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दिनभर फोन में निगेटिव न्यूज-रील्स देखते हैं? तो आप 'डूमस्क्रोलिंग' की चपेट में हो सकते हैं

डूम का मतलब है बर्बादी. वहीं, स्क्रोलिंग का मतलब है स्क्रीन चलाना. डूमस्क्रोलिंग में हम लगातार निगेटिव, डराने या परेशान करने वाली चीज़ें देखते और स्क्रोल करते रहते हैं. इससे होतो है तनाव.

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कितने घंटे फोन चलाते हैं आप?

सुबह आंख खुली नहीं कि आपने अपना फ़ोन उठा लिया और स्क्रोल करना शुरू. स्क्रोल करते-करते घंटा कैसे बीत गया, पता ही नहीं चला. टॉयलेट सीट पर बैठे तो स्क्रोल करना शुरू कर दिया. भूल ही गए कि आखिर किस काम के लिए बैठे थे! रात में सोने से पहले रील्स देखना शुरू किया. आधी रात बीत गई, लेकिन नींद आने का नाम ही नहीं ले रही. कुछ लोग ऐसे भी हैं जो हर वक़्त ऐसा कॉन्टेंट देखते-सुनते हैं, जो उन्हें विचलित करता है. परेशान करता है. उनका स्ट्रेस बढ़ाता है. लेकिन वो खुद को रोक नहीं पाते.

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जानते हैं, इस आदत को क्या कहते हैं? डूमस्क्रोलिंग. यहां डूम का मतलब है- बर्बादी. स्क्रोलिंग का मतलब है- स्क्रीन चलाना. डूमस्क्रोलिंग में हम लगातार निगेटिव, डराने या परेशान करने वाली चीज़ें देखते और स्क्रोल करते रहते हैं. इससे होता है तनाव. बहुत ज़्यादा तनाव. 

पर भला किसी को निगेटिव चीज़ें देखने की आदत कैसे लग सकती है? ये जानेंगे आज. डॉक्टर से समझेंगे कि डूमस्क्रोलिंग क्या है. लोगों को इसकी आदत क्यों लग जाती है. डूमस्क्रोलिंग से मेंटल हेल्थ पर क्या असर पड़ता है. और इसकी आदत कैसे छुड़ाएं. 

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डूमस्क्रोलिंग क्या है?

ये हमें बताया क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट मीमांसा सिंह तंवर ने. 

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मीमांसा सिंह तंवर, क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट, फोर्टिस हेल्थकेयर एंड अदायु माइंडफुलनेस

डूमस्क्रोलिंग एक ऐसी आदत है, जिसे चाहकर भी रोका नहीं जा पाता. इसमें हम बार-बार अपने मोबाइल या दूसरे गैजेट्स को उठाते हैं. उनमें ज़रूरत से ज़्यादा ख़बरें देखते हैं, जमकर सोशल मीडिया और इंटरनेट चलाते हैं. हम लगातार स्क्रोल करते रहते हैं. इसी आदत को डूमस्क्रोलिंग कहा जाता है.

लोगों को डूमस्क्रोलिंग की आदत क्यों पड़ गई है?

गैजेट्स हमारी ज़िंदगी का इतना ज़रूरी हिस्सा बन गए हैं कि उनके बिना रहना मुश्किल लगता है. गैजेट्स अपने पास रखना हमारे लिए आसान हो गया है. गैजेट्स के ज़रिए हम हर वक्त दुनिया से जुड़े रहते हैं. गैजेट्स पास होने से हमें आसानी और सुविधा महसूस होती है. जब भी हमें कुछ जानना होता है, वो जानकारी तुरंत गैजेट्स से मिल जाती है. यानी हमारी ज़िंदगी में गैजेट्स हर जगह मौजूद हैं. 

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दूसरी बड़ी वजह है हर चीज़ से जुड़े रहने की ज़रूरत. चाहे वो न्यूज़ हो, सोशल मीडिया, लाइफस्टाइल या एंटरटेनमेंट से जुड़ा कॉन्टेंट. इन सबसे जुड़े रहने के लिए हम लगातार और ज़्यादा जानकारी चाहते हैं. हम चाहते हैं कि हम चीज़ों के बारे में जागरूक रहें. उन्हें शेयर करें और उनके बारे में बात करें. यही ज़रूरत हमें कहीं न कहीं स्क्रीन से जुड़ा हुआ रखती है. 

तीसरी वजह है कि अब ये एक आदत बन चुकी है. जब हम बोर होते हैं या किसी चीज़ से ध्यान हटाना चाहते हैं. तब हम सबसे पहले फोन उठा लेते हैं. ये हमारे लिए ध्यान भटकाने का ज़रिया बन चुके हैं. 

चौथी वजह है इमोशनल कोपिंग यानी अपनी भावनाओं से निपटने के लिए फोन का इस्तेमाल. जब हम अच्छा महसूस नहीं कर रहे होते. कुछ हंसी-मज़ाक वाला या अपना मनपसंद कॉन्टेंट देखना चाहते हैं. तब हम फोन उठाते हैं और घंटों उसे स्क्रोल करते रहते हैं.

