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डायबिटीज़ ही नहीं, इन 4 ख़तरनाक बीमारियां से भी हो सकता है इंसुलिन रेज़िस्टेंस

डॉक्टर से समझेंगे कि इंसुलिन रेज़िस्टेंस क्यों होता है. इसके लक्षण क्या हैं. फिर पता करेंगे कि इंसुलिन रेज़िस्टेंस से क्या-क्या दिक्कतें या बीमारियां हो सकती हैं. और इसे मैनेज कैसे किया जाए.

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इंसुलिन हॉर्मोन का ठीक से काम करना बहुत ज़रूरी है (AI Generated)

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  • इंसुलिन रेज़िस्टेंस तब होता है जब पैंक्रियाज़ द्वारा बनाए गए इंसुलिन हॉर्मोन शरीर के सेल्स में सही तरह काम नहीं करते, जिससे ग्लूकोज़ सेल्स तक नहीं पहुंच पाती।
  • इंसुलिन रेज़िस्टेंस के कारण शरीर में शुगर का स्तर बढ़ जाता है, जिससे डायबिटीज़, ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल, PCOD और फैटी लिवर जैसी बीमारियां हो सकती हैं।
  • इंसुलिन रेज़िस्टेंस को नियंत्रित करने के लिए संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और पर्याप्त नींद जरूरी है, जिससे डायबिटीज़ और अन्य जटिलताओं से बचाव हो सकता है।

आपको इंसुलिन के बारे में पता है? जो लोग डायबिटिक हैं या जिनके परिवार में किसी को डायबिटीज़ है. उन्होंने इसका नाम ज़रूर सुना होगा. इंसुलिन एक हॉर्मोन है. जिसे पैंक्रियाज़ बनाता है. अब इंसुलिन का काम है- खाने से मिलने वाली ग्लूकोज़ को शरीर के सेल्स में पहुंचाना. जिससे शरीर को एनर्जी मिले और खून में शुगर का लेवल भी कंट्रोल में रहे. पर कई बार शरीर के सेल्स इंसुलिन हॉर्मोन के प्रति ठीक से प्रतिक्रिया नहीं करते. इसे इंसुलिन रेज़िस्टेंस कहते हैं. ऐसा होने पर खून में शुगर का लेवल बढ़ जाता है. जिससे डायबिटीज़ हो सकती है.

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आमतौर पर हम इंसुलिन रेज़िस्टेंस को डायबिटीज़ से जोड़कर ही देखते हैं. पर इसका असर सिर्फ डायबिटीज़ तक सीमित नहीं है. ये शरीर में कई और बीमारियां भी कर सकता हैं. जिनके बारे में जानेंगे हम आज. अव्वल तो डॉक्टर से समझेंगे कि इंसुलिन रेज़िस्टेंस क्यों होता है. इसके लक्षण क्या हैं. फिर पता करेंगे कि इंसुलिन रेज़िस्टेंस से क्या-क्या दिक्कतें या बीमारियां हो सकती हैं. और इसे मैनेज कैसे किया जाए. 

इंसुलिन रेज़िस्टेंस क्यों होता है?

ये हमें बताया डॉक्टर अभिनव कुमार गुप्ता ने.

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डॉ. अभिनव कुमार गुप्ता, सीनियर कंसल्टेंट, एंडोक्रिनोलॉजी एंड डायबिटीज़, नारायणा हॉस्पिटल, जयपुर

जब शरीर में इंसुलिन हॉर्मोन के काम करने की क्षमता घट जाए. यानी पैंक्रियाज़ ग्रंथि इंसुलिन हॉर्मोन को पर्याप्त मात्रा में बनाती तो है. लेकिन वो ठीक से काम नहीं कर पाता. तब इसे इंसुलिन रेज़िस्टेंस कहते हैं. कुछ जेनेटिक कंडीशंस, वज़न बढ़ाने वाली कंडीशंस और हॉर्मोनल कंडीशंस में इंसुलिन रेज़िस्टेंस हो सकता है.

