होंने एन आर्बर में माइंड वर्क साइकियाट्री नाम से अपनी प्राइवेट प्रैक्टिस शुरू की. फर्स्टपोस्ट के अनुसार, अब्दुल और जुकाकू की मुलाकात यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन में पढ़ाई के दौरान हुई थी. दोनों वहां के मुस्लिम स्टूडेंट्स एसोसिएशन का हिस्सा थे. जब अब्दुल ने उन्हें प्रपोज किया, तब सारा फर्स्ट ईयर में थीं. मई 2006 में, जब उनकी शादी हुई, तब वे 19 साल की थीं. उनकी दो बेटियां हैं. कपल की दोनों बेटियों ने भी चुनाव प्रचार में हिस्सा लिया था. 

प्रेसिडेंट ट्रंप के निशाने पर रहे हैं अब्दुल

जिस उम्मीदवार को अमेरिकी प्रेसिडेंट डॉनल्ड ट्रंप ने 'जिहादी' कहा, जिस पर मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़े होने के आरोप लगाए थे. उन्होंने अब्दुल को जिहादी तक कह दिया था, अब उन्होंने चुनाव जीतकर इतिहास रच दिया है. चुनाव के दौरान ट्रंप ने उन्हें लेकर कई विवादित बयान दिए थे. लेकिन अब्दुल की जीत ने इस मुकाबले को अमेरिका की राजनीति में एक बड़ी चर्चा बना दिया है. आखिर कौन हैं अब्दुल अल-सैय्यद और क्यों उनके चुनाव को लेकर इतना विवाद हुआ?

अब सवाल है कि आखिर ट्रंप अब्दुल अल-सैय्यद से इतने नाराज क्यों थे. दरअसल, चुनाव प्रचार के दौरान ट्रंप ने अब्दुल को कई बार निशाने पर लिया. उन्हें 'जिहादी' कहा और मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़ा होने का आरोप लगाया. ट्रंप ने यहां तक कहा कि अगर अब्दुल सीनेट पहुंचते हैं, तो उन्हें वहां जाने के लिए मेटल डिटेक्टर से गुजरना पड़ेगा. ट्रंप ने 9/11 हमले का भी जिक्र किया और अमेरिकी मतदाताओं से अब्दुल को रोकने की अपील की. हालांकि, अब्दुल ने इन आरोपों को खारिज किया. उन्होंने साफ कहा कि वो कभी मुस्लिम ब्रदरहुड के सदस्य नहीं रहे और न ही कभी होंगे.

इजरायल को सैन्य मदद दिए जाने के खिलाफ रहे हैं अब्दुल

लेकिन, इस चुनाव में अब्दुल के लिए सबसे बड़ा विवाद इजरायल को लेकर उनके रुख पर भी रहा. अब्दुल अल-सैय्यद इजरायल को अमेरिकी सैन्य मदद दिए जाने के विरोधी हैं. उनका कहना है कि अमेरिका को इजरायल को दी जाने वाली सैन्य सहायता बंद करनी चाहिए. उन्होंने इजरायल की सैन्य कार्रवाई की आलोचना की थी. गाजा को लेकर इजरायल की नीतियों पर भी तीखे सवाल उठाते रहे हैं.

इसी मुद्दे पर डेमोक्रेटिक पार्टी के अंदर भी उनके मतभेद सामने आए. उनकी प्राइमरी चुनाव की प्रतिद्वंद्वी और सांसद हेली स्टीवंस ने चुनाव से ठीक पहले रिपब्लिकन उम्मीदवार माइक रोजर्स का समर्थन कर दिया था. यानी अब्दुल को सिर्फ रिपब्लिकन पार्टी से ही नहीं, बल्कि अपनी ही पार्टी के कुछ नेताओं की नाराजगी का भी सामना करना पड़ा. 

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