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घंटों स्क्रीन देखने से दिमाग थकने लगता है (फोटो: Freepik)

डूमस्क्रोलिंग से मेंटल हेल्थ पर क्या असर पड़ता है?

घंटों स्क्रीन देखने से दिमाग थकने लगता है, जिसे ब्रेन रॉट कहते हैं. ब्रेन रॉट का मतलब है, मानसिक थकान महसूस करना. जब हम काफी देर तक चीज़ें पढ़ते, देखते और सुनते रहते हैं. तब इससे हमारी सोचने-समझने की क्षमता पर असर पड़ता है. जानकारी के बोझ और बहुत सारे विज़ुअल्स देखकर हम थकने लगते हैं. 

दूसरा, कई बार हम अपना मूड ठीक करने के लिए सोशल मीडिया चलाते हैं. लेकिन ये समझना ज़रूरी है कि उस कॉन्टेंट में निगेटिविटी भी होती है. ये निगेटिविटी हमारी भावनाओं पर असर डालती है. हम जितना ज़्यादा निगेटिव खबरें या कॉन्टेंट देखते हैं, उतना ही हम निगेटिव मूड में चले जाते हैं. 

तीसरा है कन्फर्मेशन बायस यानी अपनी सोच सही साबित करने वाली चीज़ें ज़्यादा देखना. हम जिस चीज़ पर विश्वास करते हैं, उसके बारे में ज़्यादा से ज़्यादा पढ़ना और समझना चाहते हैं. इससे हमें लगता है कि हम जो सोच रहे हैं, वही सही है. इससे हम एक तरह के इको चैंबर में फंस जाते हैं और दूसरी बातों को समझने की क्षमता कम हो जाती है. 

पांचवां असर है तुलना करना. हम अलग-अलग चीज़ों की तुलना करते हैं. हम ऑनलाइन जो ज़िंदगी देखते हैं, वो अक्सर बहुत अच्छी लगती हैं. इससे हमें अपनी ज़िंदगी कम अच्छी लगने लगती है. ये तुलना हमारी मेंटल हेल्थ पर असर डाल सकती है. 

छठवां असर हमारी नींद पर पड़ता है. सोने से पहले स्क्रोल करना हमारी आदत बन चुकी है. इससे हमें पता ही नहीं चलता कि कितना समय निकल गया. इसका सीधा असर नींद की क्वालिटी पर पड़ता है.

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कोई खास काम करने के वक्त फोन खुद से दूर रखें (फोटो: Freepik)

डूमस्क्रोलिंग की आदत कैसे छुड़ाएं?

सबसे पहली चीज़ है कोशिश करना. हमें पता है कि डूमस्क्रोलिंग हमारे लिए सही नहीं है. ये भी पता है कि हम गैजेट्स का ज़रूरत से ज़्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं. इसलिए हमें खुद को रोकने और आदत बदलने की कोशिश करनी ही होगी. जब आप कोई काम कर रहे हों. चाहे वो पढ़ना हो, कोई दूसरा काम हो, परिवार के साथ समय बिताना हो. तब कोशिश करें कि उस वक्त कोई गैजेट आपके पास न हो. वरना आपका ध्यान उस काम से हटकर फोन की तरफ चला जाएगा. 

दूसरी चीज़ है अटेंशन री-ट्रेनिंग. यानी कोई खास काम करने के वक्त गैजेट्स खुद से दूर रखें. अगर इस बीच फोन देखने का बहुत मन करे. तब इस इच्छा को थोड़ा टालने और कंट्रोल करने की कोशिश करें. 

तीसरी चीज़ है डिजिटल डिटॉक्स. यानी दिन में कुछ समय फोन या गैजेट्स से दूर रहना. अगर ये आदत अपना लें, तो डूमस्क्रोलिंग कम करने में बहुत मदद मिलती है. 

चौथी बात, सोने से पहले फोन न चलाएं. उसकी जगह थोड़ा पढ़ें या खुद को रिलैक्स करें. कोशिश करें कि सोने से 30–45 मिनट पहले स्क्रीन से दूरी बना लें. लेकिन कई बार सब समझते हुए भी हम ऐसा नहीं कर पाते. इसकी वजह हमारी आदत है. ये आदत तभी बदेलगी, जब हम खुद से कोशिश करें.

इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया ऐप्स पर आप टाइम लिमिट फिक्स कर सकते हैं. जैसे ही वो टाइम पूरा होगा, आपको नोटिफिकेशन जाएगा, कि अब ऐप बंद कर दीजिए. और तब आपको कंट्रोल करते हुए वो ऐप बंद कर देना है. साथ ही, खुद को ऐसे काम में बिज़ी रखें. जिसमें स्क्रीन की ज़रूरत न पड़ती हो. ऐसे आप डूमस्क्रोलिंग की आदत छुड़ा सकते हैं.

(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)

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