इंसुलिन रेज़िस्टेंस के लक्षण

शरीर में कुछ जगहों पर स्किन का रंग गहरा जाना. जैसे बगलों में और गर्दन पर. इसे एकेंथोसिस कहते हैं और ये इंसुलिन रेज़िस्टेंस का शुरुआती संकेत है. शरीर में स्किन टैग्स (लटकते हुए मस्से) भी बनने लगते हैं. अक्सर थकान रहती है. वज़न बढ़ने लगता है. ये सारे इंसुलिन रेज़िस्टेंस के लक्षण हैं.

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इंसुलिन रेज़िस्टेंस से क्या-क्या दिक्कतें या बीमारियां हो सकती हैं?

इंसुलिन रेज़िस्टेंस होने पर कुछ बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है. जैसे डायबिटीज़. भारत को दुनिया की डायबिटीज़ कैपिटल कहा जाता है. देश में करीब 10 करोड़ लोगों को डायबिटीज़ है. ज़्यादातर लोगों को इंसुलिन रेज़िस्टेंस की वजह से डायबिटीज़ या टाइप-2 डायबिटीज़ होती है. अगर डायबिटीज़ को ठीक से मैनेज किया जाए, तो कई जटिलताओं से बचा जा सकता है. डायबिटीज़ एक साइलेंट डिज़ीज़ है. पहले इंसुलिन रेज़िस्टेंस होता है और फिर डायबिटीज़. इसके बाद डायबिटीज़ की वजह से होने वाली जटिलताएं होती हैं. 

दूसरी बीमारी है ब्लड प्रेशर, ये भी एक साइलेंट डिज़ीज़ है. कई लोगों को लगता है कि अगर लक्षण नहीं हैं, तो शुगर और बीपी कंट्रोल करने की ज़रूरत नहीं है. लेकिन ज़्यादातर लोगों में इनके साफ लक्षण दिखाई नहीं देते, इसलिए डायबिटीज़ और हाई बीपी से बचना ज़रूरी है. 

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तीसरी बीमारी है कोलेस्ट्रॉल का बढ़ना यानी डिस्लिपिडेमिया. 

इंसुलिन रेज़िस्टेंस महिलाओं में PCOD यानी पॉलीसिस्टिक ओवरी डिज़ीज़ भी कर सकता है. PCOD होने पर वज़न बढ़ने लगता है. पीरियड्स से जुड़ी दिक्कतें होने लगती हैं. चेहरे और शरीर के दूसरे हिस्सों पर बाल आने लगते हैं. आगे चलकर, कुछ मामलों में इनफर्टिलिटी भी हो सकती है. इंसुलिन रेज़िस्टेंस से फैटी लिवर भी हो सकता है. फैटी लिवर यानी लिवर में फैट जमा होना. कुछ तरह के कैंसर और माइग्रेन भी इंसुलिन रेज़िस्टेंस से जुड़े हो सकते हैं.

इंसुलिन रेज़िस्टेंस को कैसे मैनेज करें?

कुछ टेस्ट्स से इंसुलिन सेंसेटिविटी का पता चलता है. जैसे होमा इंसुलिन रेज़िस्टेंस इंडेक्स (HOMA-IR). इससे पता चलता है कि शरीर इंसुलिन के प्रति कितनी अच्छी तरह प्रतिक्रिया कर रहा है.

इंसुलिन रेज़िस्टेंस को बहुत आसानी से कंट्रोल किया जा सकता है. हेल्दी और बैलेंस्ड डाइट लें. लो-फैट और हाई-कार्ब्स डाइट लें. खाने में कैलोरीज़ कम हों. रोज़ आधा घंटा पैदल चलें या दूसरी एक्सरसाइज़ करें. साथ ही, पर्याप्त नींद लें. इन तीन चीज़ों को करने से इंसुलिन रेज़िस्टेंस कंट्रोल में रहेगी.

इंसुलिन रेज़िस्टेंस हो तो सबसे बड़ा रिस्क डायबिटीज़ होने का रहता है. अगर किसी को अचानक भूख और प्यास ज़्यादा लगने लगी है. बार-बार पेशाब के लिए जाना पड़ रहा है. खूब थकावट रहती है. और घाव आसानी से नहीं भर रहे. तो तुरंत डॉक्टर से मिलें, क्योंकि ये सारे डायबिटीज़ के लक्षण हैं.

(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.) 

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